Bhojshala Temple: हाई कोर्ट के फैसले में भोजशाला मंदिर करार, लेकिन मुस्लिम पक्ष को क्या मिला?

Bhojshala: हिंदू पक्ष इस स्थल को मां सरस्वती (वाग्देवी) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है। वहीं जैन समुदाय के एक पक्ष का दावा है कि यह मध्यकालीन जैन मंदिर और गुरुकुल था। अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को पूरे परिसर के संरक्षण और देखरेख की जिम्मेदारी दी है

अपडेटेड May 15, 2026 पर 3:55 PM
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Bhojshala Temple: हाई कोर्ट के फैसले में भोजशाला मंदिर करार, लेकिन मुस्लिम पक्ष को क्या मिला?

मध्य प्रदेश के धार में स्थित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद पर हाई कोर्ट ने हिंदू पक्ष के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि विवादित परिसर मूल रूप से एक मंदिर और संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने कहा कि ऐतिहासिक दस्तावेजों और साहित्य से यह साबित होता है कि यह जगह परमार वंश के राजा भोज से जुड़ा संस्कृत अध्ययन केंद्र ‘भोजशाला’ थी। कोर्ट ने यह भी माना कि यहां हिंदू पूजा की परंपरा कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई।

हाई कोर्ट की बेंच ने कहा कि मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए अगर मुस्लिम पक्ष धार जिले में मस्जिद निर्माण या दूसरी उपयुक्त जमीन आवंटित करने के लिए आवेदन देता है, तो राज्य सरकार कानून के अनुसार उस आवेदन पर विचार कर सकती है। मतलब मुस्लिम पक्ष मस्जिद बनाने के लिए अलग जमीन की मांग कर सकते हैं। हालांकि, मुस्लिम पक्ष में इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है।

मस्जिद होने का दावा खारिज


कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर यह प्रमाणित होता है कि भोजशाला का मूल चरित्र एक संस्कृत पाठशाला और मंदिर का था। कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष के उस तर्क को स्वीकार नहीं किया जिसमें इसे मूल रूप से मस्जिद बताया गया था। कोर्ट ने कहा कि पुरातात्विक अवशेषों से पता चलता है कि मंदिर के ढांचे को नष्ट करके वहां बाद में निर्माण किए गए थे।

नमाज पढ़ने के अधिकार पर फैसला

मुस्लिम पक्ष के लिए सबसे बड़ा झटका यह रहा कि कोर्ट ने शुक्रवार को होने वाली नमाज पर रोक लगा दी है।

दरसअल साल 2003 से लागू ASI के आदेश के मुताबिक, मुस्लिम पक्ष को हर शुक्रवार दोपहर 1 बजे से 3 बजे तक नमाज अदा करने की अनुमति थी।

हालांकि, कोर्ट ने माना कि क्योंकि यह स्थान मूल रूप से एक मंदिर और शिक्षण संस्थान था, इसलिए वहां किसी भी प्रकार की इस्लामी इबादत या नमाज की अनुमति नहीं दी जा सकती।

'कमाल मौला मस्जिद' के नाम पर टिप्पणी

कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम पक्ष की ओर से जिसे 'कमाल मौला मस्जिद' कहा जाता है, वह असल में राजा भोज की बनाई गई भोजशाला परिसर का ही हिस्सा है। ऐतिहासिक साहित्य यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि यह स्थान परमार वंश के दौरान संस्कृत अध्ययन का केंद्र था।

ढांचे में बदलाव पर रोक

कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष (और हिंदू पक्ष दोनों) को स्पष्ट निर्देश दिया है कि परिसर के भीतर किसी भी प्रकार का नया निर्माण, रंग-रोगन या ढांचे में बदलाव नहीं किया जाएगा। इसकी पूरी जिम्मेदारी ASI को सौंपी गई है कि वह स्मारक की ऐतिहासिक पवित्रता बनाए रखे।

मुस्लिम पक्ष को क्या मिला?

अगर कानूनी दृष्टिकोण से देखें तो इस फैसले में मुस्लिम पक्ष की ज्यादातर दलीलों को खारिज कर दिया गया है, लेकिन कुछ तकनीकी बिंदु उनके संदर्भ में ये हैं:

अपील का अधिकार: हाईकोर्ट का यह फैसला अंतिम नहीं है। मुस्लिम पक्ष (कमाल मौला मस्जिद कमेटी) को इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का पूरा अधिकार है। इसलिए उन्होंने इस फैसले का सम्मान करते हुए इसे शीर्ष अदालत में चुनौती देने की बात कही है।

सुरक्षा और वक्फ संपत्ति का दावा: कोर्ट ने ASI को संपत्ति के संरक्षण का आदेश दिया है, लेकिन मुस्लिम पक्ष के उस दावे को फिलहाल रिकॉर्ड पर रहने दिया है, जिसमें वे इसे वक्फ संपत्ति बताते आए हैं। हालांकि कोर्ट ने इसे 'भोजशाला' के रूप में ही परिभाषित किया है।

क्या है भोजशाला विवाद?

हिंदू पक्ष इस स्थल को मां सरस्वती (वाग्देवी) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है। वहीं जैन समुदाय के एक पक्ष का दावा है कि यह मध्यकालीन जैन मंदिर और गुरुकुल था।

अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को पूरे परिसर के संरक्षण और देखरेख की जिम्मेदारी दी है। साथ ही कोर्ट ने कहा कि भोजशाला में मां सरस्वती की मूर्ति वापस लाने की मांग पर सरकार विचार कर सकती है। यह मूर्ति फिलहाल लंदन के संग्रहालय में रखी हुई बताई जाती है।

हिंदू पक्ष ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर परिसर में केवल हिंदुओं को पूजा का अधिकार देने की मांग की थी।

हाई कोर्ट ने 11 मार्च 2024 को ASI को भोजशाला-कमाल मौला परिसर का वैज्ञानिक सर्वे कराने का आदेश दिया था। इसके बाद ASI ने 22 मार्च 2024 से सर्वे शुरू किया और 98 दिनों तक जांच करने के बाद अपनी रिपोर्ट कोर्ट में सौंपी।

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