अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच पीस मेकर बनकर बैठा पाकिस्तान! इस्लामाबाद की पीस टॉक का भारत पर कैसा असर?

US Iran Talks Pakistan: सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान को मिली इस जिम्मेदारी का असर भारत पर क्या होगा और आखिर क्यों भारत इस लड़ाई में मध्यस्था करने आगे नहीं आया? अमेरिका और ईरान के बीच हालिया सीजफायर और 10–11 अप्रैल 2026 को इस्लामाबाद में होने वाली बातचीत भारत के लिए एक साथ राहत और चुनौती दोनों लेकर आई है

अपडेटेड Apr 10, 2026 पर 1:16 PM
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US Iran Talks: अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच पीस मेकर बनकर बैठा पाकिस्तान! इस्लामाबाद की पीस टॉक का भारत पर कैसा असर? (IMAGE- AI Generated)

अमेरिका-ईरान युद्ध में पाकिस्तान एक शांतिदूत बनकर सामने आया है और ये तो वही स्थिति हो गई कि '900 चूहे खाके बिल्ली हज को चली'। खुद आतंक को पाल पोसना वाला देश आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़े देशों के बीच शांति कायम करने की कड़ी बना है। हालांकि, इससे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान को मिली इस जिम्मेदारी का असर भारत पर क्या होगा और आखिर क्यों भारत इस लड़ाई में मध्यस्था करने आगे नहीं आया?

इस पर आगे बढ़ने से पहले ताजा हालात जान लेते हैं। पाकिस्तान में होने वाली बातचीत के लिए अमेरिका और ईरान का प्रतिनिधिमंडल 9 अप्रैल को इस्लामाबाद पहुंचने वाला था। हालांकि, लेबनान पर इजरायल के हमले के बाद से इस बातचीत पर संकट मंडरा रहा है और ईरान की कोई टीम पाकिस्तान नहीं पहुंची। उम्मीद है कि इस वीकेंड बातचीत हो सकती है।

पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने शुक्रवार को कहा कि एयरलाइंस को निर्देश दिया गया है कि वे उन लोगों को बिना वीजा के विमान में चढ़ने की अनुमति दें, जो इस्लामाबाद में होने वाली अमेरिका-ईरान वार्ता के सिलसिले में देश की यात्रा कर रहे हैं।


ईरान और अमेरिका के विदेशी प्रतिनिधिमंडल के इस हफ्ते के आखिर इस्लामाबाद पहुंचने की उम्मीद है। ये वार्ताएं ईरान पर अमेरिका-इजरायल युद्ध को खत्म करने के मकसद से की जा रही हैं, और ये पाकिस्तान की मध्यस्थता से हुए दो हफ्ते के संघर्ष-विराम के बाद हो रही हैं।

भारत पर क्या होगा इसका असर?

अमेरिका और ईरान के बीच हालिया सीजफायर और 10–11 अप्रैल 2026 को इस्लामाबाद में होने वाली बातचीत भारत के लिए एक साथ राहत और चुनौती दोनों लेकर आई है।

सबसे बड़ा फायदा ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा है। ईरान के साथ तनाव कम होने से तेल और गैस की सप्लाई स्थिर रहने की उम्मीद है। इस संघर्ष के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य प्रभावित हुआ था, जिससे वैश्विक तेल कीमतों में उछाल आया था- ऐसे में शांति भारत जैसी ऊर्जा-निर्भर अर्थव्यवस्था के लिए राहत है।

भारत ने आधिकारिक तौर पर इस डी-एस्केलेशन (तनाव कम होने) का स्वागत किया, जिसे एक जिम्मेदार वैश्विक रुख माना जा रहा है।

भारत अपनी जरूरत का लगभग 90% तेल और गैस होर्मुज के रास्ते से मंगाता है। अगर ये बातचीत सफल होती है, तो ये रास्ता पूरी तरह खुल जाएगा और भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने का खतरा टल जाएगा।

साथ ही खाड़ी देशों में भारत के लगभग 1 करोड़ लोग रहते हैं। युद्ध रुकने से उनकी सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी।

भारत ने कहा है कि होर्मुज से बिना किसी रुकावट के व्यापार होना चाहिए। संघर्ष के दौरान यह रास्ता ईरान के नियंत्रण में आ गया था, जिससे आवाजाही प्रभावित हुई थी।

इस रास्ते का दोबारा खुलना भारत के लिए बहुत जरूरी है, क्योंकि इसी से भारतीय जहाज आते-जाते हैं और चावल, चाय और दवाइयों जैसे सामान का निर्यात होता है।

शेयर बाजार पर भी इसका असर देखने को मिलेगा। विदेशी निवेशक अभी भी भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकाल रहे हैं, लेकिन सीजफायर के बाद यह बिकवाली पहले के मुकाबले काफी कम हो गई है, यानी बाजार पर दबाव थोड़ा घटा है।

रणनीतिक और कूटनीतिक असर

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर यह है कि कूटनीति में भारत की स्थिति थोड़ी “असहज” दिख रही है, क्योंकि पाकिस्तान अचानक केंद्र में आ गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की सफल मध्यस्थता की वजह से कुछ समय के लिए भारत, अमेरिका और ईरान की नजर में पीछे छूटता हुआ दिख सकता है।

भारत ने पाकिस्तान को बायपास करने के लिए चाबाहार में भारी निवेश किया था, लेकिन अब पाकिस्तान ने अपनी स्थिति का फायदा उठाकर खुद को एक अहम “सुरक्षा मध्यस्थ” के रूप में पेश किया है।

यह स्थिति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रिश्तों को थोड़ा जटिल बना सकती है। ट्रंप ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर को अपना “पसंदीदा फील्ड मार्शल” तक बताया, जिससे पाकिस्तान की भूमिका को खुलकर सराहा गया।

इस सब के बीच विदेश मंत्रालय ने बहुत संतुलित बयान दिया है। MEA ने सीजफायर का स्वागत किया, लेकिन पाकिस्तान का नाम लेकर धन्यवाद देने या उसकी भूमिका को सीधे तौर पर स्वीकार करने से बचा।

भारत को क्यों नहीं करनी चाहिए मध्यस्था?

इस पूरे मुद्दे पर शिव नादर यूनिवर्सिटी के हैप्पीमोन जैकब का कहना है कि यह मामला रणनीति से ज्यादा मनोविज्ञान का है। उन्होंने कहा कि भारत में जो प्रतिक्रिया दिख रही है, वह एक तरह की “प्रतिस्पर्धात्मक चिंता” है- यानी अगर पाकिस्तान कर सकता है, तो हम क्यों नहीं?

जैकब के मुताबिक, एक स्तर पर यह “फियर ऑफ मिसिंग आउट” (FOMO) यानी मौका छूटने का डर है। और दूसरे स्तर पर यह छोटे पड़ोसी देश को ज्यादा ध्यान मिलता देख एक तरह की जलन भी हो सकती है, लेकिन उन्होंने साफ कहा कि न तो यह डर और न ही जलन, अच्छी विदेश नीति का आधार हो सकते हैं।

BBC के मुताबिक, अटलांटिक काउंसिल में दक्षिण एशिया के सीनियर फेलो माइकल कुगेलमैन ने भी “भारत-पाकिस्तान की जीरो-सम सोच” को गलत बताया। उनका कहना है कि भारत इस बातचीत में मध्यस्थ बनने की दौड़ में था ही नहीं और बिना किसी आधिकारिक निमंत्रण के उसके इसमें शामिल होने की संभावना भी कम थी।

विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की यह कूटनीतिक सक्रियता ज्यादा समय तक टिकने वाली नहीं हो सकती और वह फिलहाल सिर्फ एक “मैसेज पहुंचाने वाले” की भूमिका निभा रहा है।

असल में, अमेरिका और ईरान के बीच गहरा अविश्वास है, इसलिए सीधे और स्थायी बातचीत जल्दी होना मुश्किल माना जा रहा है।

जैसा कि विशेषज्ञ कहते हैं, मौजूदा हालात को लेकर जो बड़ा नैरेटिव बनाया जा रहा है, वह “हकीकत से थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर” पेश किया गया है। यानी पाकिस्तान की भूमिका उतनी मजबूत या निर्णायक नहीं है, जितनी दिखाई जा रही है।

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