महिला आरक्षण के लिए डीलिमिटेशन क्यों, लोकसभा की सीटें बढ़ाने की क्या जरूरत? इन सभी सवालों के जवाब मिलेंगे यहां
Parliament Special Session: सरकार ने इन चिंताओं को खारिज कर दिया है। सरकार का कहना है कि दक्षिण के राज्यों को बिल्कुल भी चिंता करने की जरूरत नहीं है। डीलिमिटेशन को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच, आइए जानते हैं डीलिमिटेशन प्रक्रिया और महिला आरक्षण बिल एक दूसरे से क्यों जुड़े हैं। साथ ही और भी कई सवालों के जवाब
Parliament Special Session: महिला आरक्षण के लिए डेलिमिटेशन क्यों, लोकसभा की सीटें बढ़ाने की क्या जरूरत? इन सभी सवालों के जवाब मिलेंगे यहां
केंद्र सरकार ने गुरुवार को लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पेश कर दिया। इसके लिए सरकार ने खासतौर से संसद का विशेष सत्र बुलाया। कानून और न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने इस बिल को पेश करते हुए बहस की शुरुआत की। उन्होंने संविधान (131वां संशोधन) बिल, 2026 पेश किया। साथ ही उन्होंने डीलिमिटेशन बिल, 2026 भी सदन में रखा। इन बिलों के जरिए विधानसभाओं और संसद में महिलाओं को एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया जा रहा है।
इसी दौरान, गृह मंत्री अमित शाह ने संघ राज्य क्षेत्र कानून (संशोधन) बिल, 2026 भी सदन में पेश किया। इन तीनों बिलों को पेश किए जाने पर विपक्ष की तरफ से तीखी प्रतिक्रियाएं आईं। कांग्रेस के सांसद केसी वेणुगोपाल ने सभी तीनों बिलों का विरोध किया और सदन में पार्टी की आपत्तियां दर्ज कराईं।
कांग्रेस सांसद ने कहा, "सरकार पूरी तरह से संविधान को हाईजैक करना चाहती है।" इस पर संसदीय मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू और गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया कि अभी सिर्फ बिल पेश किए गए हैं। इन पर चर्चा अभी बाकी है।
इस बिल के पास होने से लोकसभा की कुल सीटें मौजूदा 543 से बढ़कर 850 हो जाएंगी। हर राज्य की सीटों की संख्या भी बढ़ जाएगी।
सरकार ने यह भी प्रस्ताव रखा है कि डीलिमिटेशन (सीटों की नई सीमा तय करना) को 2026 के बाद होने वाली जनगणना से अलग कर दिया जाए। इसके बजाय तुरंत 2011 की जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाकर डीलिमिटेशन का काम शुरू किया जाएगा। इससे डीलिमिटेशन और महिला आरक्षण दोनों को तेजी से लागू करने में मदद मिलेगी।
रिपोर्ट्स के अनुसार, हर राज्य की सीटें 2011 की जनगणना के आधार पर उस राज्य की आबादी के हिसाब से बढ़ाई जाएंगी। इस बात को लेकर विपक्ष और देश के दक्षिणी राज्यों में काफी चिंता और सवाल उठाए जा रहे हैं।
हालांकि, सरकार ने इन चिंताओं को खारिज कर दिया है। सरकार का कहना है कि दक्षिण के राज्यों को बिल्कुल भी चिंता करने की जरूरत नहीं है।
डीलिमिटेशन को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच, आइए जानते हैं डीलिमिटेशन प्रक्रिया और महिला आरक्षण बिल एक दूसरे से क्यों जुड़े हैं। साथ ही और भी कई सवालों के जवाब:
महिला आरक्षण बिल क्या है?
महिला आरक्षण बिल, जिसका आधिकारिक नाम अब नारी शक्ति वंदन अधिनियम है, एक ऐसा कानून है, जो लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित करने का प्रावधान करता है।
इसका मुख्य उद्देश्य है कि कानून बनाने में महिलाओं की भागीदारी बढ़े और राजनीति में महिलाओं की आवाज और मजबूत हो। हालांकि, यह आरक्षण अभी तुरंत लागू नहीं होगा।
इसे लागू करने से पहले देश में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की नई सीमाएं तय करनी होंगी, जिसे डीलिमिटेशन कहते हैं। डीलिमिटेशन के बाद ही यह 33% महिला आरक्षण लागू होगा।
महिला आरक्षण बिल को संसद में पहली बार कब लाया गया था?
संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने का विचार नया नहीं है। यह बिल सबसे पहली बार 1996 में प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा की सरकार के दौरान संसद में पेश किया गया था। लेकिन उस समय इस बिल का राजनीतिक विरोध बहुत तेज था, इसलिए यह बिल कई बार रद्द हो गया।
इसके बाद इसे कई बार दोबारा पेश किया गया। साल 2010 में मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान यह बिल राज्यसभा में पास भी हो गया था, लेकिन लोकसभा में यह कभी पास नहीं हो सका। इसलिए उस समय यह कानून नहीं बन पाया।
महिला आरक्षण बिल में अब क्या बदल गया है?
नरेंद्र मोदी की सरकार ने इस पुराने प्रस्ताव को फिर से उठाया और साल 2023 में इसे सफलतापूर्वक पास कर दिया। सरकार ने इसका नया नाम रखा- नारी शक्ति वंदन अधिनियम- ताकि महिलाओं को सशक्त बनाने का संदेश साफ दिखे।
इस बिल में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब इसका लागू होना डीलिमिटेशन और जनगणना से जोड़ दिया गया है। मतलब, यह 33% महिला आरक्षण अभी नहीं, बल्कि भविष्य के चुनावों में लागू होगा- संभवतः 2029 के आसपास।
इस बदलाव को लेकर काफी बहस छिड़ी हुई है। समर्थक इसे ऐतिहासिक सुधार बता रहे हैं, जबकि विपक्ष कह रहा है कि इससे असली बदलाव में देरी हो रही है।
डीलिमिटेशन क्या है और भारत में यह आखिरी बार कब किया गया था?
डीलिमिटेशन यानी परिसीमन वह प्रक्रिया है, जिसमें चुनावी क्षेत्रों (निर्वाचन क्षेत्रों) की सीमाओं को फिर से तय किया जाता है, ताकि हर सीट पर लगभग बराबर संख्या में लोग रहें।
यह इसलिए जरूरी है, क्योंकि समय के साथ आबादी बदलती रहती है। अगर डीलिमिटेशन नहीं किया जाए तो कुछ इलाकों की आवाज संसद या विधानसभा में ज्यादा हो जाती है, जबकि कुछ इलाकों की बहुत कम।
भारत में डीलिमिटेशन का काम एक स्वतंत्र संस्था डीलिमिटेशन कमीशन ऑफ इंडिया करती है। यह काम आमतौर पर जनगणना के बाद किया जाता है।
देश में आखिरी बार पूरा डीलिमिटेशन 2002 में किया गया था, जो 2001 की जनगणना के आधार पर हुआ था। उसके बाद से इस प्रक्रिया को रोक दिया गया है।
प्रस्तावित डीलिमिटेशन बिल क्या है?
सरकार ने जो डीलिमिटेशन बिल संसद में पेश किया, उसका मकसद लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाना और उनकी नई सीमाएं तय करना है। यह काम 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर किया जाएगा।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस बिल के बाद लोकसभा की कुल सीटें काफी बढ़ सकती हैं और लगभग 850 तक पहुंच सकती हैं। साथ ही, हर राज्य को उसकी आबादी के हिसाब से सीटें दी जाएंगी और फिर से बांटी जाएंगी।
डीलिमिटेशन और महिला आरक्षण बिल आपस में कैसे जुड़े हैं?
सरकार 33% महिला आरक्षण लागू करने से पहले डीलिमिटेशन को जरूरी सुधार मान रही है। सरकार का कहना है कि जब तक निर्वाचन क्षेत्रों की नई सीमाएं तय नहीं हो जातीं, तब तक महिलाओं के लिए आरक्षण सही तरीके से लागू नहीं किया जा सकता।
डीलिमिटेशन संसद में सीटों की संख्या तय करता है और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं आबादी के हिसाब से न फिर से तय करता है। नया नक्शा तैयार होने के बाद ही पता चलेगा कि कौन-सी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी।
सरल शब्दों में कहें तो – डीलिमिटेशन ढांचा तैयार करता है और उसी ढांचे के अंदर महिला आरक्षण लागू होता है।
डीलिमिटेशन कैसे होगा?
सरकार का प्रस्ताव है कि डीलिमिटेशन के लिए नई जनगणना का इंतजार नहीं किया जाएगा। इसके बजाय 2011 की जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाया जाएगा।
बिल पास होने के बाद डीलिमिटेशन कमीशन ऑफ इंडिया का गठन किया जाएगा। यह कमीशन सबसे पहले तय करेगा कि हर राज्य को लोकसभा में कितनी सीटें मिलनी चाहिए। उसके बाद हर राज्य में निर्वाचन क्षेत्र की सीमाएं तय करेगा, ताकि हर सीट पर लगभग बराबर संख्या में लोग रहें।
क्या दक्षिण के राज्य नुकसान में होंगे?
प्रस्तावित डीलिमिटेशन को लेकर राजनीतिक बहस छिड़ गई है। कई लोग पूछ रहे हैं कि इससे राज्यों के बीच ताकत का संतुलन कैसे प्रभावित होगा।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर सीटें सिर्फ आबादी के आधार पर बढ़ाई गईं, तो उत्तर के राज्यों को ज्यादा फायदा होगा, क्योंकि उनकी आबादी तेजी से बढ़ी है। वहीं दक्षिण के राज्य, जिन्होंने अच्छे से आबादी को नियंत्रण किया है, उनकी संसद में ताकत कम हो सकती है।
तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे राज्यों के नेता कह रहे हैं कि इससे उन्हें उनकी अच्छी शासन व्यवस्था की सजा मिल रही है और संघीय ढांचे का संतुलन बिगड़ सकता है।
एक और बड़ी चिंता यह है कि महिला आरक्षण को डीलिमिटेशन से जोड़ दिया गया है। विपक्ष का कहना है कि इससे 33% आरक्षण में देरी हो रही है। वे कहते हैं कि आरक्षण मौजूदा सीटों पर तुरंत लागू किया जा सकता है, डीलिमिटेशन जैसी जटिल प्रक्रिया का इंतजार क्यों?
इसके अलावा पारदर्शिता की कमी, 2011 के पुराने आंकड़ों के इस्तेमाल और राजनीतिक मंशा को लेकर भी आशंकाएं जताई जा रही हैं।
सरकार ने डीलिमिटेशन को लेकर उठी चिंताओं पर क्या कहा है?
सरकार ने खासकर दक्षिण के राज्यों की चिंताओं को शांत करने की कोशिश की है। सरकार का साफ कहना है कि प्रस्तावित डीलिमिटेशन से राज्यों के बीच मौजूदा ताकत का संतुलन नहीं बदलेगा।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, लोकसभा की कुल सीटें करीब 50% बढ़कर लगभग 850 हो सकती हैं, लेकिन यह बढ़ोतरी सभी राज्यों में समान अनुपात में होगी। हर राज्य की सीटों की संख्या बढ़ेगी, लेकिन आज जो अनुपात है, वही बना रहेगा। किसी भी राज्य का वर्तमान हिस्सा कम नहीं होगा।
सरकार ने जोर देकर कहा है कि “दक्षिण के राज्यों को कोई नुकसान नहीं होगा” और “आज जो रेश्यो है, वही बरकरार रहेगा”। इससे यह आशंका दूर करने की कोशिश की गई है कि राजनीतिक ताकत उत्तर की तरफ ज्यादा शिफ्ट हो जाएगी।
डीलिमिटेशन बिल को कैसे पास किया जाएगा?
प्रस्तावित डीलिमिटेशन को एक संवैधानिक संशोधन के रूप में पास किया जाएगा। यह सामान्य कानून से ज्यादा मजबूत मंजूरी वाला बिल है। इस बिल को पास होने के लिए:
लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत यानी दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन चाहिए, जो सदन में मौजूद और वोटिंग करने वाले सदस्यों में से हो।
साथ ही, हर सदन की कुल सदस्य संख्या का कम से कम आधा समर्थन भी जरूरी है।
संसद दोनों सदनों से बिल पास करने के बाद, क्योंकि यह राज्यों के प्रतिनिधित्व को प्रभावित करता है, इसलिए इसे कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं की मंजूरी भी लेनी पड़ सकती है।
ये सभी कदम पूरे होने के बाद, जब राष्ट्रपति अपनी सहमति दे देंगे, तब यह बदलाव कानून बन जाएगा और डीलिमिटेशन की प्रक्रिया शुरू हो सकेगी।