World Sparrow Day 2025: घर-आंगन से गायब होती गौरैया, जानें वजह, थीम और इसे बचाने के आसान तरीके
World Sparrow Day 2025: कभी भारत के घरों और आंगनों में आम तौर पर नजर आने वाली गौरैया की संख्या तेजी से घट रही है। शहरीकरण और पेड़ों की कटाई ने उनके घोंसले बनाने की जगहें सीमित कर दी हैं, जबकि मोबाइल टावरों से निकलने वाला रेडिएशन उनकी प्रजनन क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है, जिससे इनकी आबादी खतरे में है
world sparrow day 2025: इस साल विश्व गौरैया दिवस की थीम "A Tribute to Nature’s Tiny Messengers" रखी गई है।
कभी हमारे घरों की खिड़कियों, आंगनों और बगीचों में चहचहाने वाली गौरैया अब मुश्किल से ही नजर आती है। ये छोटी-सी चिड़िया न सिर्फ हमारे बचपन का हिस्सा थी, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। लेकिन तेजी से बढ़ते शहरीकरण, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, मोबाइल टावरों से निकलने वाले रेडिएशन और आधुनिक इमारतों की डिजाइन के कारण इसका अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। आज हालात ऐसे हैं कि कई शहरों में गौरैया लगभग विलुप्त हो चुकी है। इस संकट को देखते हुए हर साल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है।
इस नन्ही चिड़िया के संरक्षण के लिए लोगों को जागरूक किया जा सके। अगर हमने अभी से इसे बचाने के प्रयास नहीं किए, तो आने वाली पीढ़ियों को ये प्यारी चिड़िया सिर्फ किताबों और तस्वीरों में ही देखने को मिलेगी।
गौरैया दिवस की शुरुआत कैसे हुई?
गौरैया के संरक्षण की मुहिम की शुरुआत भारत के नेचर फॉरएवर सोसाइटी और फ्रांस के इको-सिस एक्शन फाउंडेशन ने मिलकर की थी। साल 2010 में पहली बार विश्व गौरैया दिवस मनाया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य इस नन्हे पक्षी के संरक्षण की आवश्यकता को उजागर करना था। इस अभियान को आगे बढ़ाने में भारतीय पर्यावरणविद् डॉ. मोहम्मद दिलावर की अहम भूमिका रही, जिन्हें 2008 में ‘हिरोज ऑफ द एनवायरनमेंट’ के खिताब से नवाजा गया था।
गौरैया क्यों हो रही है लुप्त?
कभी हर गली-मोहल्ले में दिखने वाली गौरैया की संख्या में तेजी से गिरावट आ रही है। इसके पीछे कई प्रमुख कारण हैं:
शहरीकरण और पेड़ों की कटाई – नए निर्माण कार्यों के चलते गौरैया के घोंसले बनाने की जगहें खत्म हो रही हैं।
रेडिएशन और प्रदूषण – मोबाइल टावरों से निकलने वाला रेडिएशन गौरैया की प्रजनन क्षमता पर नकारात्मक असर डाल रहा है।
भोजन की कमी – कीटनाशकों और रसायनों के बढ़ते उपयोग से कीट-पतंगे कम हो गए हैं, जो गौरैया के भोजन का मुख्य स्रोत हैं।
आधुनिक वास्तुकला – पुराने घरों की डिजाइन में दरारें और कोने होते थे, जहां गौरैया घोंसला बना सकती थी। लेकिन अब नए घरों में ऐसी जगहें नहीं होतीं।
जलवायु परिवर्तन – बढ़ती गर्मी और मौसम में अनियमितता भी इनके अस्तित्व के लिए खतरा बन रही है।
क्या होगा अगर गौरैया विलुप्त हो गई?
गौरैया सिर्फ एक पक्षी नहीं, बल्कि हमारे पर्यावरण का अहम हिस्सा है। ये जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में मदद करती है। अगर ये पूरी तरह से विलुप्त हो गई, तो इसका असर न सिर्फ प्रकृति पर बल्कि मानव जीवन पर भी पड़ेगा।
गौरैया बचाने के लिए क्या कर सकते हैं?
गौरैया संरक्षण के लिए हम कुछ छोटे लेकिन महत्वपूर्ण कदम उठा सकते हैं:
पक्षियों के लिए दाना-पानी रखें – घर की बालकनी या बगीचे में पानी और अनाज के लिए परिंडे लगाएं।
घोंसला बनाने की जगह दें – लकड़ी के छोटे घर या पुराने बक्सों को घोंसले के रूप में इस्तेमाल करें।
कीटनाशकों का कम उपयोग करें – जैविक खेती को अपनाकर गौरैया के भोजन स्रोत को बचाया जा सकता है।
पेड़-पौधे लगाएं – खासकर देशी पेड़-पौधे, जो कीट-पतंगों को आकर्षित करते हैं और गौरैया के लिए फायदेमंद होते हैं।
जागरूकता फैलाएं – बच्चों और समाज में गौरैया संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़ाएं।
2025 की थीम
इस साल विश्व गौरैया दिवस की थीम "A Tribute to Nature’s Tiny Messengers" रखी गई है। यह थीम गौरैया के हमारे जीवन में योगदान को उजागर करने के साथ-साथ इसके संरक्षण के लिए जागरूकता बढ़ाने का संदेश देती है।