जब दादा-दादी या नाना-नानी अपने बचपन की कोई कहानी सुनाते हैं तो उसमें एक खास तरह का सुकून होता है। यह सुनने में भले ही सोने से पहले की कोई आम रस्म, रविवार के लंच पर दोहराया जाने वाला परिवार का कोई किस्सा या "उस जमाने" की ज़िंदगी के बारे में कोई कहानी लगे, लेकिन रिसर्च से पता चलता है कि ये बातचीत बच्चों को मजेदार यादों के अलावा और भी बहुत कुछ दे सकती है। अलग-अलग पीढ़ियों के बीच कहानियां सुनाने-सुनने से बच्चों की पहचान बनाने, परिवार के रिश्ते मजबूत करने और समझदारी या अनुभव को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
