जब भी आप सनस्क्रीन लगाते हैं, उसकी असली ताकत उसके अंदर मौजूद फिल्टर्स में होती है। यही फिल्टर्स आपकी त्वचा को सूरज की हानिकारक किरणों से बचाने का काम करते हैं और तय करते हैं कि आपकी स्किन कितनी सुरक्षित रहेगी। आजकल सोशल मीडिया पर ओल्ड और न्यू जनरेशन फिल्टर्स को लेकर काफी चर्चा हो रही है, जिससे लोग कंफ्यूज हो रहे हैं कि कौन सा विकल्प बेहतर है। दरअसल, हर सनस्क्रीन एक जैसी नहीं होती, बल्कि उसमें इस्तेमाल किए गए फिल्टर्स उसकी क्वालिटी और असर को तय करते हैं।
कुछ फिल्टर्स पुराने हैं, जो सालों से इस्तेमाल हो रहे हैं, जबकि कुछ नए और एडवांस हैं, जो बेहतर सुरक्षा देने का दावा करते हैं। ऐसे में सही जानकारी होना जरूरी है, ताकि आप अपनी स्किन के लिए सही सनस्क्रीन चुन सकें और धूप से होने वाले नुकसान से बचाव कर सकें।
पुराने यानी ओल्ड जनरेशन फिल्टर्स 1960-80 के बीच विकसित हुए थे। इनमें एवोबेन्जोन, ऑक्सीबेन्जोन जैसे केमिकल्स शामिल होते हैं।
वहीं, न्यू जनरेशन फिल्टर्स 1990 के बाद आए, जिनमें टीनोसोर्ब और यूविनुल जैसे आधुनिक कंपाउंड्स शामिल हैं। ये टेक्नोलॉजी के हिसाब से ज्यादा एडवांस माने जाते हैं।
न्यू जनरेशन फिल्टर्स की सबसे खास बात है उनकी फोटो-स्टेबिलिटी। यानी ये धूप में जल्दी खराब नहीं होते और लंबे समय तक असर बनाए रखते हैं।
इसके उलट, पुराने फिल्टर्स जल्दी अपना असर खो सकते हैं। साथ ही नए फिल्टर्स हल्के होते हैं और कम मात्रा में भी बेहतर सुरक्षा देते हैं।
भारतीय त्वचा के लिए कौन बेहतर?
इंडियन स्किन के लिए सबसे जरूरी है UVA और UVB दोनों से सुरक्षा।
UVA किरणें टैनिंग, पिगमेंटेशन और डार्क स्पॉट्स का कारण बनती हैं, इसलिए नए फिल्टर्स ज्यादा असरदार माने जाते हैं।
क्या पुराने फिल्टर्स नुकसानदायक हैं?
अक्सर यह सुनने को मिलता है कि पुराने फिल्टर्स नुकसान पहुंचा सकते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स के अनुसार, सनस्क्रीन में इस्तेमाल होने वाली मात्रा में ये सुरक्षित होते हैं। इनके नुकसान का कोई ठोस सबूत अभी तक नहीं मिला है।
अगर आप बेहतर और लंबे समय तक चलने वाली सुरक्षा चाहते हैं, तो न्यू जनरेशन फिल्टर्स वाली सनस्क्रीन अच्छा विकल्प हो सकती है। हालांकि, सही सनस्क्रीन वही है जो आपकी स्किन पर सूट करे और जिसे आप नियमित रूप से इस्तेमाल करें।