महाराष्ट्र में BJP बड़ी लड़ाई के लिए तैयार, लोकसभा चुनाव का कोई मुद्दा नहीं कर रहा काम

लोकसभा चुनाव के बाद मतदाताओं को लेकर जो धारणाएं बनी थीं, वो हरियाणा के नतीजों से ध्वस्त हो गई हैं। हरियाणा में दलित समुदाय ने BJP को वोट देकर ऐतिहासिक जीत सुनिश्चित की है। अब BJP महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों में छोटे दलों के साथ गठबंधन करके सावधानी से आगे बढ़ रही है, ताकि यह पक्का किया जा सके कि दलित-मुस्लिम-मराठा गठबंधन, महाविकास अघाड़ी की तरफ न जाए

अपडेटेड Nov 11, 2024 पर 7:52 PM
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महाराष्ट्र चुनाव के दौरान 'लड़की बहन योजना' गेम चेंजर साबित हो सकती है

महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी को मिली करारी हार को काफी समय बीत चुका है। लोकसभा में दलित-मुस्लिम वोटों के गठबंधन और इसके साथ ही मराठा मतदाताओं के गठजोड़ ने बीजेपी की अगुआई वाली महायुति को तगड़ा झटका दिया था। कांग्रेस की अगुआई वाली विपक्ष ने BJP पर जोरोशोरों से संविधान बदलने का आरोप लगाया। महाविकास अघाड़ी (MVA) अभी भी संविधान बचाने को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है। हालांकि हरियाणा विधानसभा के नतीजों के बाद अब माहौल बदला दिख रहा है। लोकसभा चुनाव के बाद मतदाताओं को लेकर जो धारणाएं बनी थीं, वो हरियाणा के नतीजों से ध्वस्त हो गई हैं। हरियाणा में दलित समुदाय ने BJP को वोट देकर ऐतिहासिक जीत सुनिश्चित की है।

अब BJP महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों में छोटे दलों के साथ गठबंधन करके सावधानी से आगे बढ़ रही है, ताकि यह पक्का किया जा सके कि दलित-मुस्लिम-मराठा गठबंधन, महाविकास अघाड़ी की तरफ न जाए। हिंदी की एक मशहूर कहावत है, "काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती।" बीजेपी अपने पूरे चुनावी अभियान के दौरान इसी पर ध्यान दे रही है। इस बीच योगी के "बंटेंगे तो काटेंगे" बयान ने राज्य में ध्रुवीकरण को हवा दे दी है। कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे की ओर से योगी के कपड़ों पर की गई व्यक्तिगत टिप्पणी ने यह साबित कर दिया है कि इस बयान का असर साफ तौर पर दिख रहा है। नैरेटिव बदल गया है।

लोकसभा चुनावों की तरह मजबूत नहीं है दलित-मुस्लिम-मराठा गठबंधन

प्रधानमंत्री मोदी का पूरा ध्यान अब सिर्फ रैलियां और रोड शो करने पर नहीं है। इसकी जगह वे उन जगहों पर रैलियां करने पर ध्यान दे रहे हैं, जहां कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को प्रेरित करने के लिए पार्टी को उनकी जरूरत है। संविधान का मजाक उड़ाने के लिए राहुल गांधी पर निशाना साधना, दलितों के अलग साबुन बनाने के ऐलान जैसे बयान भी बीजेपी के लिए चीजें आसान कर रहे हैं।


मराठा नेता जरांगे ने लोकसभा चुनावों के दौरान BJP के लिए मुश्किलें खड़ी की थीं। हालांकि इस बार उन्होंने विधानसभा चुनाव से दूरी बनाते हुए कोई भी उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला किया है। यह मराठा वोटों को बंटने से रोकने और शरद पवार की अगुआई वाली NCP की मदद करने की एक कोशिश हो सकती है।

हालांकि महायुति में अजित पवार कई मुद्दों पर बीजेपी लीडरिशप के साथ सुरक्षित दूरी बनाकर चल रहे हैं। यह दूरी उन्हें पश्चिमी महाराष्ट्र और मराठवाड़ा क्षेत्र में मराठा के साथ-साथ मुस्लिम वोट हासिल करने में मदद कर सकती है।

दूसरी ओर BJP भी अजित पवार को अकेले लड़ने के लिए छोड़ रही है क्योंकि अजित पवार का मुद्दा उन्हें कई बार परेशान कर रहा था और वे अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं को उनके साथ गठबंधन के लिए पूरी तरह से मनाने में सफल नहीं रहे हैं। इसके अलावा पार्टी की ओर से मतदाताओं को यह समझाने का प्रयास किया जा रहा है कि एनसीपी में भ्रष्टाचार के अगुआ अजित पवार नहीं बल्कि शरद पवार हैं।

उम्मीदवारों की भारी संख्या से वोटर्स भी कंफ्यूज

महाराष्ट्र विधानसभा की 288 सीटों के लिए 4,000 से अधिक उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं। वहीं 12 से अधिक राजनीतिक दल अपनी-अपनी सीट जीतने के लिए जी-जान से जुटे हैं। महाराष्ट्र में पहले के चुनावों के दौरान 4 प्रमुख दल हुआ करते थे। हालांकि दो बड़ी पार्टियां- शिवसेना और एनसीपी दो हिस्सों में बंट गईं। इससे राज्य में चुनाव लड़ने वाली मु्ख्य पार्टियों की संख्या अब 6 हो गई हैं। इनके अलावा आधा दर्जन अन्य छोटी पार्टियां भी हैं, जिनकी कुछ इलाकों में मजबूत उपस्थिति है।

टिकट का आस लगाए बैठे कई नेताओं को उनकी सीट पर गठबंधन के कारण उम्मीदवार नहीं बनाया गया। ऐसे में अब इनमें से कई नेता बागी होकर निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं और महायुति और एमवीए दोनों के आलाकमान उन्हें मनाने के प्रयास में जुटे हुए हैं। कम से कम 120 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जिनमें बहुकोणीय मुकाबला है। कई सीटों पर त्रिकोणीय, कई में चतुष्कोणीय और कुछ में तो पांच से अधिक प्रमुख उम्मीदवार मैदान में हैं। MVA और महायुति दोनों के ही कई बागी उम्मीदवार हैं जो चुनाव में बैठने से इनकार कर रहे हैं। हालांकि भाजपा अपने असंतुष्टों को मनाने में अधिक सफल रही है।

BJP के लिए फायदेमंद है बहुकोणीय मुकाबला

राजनीतिक पंडितों का मानना ​​है कि यह राज्य में अब तक का सबसे कठिन चुनाव है। लोकसभा चुनाव की तरह इस बार कोई भी बड़ा मुद्दा केंद्र में नहीं आ पाया है। मतदाताओं की चुप्पी भी इस लड़ाई को दिलचस्प बना रही है। कई सीटों पर बड़ी संख्या में उम्मीदवारों के चलते थोड़े कंफ्यूज भी दिख रहे हैं। चुनाव में मुख्य मुकाबला MVA और महायुति गठबंधन के बीच है। इसके अलावा एक और मोर्चा है जो 110 से अधिक सीटों पर परिवर्तन महाशक्ति के नाम से चुनाव लड़ रहा है। कोई नहीं जानता कि यह गठबंधन किसके लिए चुनाव लड़ रहा है और इससे किसे फायदा होने वाला है। शायद बहुकोणीय मुकाबला भाजपा के लिए फायदेमंद हो।

कांग्रेस 102 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ रही है। अगर शिवसेना और एनसीपी शरद पवार गुट अपने कोटे की अधिक से अधिक सीटें जीतने में विफल रहती हैं, तो कांग्रेस के लिए 100 प्रतिशत स्ट्राइक रेट बनाए रखना संभव नहीं होगा।

विदर्भ इलाके की बात करें तो NCP शरद पवार और शिवसेना यूबीटी 23 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। लेकिन एक बात बहुत साफ है कि इन दोनों पार्टियों के पास न तो इस क्षेत्र में कोई वोट बैंक है और न ही कोई मजबूत उम्मीदवार है। विदर्भ का इलाका कांग्रेस का पारंपरिक गढ़ रहा है। ऐसे में बीजेपी के रणनीतिकारों को लगता है कि इस इलाके में जाति आधारित मतदान के बावजूद, वह विदर्भ इलाके में शिवसेना यूबीटी और एनसीपी शरद पवार की लड़ी जाने वाली अधिकतर सीटों पर जीत हासिल करने की स्थिति में है।

लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद किसानों के मुद्दे पर दिया ध्यान

लोकसभा चुनावों में महाराष्ट्र में BJP की हार के पीछे किसानों के प्रति उदासीनता भी एक प्रमुख कारण था। ऐसा नैरेटिव बनाया गया कि बीजेपी किसानों के हित में कोई फैसला नहीं नहीं ले रही है। लोकसभा चुनावों के बाद, नरेंद्र मोदी और एकनाथ शिंदे की अगुआई वाले केंद्र और राज्य सरकार ने आगे बढ़कर प्याज, कपास और सोयाबीन के किसानों को अधिकतम MSP दिया। विपक्ष का दावा है कि बेमौसम बारिश ने सोयाबीन की फसलों को तबाह कर दिया, जिससे लगभग 60% फसल का नुकसान हुआ है, लेकिन सरकार ने किसानों पर इसके प्रभाव को कम करने के लिए तेजी से काम किया है। प्याज के निर्यात की भी इजाजत दी गई है, और BJP आलाकमान इस बार पुरी तरह से मुस्तैद है कि कोई भी किसान विरोधी नैरिटव इस बार काम नहीं करे।

गेम चेंजर साबित हो सकती है लड़की बहन योजना

लोकसभा चुनाव के बाद सरकार ने इस योजना को शुरू किया, जिससे लड़कियों को सीधे उनके खातों में पैसे मिल रहे हैं। इससे ग्रामीण इलाकों की महिलाओं में आत्म-सम्मान और आत्मविश्वास की भावना पैदा हुई है। मध्य प्रदेश में यह एक गेम चेंजर साबित हुआ था और छत्तीसगढ़ के चुनाव में भी इसकी अहम भूमिका रही। BJP के सभी कैंपेन मैनेजर इस योजना पर पूरा ध्यान दे रहे हैं, जिससे PM मोदी के साइलेंट वोटर्स यानी महिलाओं के वोट को हासिल किया जा सके।

लोकसभा में हार के तुरंत बाद BJP ने शुरू की विधानसभा चुनावों की तैयारी

महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद BJP ने अपनी रणनीति बदली। मध्य प्रदेश में लगभग असंभव जीत हासिल करने के बाद केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और अश्विनी वैष्णव की सफल जोड़ी को महाराष्ट्र भेजा गया। भूपेंद्र यादव और अश्विनी वैष्णव ने तुरंत मुंबई में डेरा डाल लिया। उनके सामने तत्काल समस्या निराश कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाने की थी।

अजीत पवार फैक्टर ने लोकसभा चुनाव अभियान में कार्यकर्ताओं के मनोबल को प्रभावित किया, क्योंकि उनके पास भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी लड़ाई पर सफाई देने के लिए कुछ नहीं था। केंद्र और राज्य के संगठनों के बीच समन्वय की कमी ने भी इसमें भूमिका निभाई। भूपेंद्र यादव और अश्विनी यादव के कमान संभालते ही कार्यकर्ताओं की शिकायतों को सुनने के लिए नेताओं के दरवाजे खुल गए। यहां तक ​​कि चुपचाप काम करने वाले संघ कार्यकर्ताओं को भी काम में लगा दिया गया। जिन मुद्दों और नैरेटिव ने पहले BJP की चुनावी अभियान को प्रभावित किया, उन्हें पार्टी हाईकमान की ओर से नियुक्त इन दोनों खामोश कार्यकर्ताओं ने सफलतापूर्वक दूर कर दिया।

अब जब कार्यकर्ता सड़कों पर हैं और मतदाताओं में प्रधानमंत्री मोदी की अगुआई वाली डबल इंजन सरकार के पक्ष में भरोसा पैदा हो रहा है, तो BJP बहुमत के जादुई आंकड़े को छूने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। कुल मिलाकर महायुति और MVA के बीच एक और महायुद्ध के लिए मंच तैयार है और अब तक कमोबेश चुप रहने वाले मतदाता भी 20 नवंबर को खुलकर अपनी बात कहने वाले हैं।

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