Rajasthan Election 2023 : राजस्थान में जाट जिसके साथ उसी की बनेगी सरकार, जानिए क्या कहता है इस बार का समीकरण

Rajasthan Election 2023 : राज्य की कुल 200 विधानसभा सीटों में से 40 पर इस जाति का असर साफ दिखता है। इसलिए जाट वोटों पर मुख्य दलों-BJP और Congress के अलावा हनुमान बेनीवाल की RLP और हरियाणा की जननायक जनता पार्टी (JJP) की भी नजरें हैं। इस बार जाट समुदाय भी राज्य की अगली सरकार में अपनी ताकत बढ़ाना चाहता है

अपडेटेड Oct 20, 2023 पर 1:59 PM
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Rajasthan Election 2023 : जाट समुदाय से कई लोग तो इस बार किसी जाट को ही मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। जयपुर में हाल में आयोजित जाट महाकुंभ में यह मांग की गई। इस कार्यक्रम में सभी दलों के जाट नेता शामिल हुए।

राजन महान

Rajasthan Election 2023 : आजादी के 76 साल बाद भी देश का समाज और राजनीति जातिवाद की छाया से बाहर नहीं निकल सकी है। राजस्थान की राजनीति में हमेशा जाति की बड़ी भूमिका रही है। राज्य की आबादी में जाटों की हिस्सेदारी करीब 11 फीसदी रही है। हमेशा की तरह इस बार के विधानसभा चुनावों में भी कृषि से जुड़े इस जाति की बड़ी भूमिका रहने की उम्मीद है। वोटबैंक के लिहाज से जाट काफी अहम हैं। राज्य की कुल 200 विधानसभा सीटों में से 40 पर इस जाति का असर साफ दिखता है। इसलिए जाट वोटों पर मुख्य दलों-BJP और Congress के अलावा हनुमान बेनीवाल की RLP और हरियाणा की जननायक जनता पार्टी (JJP) की भी नजरें हैं।

इस बार सरकार में ताकत बढ़ाना चाहता है जाट समुदाय


इस बार जाट समुदाय भी राज्य की अगली सरकार में अपनी ताकत बढ़ाना चाहता है। इस समुदाय से जुड़े समूहों ने कम से 50 जाट उम्मीदवारों की जीत का लक्ष्य तय किया है। यह लक्ष्य कितना बड़ा है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2018 के विधानसभा चुनावों में 37 जाट उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी। हालांकि, दूसरी जातियों के विधायकों के मुकाबले यह संख्या काफी अधिक थी।

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जाट मुख्यमंत्री चाहता है समुदाय

जाट समुदाय से कई लोग तो इस बार किसी जाट को ही मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। जयपुर में हाल में आयोजित जाट महाकुंभ में यह मांग की गई। इस कार्यक्रम में सभी दलों के जाट नेता शामिल हुए। शुरू से ही जाटों का झुकाव कांग्रेस की तरफ रहा है। 1950 के दशक में राजस्थान की पहली कांग्रेस सरकार ने जागीरदारी व्यवस्था खत्म कर भूमि सुधार की शुरुआत की थी। तब से जाट कांग्रेस का साथ देते रहे हैं। कांग्रेस के बड़े जाट नेताओं में नाथूराम मिर्धा, रामनिवास मिर्धा, शीशराम ओला और पारसराम मदेरड़ा के नाम शामिल हैं। लेकिन, कई जाट नेता खासकर युवा इस बात से नाखुश हैं कि आज तक कोई जाट राज्य का मुख्यमंत्री नहीं बना है।

गहलोत पर लगा था जाट विरोधी होने का आरोप

भाजपा के जाटों को अन्य पिछड़ी जाति (OBC) का दर्जा देने में बड़ी भूमिका निभाने के बाद इस जाति का राजनीतिक रुझान बदला है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 1999 में लोकसभा चुनावों के दौरान जाटों को ओबीसी का दर्जा देने का वादा किया था। दरअसल, ओबीसी का दर्जा हासिल करने के लिए जाट 1990 के दशक से ही आंदोलन कर रहे थे। इस अभियान में कांग्रेस के कई जाट नेता शामिल थे। इनमें से कई मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के प्रतिद्वंद्वी थे। इससे यह धारणा बन गई कि जाटों को ओबीसी का दर्जा देने में गहलोत की दिलचस्पी नहीं थी। इसलिए उन्हें जाट विरोधी माने जाने लगा। यह दाग उनके दामन पर कई सालों तक लगा रहा। कांग्रेस के राजस्थान में कमजोर होने की वजह इस दल को लेकर जाटों की बेरूखी मानी गई। 1998 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को 156 सीटों पर जीत मिली थी। 2003 के चुनाव में कांग्रेस को बड़ी हार का सामना करना पड़ा।

उप-राष्ट्रपति के राजस्थान दौरे ने बढ़ाई गहलोत की परेशानी

इसलिए इस बार हर राजनीतिक दल चुनावों में जाटों का समर्थन हासिल करने के लिए हर मुमकिन कोशिश करता दिख रहा है। करीब दो हफ्ते पहले गहलोत ने उप-राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के बार-बार राजस्थान दौरों को लेकर उन पर निशाना साधा था। दरअसल, धनखड़ एक जाट हैं। गहलोत का मानना है कि बार-बार उनके राजस्थान आने से जाट वोटों पर असर पड़ सकता है। इसकी वजह यह है कि अब भी गहलोत धनखड़ को भाजपा का नेता मानते हैं। एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के बारे में ऐसी सोच सही नहीं है। उधर, धनखड़ ने राजस्थान के अपने दौरों के पक्ष में कहा है कि उनकी जड़ें राजस्थान में हैं।

आरपीएससी में नियुक्ति पर जाट नाराज

हाल में, सेना से रिटायर एक अफसर की राजस्थान पब्लिक सर्विस कमीशन में नियुक्ति को लेकर जाट समुदाय में नारागजगी देखने को मिली। रिटायर्ड कर्नल केसरी सिंह राठौर की नियुक्ति RPSC में 9 अक्टूबर को हुई। जाट नेताओं ने अपने समुदाय को लेकर सोशल मीडिया में आए उनके पोस्ट्स के आधार पर उन्हें पूर्वाग्रह से ग्रसित बताया। इस बारे में राजस्थान जाट महासभा ने गवर्नर को एक पत्र भी लिखा। इसमें यह कहा गया है कि राठौड़ की नियुक्ति से आरपीएसी की प्रतिष्ठा को ठेस लगी है।

जाटों को नाराज नहीं करना चाहते गहलोत

जाटों की नाराजगी को देखते हुए गहलोत ने यह स्वीकार करने में देर नहीं की कि राठौड़ की टिप्पणियां निंदनीय और दुर्भाग्यपूर्ण हैं। इसके बावजूद भी राठौड़ को लेकर जाटों की नाराजगी कम नही हुई। जाट नेताओं ने राठौड़ के इस्तीफे की मांग की। उनका कहना था कि खुद गहलोत ने यह माना है कि उन्हें राठौड़ के बयानों से चोट पहुंची है। इसलिए राठौड़ का इस्तीफा जरूरी है। दरअसल, अगर कांग्रेस को राजस्थान की सत्ता में बने रहना है तो जाटों का समर्थन जरूरी है। यही वजह है कि जब 2020 में बगावत के बाद सचिन पायलट को राज्य कांग्रेस अध्यक्ष के पद से हटाया गया था तब गहलोत ने गोविंद सिंह दोटसरा को यह जिम्मेदारी दी थी। उन्हें शेखावाटी इलाके का जाट नेता माना जाता है।

भाजपा भी डाल रही डोरे

उधर, भाजपा वसुंधरा राजे की जाट बहू की छवि का इस्तेमाल कर जाटों का समर्थन हासिल करने की कोशिश करती रही हैं। लेकिन, भाजपा में इस बार राजे के हाशिया पर आ जाने से जाटों का समर्थन हासिल करने में भाजपा को दिक्कत आ रही है। जिस तरह से देशभर में कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों की नाराजगी देखने को मिली थी, उससे जाटों के साथ भाजपा के रिश्ते पहले से अच्छे नहीं चल रहे हैं। चुनाव के साल में सतीष पुनिया को राज्य बीजेपी प्रमुख के पद से हटाए जाने से भी जाटों को निराशा हुई है।

(राजन महान राजस्थान के एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं। वह एनडीटीवी और स्टार न्यूज राजस्थान के प्रमुख रह चुके हैं। वह जयपुर स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ राजस्थान में जर्नलिज्म के प्रोफेसर भी रह चुके हैं। यहां व्यक्त विचार उनके अपने विचार हैं। इनका इस पब्लिकेशन से कोई संबध नहीं है)

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