Rajasthan Election 2023: राजस्थान में कितना सफल होगा जातीय गणित का फॉर्मूला?
राजस्थान में चुनाव प्रचार अपने चरम पर है। राज्य में 25 नवंबर को चुनाव है। राजस्थान की दोनों मुख्य पार्टियां एक-दूसरे पर ताबड़तोड़ हमले कर रही हैं। राहुल गांधी का कहना है कि अगर बीजेपी सत्ता में आती है, तो वह कांग्रेस द्वारा चलाई जा रही सभी स्कीम्स को रोक देगी, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर आतंकवादियों से सहानुभूति रखने का आरोप लगाया है
Rajasthan Election 2023: राजस्थान में हिंदुओं की आबादी 89 पर्सेंट है, मुसलमान 9 पर्सेंट हैं और अन्य धार्मिक समुदाय की आबादी 2 पर्सेंट है।
राजस्थान में चुनाव प्रचार अपने चरम पर है। राज्य में 25 नवंबर को चुनाव है। राजस्थान की दोनों मुख्य पार्टियां एक-दूसरे पर ताबड़तोड़ हमले कर रही हैं। राहुल गांधी का कहना है कि अगर बीजेपी सत्ता में आती है, तो वह कांग्रेस द्वारा चलाई जा रही सभी स्कीम्स को रोक देगी, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर आतंकवादियों से सहानुभूति रखने का आरोप लगाया है।
जाति की राजनीति पर जोर
एक स्टडी के मुताबिक, ज्यादातर भारतीय (55 पर्सेंट) अपनी जाति या धर्म के राजनेताओं को पसंद करते हैं। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी और सीएसडीएस (CSDS) ने मिलकर यह स्टडी की थी। स्टडी की मानें तो इस तरह की राजनीति के मामले में राजस्थान दूसरे नंबर पर था, जहां 62 पर्सेंट लोगों ने अपनी जाति या धर्म के नेता को अपनी पसंद बताया था।
राज्य में हिंदुओं की आबादी 89 पर्सेंट है, मुसलमान 9 पर्सेंट हैं और अन्य धार्मिक समुदाय की आबादी 2 पर्सेंट है। राज्य की कुल आबादी में पिछड़ा वर्ग (OBC) की संख्या 48 से 50 पर्सेंट है। इसके अलावा अनुसूचित जाति 18 पर्सेंट, अनुसूचित जनजति 13 पर्सेंट और सवर्ण (सामान्य वर्ग) 18 से 20 पर्सेंट हैं। राज्य के प्रभावशील समुदाय में जाट (10-12 पर्सेंट), राजपूत (8-9 पर्सेंट), ब्राह्मण, गुर्जर और मीणा (6-7 पर्सेंट) हैं। मुस्लिम समुदाय की तकरीबन एक तिहाई आबादी ओबीसी है।
टिकटों के लिए दबंग जातियो में घमासान
राज्य की राजनीति में वर्चस्व के लिए जाट और राजपूतों के बीच हमेशा से प्रतिद्वंद्विता रही है। मीणा (अनुसूचित जनजाति) और गुर्जर ( अति पिछड़ा) के बीच भी काफी संघर्ष देखने को मिलता है। गुजर्र भी अब खुद को अनुसूचित जनजाति के दायरे में शामिल करने की मांग कर रहे हैं। ऐसा कहा जाता है कि जाट और राजपूत एक जगह वोट नहीं करते हैं, जबकि गुर्जर और मीणा में समर्थन को लेकर अलग-अलग राय होती है। राजस्थान में अनुसूचित जाति के लिए 33 विधानसभा सीटें और अनुसूचित जनजाति के लिए 25 सीटें आरक्षित हैं।
पारंपरिक तौर पर राजपूत, व्यापारी वर्ग और ओबीसी बीजेपी के समर्थक रहे हैं, जबकि कांग्रेस को ब्राह्मणों, जाट, मुसलमान, गुर्जर, अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों का समर्थन मिलता रहा है। हालांकि, अब वोटरों की पसंद में बदलाव भी देखने को मिल रहा है और ब्राह्मणों का समर्थन अब कांग्रेस से बीजेपी की तरफ चला गया है। गहलोत (माली समुदाय) को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद जाटों का भी कांग्रेस से मोहभंग हो गया था।
बदलती रहती है समुदायों की पसंद
अलग-अलग समुदायों के बीच पार्टियों और उम्मीदवारों की पसंद का मामला स्थायी नहीं है। राजस्थान में जाति/समुदाय के समर्थन में बदलाव स्वाभविक है। साल 2008 और 2013 के चुनावों में जाटों का वोट कांग्रेस और बीजेपी के बीच बंट गया था, जबकि 2018 में इस समुदाय ने अन्य लोगों और पार्टियों को भी समर्थन दिया था। 2019 के लोकसभा चुनावों में इस समुदाय के 80 पर्सेंट से भी ज्यादा लोगों ने बीजेपी का समर्थन किया था, क्योंकि पार्टी ने आरएलपी के साथ गठबंधन किया था।
इसी तरह, गुर्जर पारंपरिक तौर पर बीजेपी के वोटर रहे हैं, लेकिन 2018 में अपने नेता सचिव पायलट की वजह से कांग्रेस के लिए वोट दिया था। दरअसल, इस समुदाय को लग रहा था कि सचिन पायलट राज्य के मुख्यमंत्री बन सकते हैं।
टिकटों के बंटवारे से मिल सकते हैं समर्थन के संकेत
बीजेपी ने कांग्रेस के मुकाबले ज्यादा सवर्ण उम्मीदवारों को टिकट दिया है, क्योंकि राज्य की सवर्ण जातियां पारंपरिक तौर पर बीजेपी समर्थक रही हैं। बीजेपी ने विधानसभा चुनाव में 63 सवर्ण उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जबकि कांग्रेस ने 44 ऐसे उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा है। ओबीसी उम्मीदवारों के मामले में आंकड़ा तकरीबन बराबर (72 बनाम 70) है। जाट, गुर्जर, बनिया का प्रतिनिधित्व दोनों पार्टियों के लिए तकरीबन बराबर है।
कांग्रेस ने अनुसूचित जनजाति के 33 उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जबकि बीजेपी ने इस समुदाय से 29 उम्मीदवार उतारे हैं। दोनों समुदायों ने अनुसूचित जाति के 35-35 उम्मीदवारों को टिकट दिया है। बीजेपी ने 3 सिखों को भी टिकट दिया है, जबकि कांग्रेस ने 15 मुसलमानों को उम्मीदवार बनाया है।
जातीय जनगणना
कांग्रेस ने सत्ता में आने पर जाति जनगणना कराने का वादा किया है। इसके अलावा, गहलोत सरकार ने अति पिछड़ी जातियों के लिए 6 प्रतिशत अतिरिक्त आरक्षण का भी वादा किया है। हालांकि, इसको लेकर वोटरों के बीच भ्रम की स्थिति है। दरअसल, यह स्पष्ट नहीं है कि 6 पर्सेंट अतिरिक्त आरक्षण जातीय जनगणना के बाद दिया जाएगा या इससे पहले।