विजय कुमार गाबा

विजय कुमार गाबा
Budget 2023: उम्मीद है कि 1 फरवरी, 2023 को पेश होने वाला यूनियन बजट 2024 (Union Budget) के लोकसभा चुनावों से पहले आखिरी पूर्ण बजट होगा। इसलिए इस बजट से काफी ज्यादा उम्मीदें हैं। इंडस्ट्रीज, ट्रेडर्स, इनवेस्टर्स, कंज्यूमर्स, किसान सहित सभी लोगों ने फाइनेंस मिनिस्टर को अपनी मांगों के बारे में बताया है। उन्होंने कई तरह के इनसेंटिव और अपने लिए आसान टैक्स रीजीम की मांग की है। जहां तक कैपिटल मार्केट्स की बात है तो अनूकुल टैक्स सिस्टम और इनवेस्टमेंट को बढ़ावा देने वाले इनसेंटिव की मांग सबसे ज्यादा की गई है। पिछले कुछ सालों से बजट से पहले लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस (LTCG) और डिविडेंड की सबसे ज्यादा चर्चा होती है। इसे लेकर कई तरह की अटकलें भी लगाई जाती हैं। इस साल यह मसला ज्यादा अहम हो गया है, क्योंकि सरकारी अधिकारियों ने कैपिटल गेंस के टैक्स के नियमों को तर्कसंगत बनाए जाने के संकेत दिए हैं।
मेरा मानना है कि सरकार को कैपिटल गेंस, डिविडेंड्स और कैपिटल गेंस के ट्रांजेक्शंस के फ्रेमवर्क को परिभाषित करने के लिए इस मौके का इस्तेमाल करना चाहिए। साथ ही फाइनेंशियल एसेट्स में इनवेस्टमेंट को बढ़ावा देने के लिए इनसेंटिव के ऐलान किए जा सकते हैं। अब तक यह प्रोसेस व्यवस्थित नहीं रहा है।
सरकार फिस्कल इनसेंटिव और टैक्स कनसेशंस की इजाजत देने के लिए 'रिस्क' और 'इंडियन इकोनॉमी में अहम योगदान' को परिभाषित करने के बारे में सोच सकती है। टैक्स कनसेशंस और फिस्कल इनसेंटिव के फायदे किसी इनवेस्टर को तभी दिए जा सकते हैं जब वह दोनों शर्तों को पूरा करेगा।
किसी नई कंपनी के शेयरों के आईपीओ के सब्सक्राइबर्स रिस्क लेते हैं और आंत्रप्रेन्योर्स को रिस्क कैपिटल मुहैया कराते हैं। ऐसे इनवेस्टर्स को ऐसे शेयरों की बिक्री पर कैपिटल गेंस टैक्स से पूरी छूट दी जा सकती है। हालांकि, 50 साल की पुरानी प्रॉफिट बनाने वाली सरकारी कंपनी के 3 से 4 फीसदी डिविडेंड यील्ड वाले ऑफर फॉर सेल के सब्सक्राइबर्स न तो ज्यादा रिस्क उठाते हैं और न ही कंपनी को किसी तरह का रिस्क कैपिटल प्रोवाइड कराते हैं। इस तरह के इनवेस्टमेंट को टैक्स इनसेंटिव्स देने की जरूरत नहीं है।
इसी तरह सेकेंडरी मार्केट में किसी कंपनी के शेयर को खरीदने से उस कंपनी को सीधे तौर पर कोई फायदा नहीं होता है। दरअसल, ऐसी स्थिति में सेलर अपना रिस्क बायर को ट्रांसफर कर देता है। ऐसे सेलर को कैपिटल गेंस पर टैक्स में रियायत देना मौजूदा स्थितियों में तर्कसंगत नहीं लगता है। यह तब सही होता है जब इंडियन मार्केट शुरुआती अवस्था में होता है और हमें इसमें हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन देने की जरूरत पड़ती। सेलर से रिस्क लेने वाले बायर के लिए ट्रांजेक्शन की लोअर कॉस्ट के बारे में सोचा जा सकता है। बायर को सिक्योरिटीज ट्रांजेक्शन टैक्स (STT) और स्टैंप ड्यूटी से छूट दी जा सकती है।
अनुभव से पता चलता है कि सिक्योरिटीज को लंबे समय तक रखने से इनवेस्टर्स का रिटर्न बढ़ जाता है, जिससे रिस्क घट जाता है। इसके अलावा इस बात के बहुत कम सबूत है कि लिस्टेड स्टॉक को एक साल से ज्यादा या तीन साल तक रखने पर पर एक तरीके से इकोनॉमी या कैपिटल मार्केट्स को मदद मिलती है।
नए आईपीओ, पीई फंड्स या वेंचर फंड्स में निवेश के मामले में कैपिटल मार्केट के डेवलपमेंट और इकोनॉमी की ग्रोथ की दलील दी जा सकती है। इससे बिजनेस को जरूरत के हिसाब से रिस्क कैपिटल मिल जाता है। लेकिन, यह बात सेकेंडरी मार्केट के मामले में लागू नहीं होती। इस बात के बहुत कम सबूत है कि होल्डिंग पीरियड लंबा होने से मार्केट लिक्विडिटी बढ़ती है या बाजार के उतार-चढ़ाव में कमी आती है।
दरअसल, यह जानी हुई बात है कि टैक्स के लिहाज से एलटीसीजी एग्जेम्प्शन का इस्तेमाल मनी लाउंड्रिंग के लिए किया गया है। पिछले कुछ सालों में रेगुलेटर और टैक्सेशन अथॉरीटीज ने मनी लाउंड्रिंग के लिए एलटीसीजी टैक्सेशन के प्रावधानों के दुरुपयोग के मामलें की जांच शुरू की है।
एलटीसीजी टैक्स में व्यापक बदलाव
1. फाइनेंस मिनिस्ट्री टैक्स कनसेशन या इनवेस्टमेंट से संबंधित किसी तरह का इनसेंटिव देने के लिए 'assuming risk' और 'इकोनॉमी में खास कंट्रिब्यूशन' को शर्त के रूप में तय कर सकती है।
2. नए बिजनेसेज के आईपीओ, प्री-आईपीओ इनवेस्टर्स, वेंचर कैपिटलिस्ट्स, एंजेल इनवेस्टर्स और दूसरे ऐसे इनवेस्टर्स जो कुछ रिस्क लेते हैं और आंत्रप्रेन्योर्स को रिस्क कैपिटल मुहैया कराते हैं, उन्हें इस तरह से हासिल किए गए शेयरों की बिक्री पर कैपिटल गेंस से छूट या पूरा टैक्स एग्जेम्प्शन दिया जा सकता है।
3. ऐसे इनवेस्टर्स जो रिस्क के साथ कंपनियों को अनसेक्योर्ड डिपॉजिट प्रोवाइड कराते हैं, उन्हें रिवॉर्ड देने पर विचार किया जा सकता है।
4. इसी तरह का ट्रीटमेंट नॉन-कनवर्टिबेल डिबेंचर्स के सब्सक्राइबर्स को भी देने पर विचार किया जा सकता है।
5. डे ट्रेडर्स, जॉबर्स और मार्केट मेकर्स कैपिटल मार्केट्स को मैटेरियल लिक्विडिटी प्रोवाइड कराते हैं और कॉस्ट ऑफ ट्रेड के इम्पैक्ट को कम करने में मदद करते हैं। ऐसे में वे रिस्क-टेकिंग में मदद करते हैं। ऐसे ट्रेडर्स और मार्केट मेकर्स को एसटीटी से छूट देकर इनसेंटिवाइज किया जा सकता है।
(विजय कुमार गाबा इक्वल इंडिया फाउंडेशन के डायरेक्टर हैं। यहां व्यक्त विचार गाबा के व्यक्तिगत हैं। ये इस पब्लिकेशन के विचार नहीं हैं।)
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