सच्चिदानंद शुक्ला

सच्चिदानंद शुक्ला
Budget 2023: ग्लोबल इकोनॉमी की ग्रोथ में 2023 में तेज गिरावट आने का अनुमान है। बेस इफेक्ट के साथ एडजस्ट करने पर यह उतनी कम हो सकती है, जितनी यह 2009 के वित्तीय संकट के बाद थी। इसकी वजह यह है कि यूक्रेन में चल रहा टकराव कभी न खत्म होने वाला संघर्ष बनता दिख रहा है। ग्लोबल ग्रोथ में कमी का असर इंडियन इकोनॉमी पर भी पड़ेगा। खासकर इसके कंजम्प्शन इंजन पर पड़ने के आसार हैं, जहां रिकवरी पिछले कुछ समय से K-shaped रही है।
यूनियन बजट से पहले अलग-अलग सेक्टर ने कंजम्प्शन बढ़ाने के लिए अपनी-अपनी मांगों के बारे में बताया है। इस फाइनेंशियल ईयर (2022-23) की पहली तिमाही में प्राइवेट कंजम्प्शन कोरोना से पहले के मुकाबले करीब 9.9 फीसदी ज्यादा था। लेकिन, कंजम्प्शन में देखी जा रही रिकवरी में कुछ बड़े फर्क देखने को मिले हैं। Nielsen IQ की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, FY23 की दूसरी तिमाही में अर्बन मार्केट्स का वॉल्यूम 1.2 फीसदी बढ़ा है, लेकिन रूरल मार्केट्स के वॉल्यूम में गिरावट आई है। FY23 की पहली तिमाही में आई 2.4 फीसदी की गिरावट के मुकाबले दूसरी तिमाही में FMCG की बिक्री में 3.6 फीसदी की कमी आई है। इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन डेटा के सप्लाई साइड के विश्लेषण से भी वॉल्यूम में गिरावट देखने को मिली है। कंज्यूमर नॉन-ड्यूरेबल्स में पिछले लगातार तीन महीनों में गिरावट आई है।
सवाल है कि स्थिति में सुधार के लिए क्या किया जा सकता है?
1. इनफ्लेशन में कमी लाने और रियल इनकम को सपोर्ट करने की जरूरत
केंद्र और राज्य सरकारों को महंगाई के असर से बचाने के लिए समाज के कमजोर वर्गों पर फोकस बनाए रखने की जरूरत है। लेकिन, उन्हें यह ध्यान रखना होगा कि कुल डिमांड ज्यादा न बढ़े क्योंकि इससे इनफ्लेशन बढ़ने का खतरा पैदा होगा। कंजम्प्शन बढ़ाने का एक रास्ता फिस्कल कंसॉलिडेशन हो सकता है। फिस्कल डेफिसिट के बजट लक्ष्य पर फोकस बनाए रखना होगा। घाटा में कमी आने से कुल डिमांड में नरमी आएगी। इससे RBI पर मौद्रिक नीति में सख्ती लाने का दबाव कम होगा।
2. पैकेज नहीं राहत देने की जरूरत
ग्रोथ में सुस्ती और खासकर कोरोना के बाद की रिकवरी और यूक्रेन में युद्ध के बीच पॉलिसी के लेवल पर जरूरी उपाय होने चाहिए। इनफ्लेशन के बीच जरूरतमद लोगों को फाइनेंशियल और सोशल बेनेफिट के दायरे में लाना जरूरी है। इसके लिए ज्यादा इनक्लूसिव इकोनॉमी पर फोकस करने की जररूत है। हालांकि, राहत और पैकेज के बीच फर्क करना जरूरी है। सरकार को समाज के कमजोर वर्ग के लोगों को राहत और सपोर्ट करने पर फोकस बनाए रखना होगा। इसके लिए तिलहन पर ड्यूटी में कमी, पंप प्राइसेज में कमी, जरूरतमंद लोगों को मुफ्त खाद्यान्न और फर्टिलाइजर सब्सिडी बढ़ाने जैसे उपाय जरूरी हैं।
3. पब्लिक एक्सपेंडिचर के जरिए ग्रोथ बढ़ाने की कोशिश
ग्रोथ पर फोकस बनाए रखना जरूरी है। कई एजेंसियों ने 2023 और 2024 में इंडिया की ग्रोथ घटने का अनुमान जताया है। ऐसे में सरकार को रिफॉर्म्स के उपायों को जारी रखने खासकर लॉजिस्टिक्स के मोर्चे पर ऐसा करने और पूंजीगत खर्च के जरिए इकोनॉमी को सपोर्ट जारी रखने की जरूरत है। पब्लिक एक्सपेंडिचर बढ़ाकर ग्रोथ को बढ़ावा देने ज्यादा बेहतर तरीका है।
4. पॉलिसी में अप्रत्याशित बदलाव नहीं
सरकार को पॉलिसी में गैर-जरूरी बदलाव करने की जरूरत नहीं है। उसे टैक्स या सेक्टर से जुड़ी पॉलिसी में अचानक बड़े बदलाव लाने से बचना होगा। इस वक्त टैक्स सहित दूसरे मामलों में अचानक पॉलिसी में बड़े बदलाव के खराब नतीजें देखने को मिल सकते हैं। इसका असर पूंजीगत खर्च के लिए पैसे जुटाने की सरकार की क्षमता पर भी पड़ेगा। हाल में इंग्लैंड में अचानक टैक्स में की गई कमी के खराब असर देखने को मिले थे।
(सच्चिदानंद शुक्ला महिंद्रा एंड महिंद्रा के चीफ ग्रुप इकोनॉमिस्ट हैं। यहां व्यक्त विचार उनके व्यक्तिगत विचार हैं ये पब्लिकेशन के विचार को व्यक्त नहीं करते हैं।)
हिंदी में शेयर बाजार, स्टॉक मार्केट न्यूज़, बिजनेस न्यूज़, पर्सनल फाइनेंस और अन्य देश से जुड़ी खबरें सबसे पहले मनीकंट्रोल हिंदी पर पढ़ें. डेली मार्केट अपडेट के लिए Moneycontrol App डाउनलोड करें।