अगले महीने पेश होने वाले यूनियन बजट को लेकर कई अनुमान लगाए जा रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण का अंतरिम बजट से पहले का वह बयान है, जिसमें उन्होंने कहा था कि बड़े ऐलान के लिए जुलाई में पेश होने वाले फुल बजट का इंतजार करना होगा। उन्होंने 1 फरवरी को पेश अंतरिम बजट में कोई बड़ा ऐलान नहीं किया था। हालांकि, लोकसभा चुनावों के बाद राजनीति के स्तर पर बदलाव आया है। केंद्र की नई एनडीए सरकार सहयोगी दलों पर निर्भर है। इस बीच, बीते कुछ दिनों से यह चर्चा चल रही है कि सरकार इनकम टैक्स की बेसिक एग्जेम्प्शन लिमिट को बढ़ा सकती है। सरकार वेल्फेयर स्कीम पर खर्च भी बढ़ा सकती है।
बजट से सरकार की पॉलिसी के बारे में संकेत मिलेंगे
इधर, बॉन्ड मार्केट (Bond Market) शांत बना हुआ है। बॉन्ड यील्ड (Bond Yield) 7 फीसदी के करीब बनी हुई है। इस बीच, नजरें गठबंधन सरकार के पहले बजट पर लगी हैं। इस बजट से नई सरकार की पॉलिसी की दिशा का पता चलेगा। पिछले चार साल में फिस्कल पॉलिसी (Fiscal Policy) का फोकस कैपिटल फॉर्मेशन बढ़ाने पर रहा है। सरकार ने पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च बढ़ाया है। साथ ही सरकार ने फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) घटाने पर फोकस बढ़ाया है। इसे वित्त वर्ष 2025-26 तक 4.5 फीसदी पर लाने का टारगेट सरकार ने तय किया है। FY22 में यह जीडीपी के 6.8 फीसदी तक पहुंच गया था।
कुल बजट में बढ़ी है पूंजीगत खर्च की हिस्सेदारी
पिछले कुछ सालों में अपने खर्च के तरीके को बदला है। एक तरफ उसने पूंजीगत खर्च बढ़ाया है तो दूसरी तरफ वेल्फेयर स्कीम पर खर्च घटाने की कोशिश की है। इससे उसे अपना कुल खर्च नियंत्रण में रखने में मदद मिली है। इसके चलते कुल बजट में पूंजीगत खर्च की हिस्सेदारी बढ़कर 23 फीसदी से ज्यादा हो गई है। कोविड से पहले यह हिस्सेदारी करीब 12 फीसदी थी। पूंजीगत खर्च और जीडीपी का रेशियो भी बढ़कर 3.2 फीसदी पर पहुंच गया है।
लंबी अवधि में बॉन्ड मार्केट का आउटलुक पॉजिटिव
सरकार के खर्च बढ़ाने का असर इनफ्लेशन पर पड़ सकता है। इसके बावजूद फिलहाल बॉन्ड मार्केट की नजरें सरकार के फिस्कल कंसॉलिडेशन के रोडमैप पर होंगी। माना जा रहा है कि सरकार की फिस्कल पॉलिसी में बड़ा बदलाव नहीं आएगा। ऐसे में लंबी अवधि में इंडियन बॉन्ड मार्केट का आउटलुक पॉजिटिव लगता है।
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1-2 साल में बॉन्ड यील्ड में नरमी के आसार
ग्लोबल बॉन्ड सूचकांकों में इंडियन बॉन्ड्स के शामिल होने और घरेलू बाजार में फाइनेंशियल सेविंग्स बढ़ने की वजह से बॉन्ड मार्केट में डिमांड स्ट्रॉन्ग बनी रहेगी। उधर, फिस्कल कंसॉलिडेशन पर सरकार के फोकस बढ़ाने से बॉन्ड्स की सप्लाई कम हो रही है। ऐसे में डिमांड-सप्लाई का संतुलन लंबी अवधि के बॉन्ड्स के पक्ष में दिख रहा है। अगले 1-2 साल में लॉन्ग टर्म बॉन्ड्स की यील्ड में कमी आने के आसार हैं। इससे फिक्स्ड इनकम के निवेशकों के लिए निवेश के मौके बनेंगे।