सरकार कृषि कर्ज का टारगेट बढ़ाने के बारे में सोच रही है। इसका ऐलान वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण 23 जुलाई को यूनियन बजट में कर सकती हैं। वह एग्रीकल्चर लोन के लिए 25 लाख करोड़ रुपये का आवंटन कर सकती हैं। यह एक साल पहले के मुकाबले 25 फीसदी की वृद्धि होगी। एक सरकारी अधिकारी ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह ब्लॉक लेवल पर नाबार्ड की तरफ से किए पोटेंशियल लिंक्ड क्रेडिट प्लान (पीएलसीपी) पर निर्भर करेगा। पीसीएलपी से रूरल इकोनॉमिक एक्टिविटीज की संभावनाओं के बारे में पता चलता है।
FY24 में टारगेट 20 लाख करोड़ रुपये
सरकार ने वित्त वर्ष 2023-24 में कृषि कर्ज (Agriculture Credit) के लिए 20 लाख करोड़ रुपये का टारगेट तय किया था। बाद में यह बढ़कर 24.84 लाख करोड़ रुपये हो गया था। अधिकारी ने बताया, "क्षेत्रों में कृषि गतिविधियों की पहचान करने के बाद कर्ज का टारगेट तय किया जाता है। यह काम नाबार्ड (NABARD) करता है। वह इस बारे में जानकारियां वित्त मंत्रालय के साथ शेयर करता है। इससे पता चलता है कि FY25 के लिए 25 लाख करोड़ रुपये का टारगेट तय किया जा सकता है। इस बारे में अंतिम फैसला वित्त मंत्रालय लेगा।"
कृषि गतिविधियों के अनुमान के आधारित है कर्ज का लक्ष्य
किसी क्षेत्र में संभावित कृषि गतिविधियों का पता लगाने में वन डिस्ट्रिक्ट-वन क्रॉप एनिशिएटिव को भी शामिल किया जाता है। यह एनिशिएटिव वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ओडीओपी) को बढ़ावा देने वाली व्यापक स्ट्रेटेजी का हिस्सा है। इसका मकसद विशेष उत्पादों की पहचान कर उसे बढ़ावा देकर क्षेत्रीय संतुलित विकास करना है। चुने गए उत्पादों में आम तौर पर कृषि कमोडिटीज शामिल होती हैं।
दक्षिण के राज्यों को मिला 50% से ज्यादा कर्ज
एग्रीकल्चर में क्रेडिट फ्लो क्षेत्र के लिहाज से एक समान नहीं रहा है। नाबार्ड और बैंकों की कोशिश इस असमानता को दूर करन की रही है। फाइनेंशियल ईयर 2023-24 में 50.5 फीसदी कृषि कर्ज दक्षिण के पांच राज्यों को डिस्बर्स किया गया था। इनमें आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल शामिल थे। उत्तर के 5 राज्यों को कुल कृषि कर्ज का करीब 15 फीसदी हिस्सा मिला था। इनमें राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, जम्मू एवं कश्मीर और हिमाचल प्रदेश शामिल थे।
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ऊत्तर-पूर्व के राज्यों को सबसे कम कर्ज
बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे पूर्व के राज्यों को कुल कृषि कर्ज का सिर्फ 8.5 फीसदी हिस्सा मिला था। 8 उत्तर-पूर्वी राज्यों को तो सिर्फ 0.66 फीसदी हिस्सा मिला था।