आम बजट केंद्र सरकार के हर वित्त वर्ष के अनुमानित आय (Income) और अनुमानित खर्च (Expenditure) का लेखा-जोखा होता है। जब सरकार का खर्च उसकी आमदनी से ज्यादा होती है तो उसे घाटा यानी डेफिसिट (Deficit) कहते हैं। चूंकि, सरकार को कल्याणकारी योजनाओं और विकास के दूसरे कार्यों पर खर्च करना पड़ता है, ताकि देश की तरक्की हो सके, तो इस घाटे को पूरा करने के लिए जो व्यवस्था अपनाई जाती है, उसे घाटे की वित्त व्यवस्था यानी डेफिसिट फाइनेंसिंग (Deficit Financing) कहते हैं। इस व्यवस्था के तहत बाहरी श्रोतों के माध्यम से राजस्व के अंतर को भरा जाता है। इसके तहत सरकार नए नोट छापकर या उधारी लेकर या बॉन्डों की बिक्री से इस अंतर को पूरा करती है।
इसलिए जरूरी होता है डेफिसिट फाइनेंसिंग
भारत जैसे विकासशील देशों में इकनॉमिक ग्रोथ को प्राथमिकता देने और तेजी ,से विकास करने के लिए अधिक से अधिक पैसों की जरूरत पड़ती है। इसकी एक बड़ी वहज यह होती है कि विकास के इन कार्यों मसलन इंफ्रास्टक्चर के डेवलपमेंट में प्राइवेट सेक्टर आगे नहीं आता है और उम्मीद करता है कि जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर सरकार उपलब्ध कराए। ऐसे में जब प्राइवेट सेक्टर बड़ा खर्च करने से बचता है तो वित्तीय संसाधनों को जुटाने की जिम्मेदारी सरकार पर आ जाती है। लेकिन, अमूमन टैक्स और नॉन-टैक्स रेवेन्यू इन संसाधनों को जुटाने के लिए पर्याप्त नहीं होते हैं। ऐसे में डेफिसिट फाइनेंसिंग के लिए सरकार नए नोट छापती है या उधारी लेती है।
डेफिसिट फाइनेंसिंग के नुकसान
डेफिसिट फाइनेंसिंग के लिए नए नोट छापने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इससे महंगाई काफी बढ़ जाती है और गरीबों को लिए जीना मुहाल हो जाता है। नए करेंसी नोटों की प्रिंटिंग से अर्थव्यवस्था में पैसे का फ्लो बढ़ जाता है। इससे महंगाई बढ़ती है। देश में वस्तुओं और सेवाओं के दाम बढ़ जाते हैं। इसके अलावा डेफिसिट फाइनेंसिंग का निवेश पर भी बुरा असर पड़ता है। जब अर्थव्यवस्था में महंगाई ज्यादा होती है तो प्रोडक्ट्स की उत्पादन की लागत बढ़ जाती है, जिससे निवेश कम हो जाता है और अंततः देश फिर से मंदी और गरीबी के जाल में फंस जाता है।
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