Union Budget 2023 : क्या भारतीय कंपनियों को ग्लोबल सुपरपावर बनाने में मदद कर पाएगा यह बजट?

Union Budget 2023 : अगले साल होने वाले आम चुनाव से पहले इस आखिरी पूर्ण बजट से कॉर्पोरेट सेक्टर को कोई बड़ी सौगात मिलने की उम्मीद कम ही है। राजकोषीय घाटा चिंताजनक स्थिति में है और अर्थव्यवस्था पहले से कर्ज और सब्सिडी बिल्स के बोझ से दबी हुई है। वहीं ग्लोबल ग्रोथ 2022 की 2.9 फीसदी की तुलना में घटकर 1.8 फीसदी रहने का अनुमान है।

अपडेटेड Jan 12, 2023 पर 11:09 AM
जब बिजनेस लीडर्स 1 फरवरी को वित्त मंत्री का भाषण सुनेंगे, तो वे शायद टैक्स छूट या कस्टम ड्यूटीज में बदलाव की तुलना में व्यापक संकेतों की तलाश में होंगे

Sundeep Khanna

Union Budget 2023 : अगले साल होने वाले आम चुनाव से पहले इस आखिरी पूर्ण बजट से कॉर्पोरेट सेक्टर को कोई बड़ी सौगात मिलने की उम्मीद कम ही है। राजकोषीय घाटा चिंताजनक स्थिति में है और अर्थव्यवस्था पहले से कर्ज और सब्सिडी बिल्स के बोझ से दबी हुई है। वहीं ग्लोबल ग्रोथ 2022 की 2.9 फीसदी की तुलना में घटकर 1.8 फीसदी रहने का अनुमान है। इसमें चुनावी साल से पहले की कुछ घरेलू राजनीति को जोड़ लें तो राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के साथ  प्रमुख विपक्ष कुछ सक्रिय होता दिख रहा है।

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इन फैक्टर्स को देखें तो मोदी सरकार की प्राथमिकताएं उम्मीद से कुछ अलग हो सकती हैं। इस प्रकार, जब बिजनेस लीडर्स 1 फरवरी को वित्त मंत्री का भाषण सुनेंगे, तो वे शायद टैक्स छूट या कस्टम ड्यूटीज में बदलाव की तुलना में व्यापक संकेतों की तलाश में होंगे।

उनके दिमाग में सबसे पहले यही होगा कि क्या सरकार उपभोक्ताओं को टैक्स में छूट या आसान क्रेडिट के माध्यम से अधिक पैसा देकर मांग बढ़ाने के नए तरीके खोजेगी। ग्रामीण इलाकों में संकट के साथ ही विभिन्न सेक्टर्स में छंटनी के कारण खपत कम हो गई है। इसका समाधान इतना आसान नहीं हो सकता और बजटीय कवायद से इतर ढांचागत बदलाव करने की जरूरत होगी।

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क्या शुरू होगा सुधारों का नया दौर

1 फरवरी को पेश होने वाले बजट में सबसे अच्छी बात यह हो सकती है कि सरकार सुधारों के एक नए दौर को शुरू करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दिखाए। नए बाजार से नई मांग पैदा हो सकती है।

राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के रूप में ग्रीन एनर्जी, सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रिक वाहनों की पहचान करने के बाद अब यह देखना होगा कि आने वाले बजट इन क्षेत्रों में निवेश के लिए कंपनियों को आमंत्रित करने और सुविधा प्रदान करने के लिए क्या पहल की जाती हैं। पहले से ही कई योजनाएं और सब्सिडी मौजूद हैं, जो कम से कम घोषणाओं के संदर्भ में कुछ गतिविधियां पैदा करती हैं। हालांकि, भारत को इन उभरते हुए क्षेत्रों एक ग्लोबल प्लेयर बनाने के लिए सरकार को काफी काम करने की जरूरत है।

सरकार और कंपनियों को मिलकर करना होगा काम

मौजूदा दौर में, यह स्पष्ट होना चाहिए कि सरकारों और कंपनियों को मिलकर काम करना होगा। आज के सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग में ताइवान का दबदबा, तकनीक में अमेरिका का दबदबा, जापानी मैन्युफैक्चरिंग की ताकत और निश्चित रूप से ग्लोबल सप्लाई चेन पर चीन का दबदबा, सिर्फ उनकी प्रमुख कंपनियों के जोश के दम पर संभव नहीं था।

यह हमेशा सरकारों के सपोर्ट, सक्रिय खर्च और देश की दिग्गज कंपनियों को बढ़ावा दिए जाने से संभव हुआ है। भारत ने भी 1960 और 1970 के दशक में ऐसा किया। बदकिस्मती से, उसने गलत मॉडल चुना और गलत तरह के कॉर्पोरेट सेक्टर- पब्लिक सेक्टर की कंपनियों को समर्थन दिया। वास्तव में, इनोवेशन और प्रोडक्टिविटी की कमी के चलते उन्होंने मौका गंवा दिया।

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हालांकि, पिछले तीन दशों के आर्थिक उदारीकरण के दम पर, भारत और सरकार के पास अब रिलायंस, टाटा और अडानी जैसी दिग्गज प्रतिस्पर्धी समूह हैं। साथ ही, उसके पास एक स्टार्टअप कल्चर है जिसकी जड़ें खासी गहरी हो चुकी हैं।

बीते साल, वित्त मंत्री ने समावेशी कल्याण, डिजिटल इकोनॉमी और फिनटेक को प्रोत्साहन, टेक्नोलॉजी आधारित विकास, एनर्जी ट्रांजिशन और क्लाइमेट एक्शन जैसी प्राथमिकताएं गिनाई थीं।

बजट 2023-24 के लिए, भारतीय कंपनियों को ग्रीन एनर्जी जैसे ग्लोबल बिजनेस के क्षेत्रों में बढ़ावा देने के उद्देश्य से लीडरशिप पोजिशन के लिए तैयार करना एक सही टारगेट हो सकता है।

Sundeep Khanna एक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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