Union Budget 2023: इनकम टैक्स में क्या-क्या राहत दे सकती हैं निर्मला सीतारमण? जानिए एक्पर्ट्स की राय
Union Budget 2023: टैक्स एक्सपर्ट्स का कहना है कि इनकम टैक्स सिस्टम में करीब एक दशक से बड़ा बदलाव नहीं किया गया है। फाइनेंशियल ईयर 2019-20 में सरकार ने न्यू टैक्स रीजीम पेश किया था। लेकिन, इसमें टैक्सपेयर्स ने ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई है। इसलिए इनकम टैक्स सिस्टम में बड़े बदलाव करने की जरूरत है
फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण (NIRMALA SITHARAMAN) 1 फरवरी, 2023 को यूनियन बजट (BUDGET 2023) पेश करेंगी। यह अगले साल लोकसभा चुनावों से पहले केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार का आखिरी पूर्ण बजट होगा।
Union Budget 2023: इनकम टैक्स रेट्स (ओल्ड रीजीम) में लंबे समय से कोई बदलाव नहीं किया गया है। इनकम टैक्स एक्ट, 1961 के कई सेक्शंस में डिडक्शंस लिमिट भी नहीं बढ़ाई गई है। बजट 2023 इनकम टैक्स सिस्टम में बदलाव के लिए एक बड़ा मौका हो सकता है। फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) 1 फरवरी, 2023 को यूनियन बजट (Budget 2023) पेश करेंगी। यह अगले साल लोकसभा चुनावों से पहले केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार का आखिरी पूर्ण बजट होगा। मनीकंट्रोल ने पर्सनल इनकम टैक्स में संभावित बदलावों के बारे में जानने के लिए इनकम टैक्स के तीन एक्सपर्ट्स से बातचीत की। आइए जानते हैं उनकी राय क्या है।
इनकम टैक्स रेट में बदलाव
फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण ने बजट 2020 में न्यू टैक्स रीजीम का ऐलान किया था। इसमें टैक्स रेट्स को कम रखा गया था। इसमें टैक्स रेट्स को कम करने की पुरानी मांग तो मान लगी गई, लेकिन इसमें टैक्सपेयर्स ने ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई है। इसकी वजह यह है कि न्यू रीजीम में ऐसे सभी डिडक्शंस वापस ले लिए गए, जो ओल्ड रीजीम में अब भी उपलब्ध हैं। इस वजह से ओल्ड रीजीम में अब भी ज्यादातर टैक्सपेयर्स की दिलचस्पी है। इसलिए इंडिविजुअल टैक्सपेयर्स के लिए टैक्स रेट्स को कम करने की मांग अब भी बनी हुई है। इसके अलावा कॉर्पोरेट और इंडिविजुअल टैक्स रेट्स में अभी काफी अंतर है।
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टैक्स कंसल्टेंसी फर्म टैक्स कनेक्ट एडवायजरी के पार्टनर विवेक जालान ने कहा, "फाइनेंशियल ईयर 2019-20 में कॉर्पोरेट टैक्स रेट्स को घटाया गया था। इसके बाद कॉर्पोरेट टैक्स रेट्स और पर्सनल टैक्स रेट्स के बीच फर्क बढ़ गया। इंडिविजुअल के लिए इनकम टैक्स का सबसे ज्यादा रेट 42.74 फीसदी पहुंच गया है। इसके मुकाबले कॉर्पोरेट टैक्स रेट 25.17 फीसदी है।" उन्होंने कहा कि इंडिया में पर्सनल इनकम टैक्स का सबसे ज्यादा रेट दूसरे देशों के मुकाबले बहुत ज्यादा है।
जालान ने कहा कि हांगकांग में पर्सनल इनकम टैक्स का सबसे ज्यादा रेट 15 फीसदी है। श्रीलंका में 18 फीसदी है। बांग्लादेश में 25 फीसदी है और सिंगापुर में 22 फीसदी है। इनकम टैक्स और कॉर्पोरेट टैक्स रेट्स में ज्यादा अंतर होने से कॉर्पोरेट मॉडल की तरफ भी झुकाव देखा जा रहा है। उदाहरण के लिए प्रॉपराइटरशिप बिजनेसेज प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बन रहे हैं। उन्होंने कहा कि इसलिए इंडिविजुअल के लिए पर्सनल इनकम टैक्स रेट्स में तुरंत कमी करने की जरूरत है। इससे दूसरे देशों के मुकाबले हम बराबरी में आएंगे। साथ ही सिस्टम में सभी के एक समान नियम बनाने में मदद मिलेगी। इनकम टैक्स स्लैब्स बढ़ाकर ऐसा किया जा सकता है।
बेसिक एग्जेम्प्शन लिमिट और डिडक्शन बढ़ाने की जरूरत
अभी 60 साल तक की उम्र के टैक्सपेयर्स के लिए इनकम टैक्स से छूट के लिए इनकम की लिमिट 2.5 लाख रुपये है। 60 से 80 साल के टैक्सपेयर्स के लिए यह 3 लाख रुपये हैं। 80 साल से ज्यादा उम्र के टैक्सपेयर्स के लिए यह 5 लाख रुपये है। कई टैक्स एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस लिमिट को बढ़ाने की जरूरत है।
टैक्स एंड इनवेस्टिंग प्लेटफॉर्म क्लियर के फाउंडर और सीईओ अर्चित गुप्ता ने कहा कि करीब एक दशक पहले एग्जेम्प्शन लिमिट में बदलाव किया गया था। सेक्शन 87ए के तहत टैक्स रिबेट बढ़ाने की जरूरत है। इसका फायदा 5 लाख रुपये से कम इनकम वाले टैक्सपेयर्स उठा सकते हैं। सरकार ने न्यू टैक्स रीजीम शुरू किया था। लेकिन, इसे टैक्सपेयर्स का ज्यादा रिस्पॉन्स नहीं मिला है। इसकी वजह इसका जटिल स्ट्रक्चर और सीमित डिडक्शंस हैं।
गुप्ता का कहना है कि टैक्सपेयर्स को उम्मीद है कि सरकार बेसिक एग्जेम्प्शन लिमिट को 2.5 लाख रुपये से बढ़ाकर 5 लाख रुपये करेगी या टैक्स टैक्स रेट में कमी करेगी। टैक्सपेयर्स को सेक्शन 80सी और सेक्शंस 80डी के तहत डिडक्शंस बढ़ाए जाने की भी उम्मीद है। न्यू टैक्स रीजीम में भी कुछ बदलाव किए जा सकते हैं, जिससे टैक्सपेयर्स को एग्जेम्प्शंस और इनवेस्टमेंट्स पर डिडक्शन का फायदा मिलेगा।
ज्यादा HRA एग्जेम्प्शंस के लिए शहरों की लिस्ट बढ़ाई जाए
पिछले महीने भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या ने निर्मला सीतारमण से इननकम टैक्स रूल्स के तहत ज्यादा शहरों को मेट्रो की कैटेगरी में लाने की अनुरोध किया था। इससे उन शहरों के लोग भी ज्यादा हाउस रेंट अलाउन्स क्लेम कर सकेंगे। गुप्ता ने भी सरकार से ज्यादा एचआरए एग्जेम्प्शंस के लिए शहरों की लिस्ट बढ़ाने की मांग की। उन्होंने कहा, "दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और चेन्नई में टैक्सपेयर्स को अपनी सैलरी के 50 फीसदी तक एचआरए एग्जेम्प्शंस की इजाजत है। बेंगलुरु, अहमदाबाद, गुड़गांव और हैदराबाद जैसे शहरों के लिए यह डिडक्शंस 40 फीसदी है। इन शहरों में भी बढ़ते किराए को देखते हुए एचआरए एग्जेम्प्शंस को बढ़ाकर 50 फीसदी करने की जरूरत है।"
कैपिटल गेंस टैक्स को तर्कसंगत बनाया जाए
एक्सपर्ट्स का कहना है कि कैपिटल गेंस टैक्स को तर्कसगंत बनाने की जरूरत है। अभी अलग-अलग कैपिटल एसेट्स कैपिटल गेंस के टैक्स रेट्स अलग-अलग हैं। शॉर्ट टर्म कैपिटल गेंस और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस के लिए होल्डिंग पीरियड में भी काफी अंतर है। डेलॉयट की पार्टनर आरती रावते ने कहा कि कैपिटल गैंस ऐसा मसला है, जिसके प्रावधानों में बदलाव करने की जरूरत है। अभी अलग-अलग एसेट क्लास के लिए होल्डिंग पीरियड अलग-अलग है। उदाहरण के लिए लिस्टेड शेयरों की बिक्री के मामले में लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस के लिए होल्डिंग पीरियड 12 महीने से ज्यादा है। लेकिन, अनिलिस्टेड शेयरों के मामले में लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस के लिए होल्डिंग पीरियड 24 महीने से ज्यादा है।
इसी तरह रियल एस्टेट के मामले में लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस के लिए होल्डिंग पीरियड 24 महीने से ज्यादा है। सोने में कैपिटल गेंस के लिए होल्डिंग पीरियड तीन साल से ज्यादा है। रावते ने कहा कि अगर अगर कैपिटल गेंस के लिए एसेट को इक्विटी और नॉन-इक्विटी की कैटेगरी में बांट दिया जाए और होल्डिंग पीरियड और टैक्स रेट्स के अंतर को खत्म कर दिया जाए तो इससे टैक्सपेर्यस को बहुत राहत मिल जाएगी।
इनकम की रिपोर्टिंग आसान बनाने की जरूरत
कई एक्सपर्ट्स का कहना है कि पिछले कुछ सालों में इनकम टैक्स रिटर्न फॉर्म्स और प्रोसेसे काफी जटिल हो गए हैं। इसे आसान बनाने की जरूरत है। खासकर ऐसे मामलों में जिसमें इनकम किसी दूसरे देश के एसेट्स से जुड़ी हो। PwC India के पूर्व नेशनल लीडर (ग्लोबल मोबिलिटी प्रैक्टिस) और पर्सनल टैक्स एक्सपर्ट कुलदीप कुमार ने कहा, "आईटीआर फॉर्म में विदेशी देश से इनकम या एसेट्स की रिपोर्टिंग में टैक्सपेयर को कई शिड्यूल में इसकी जानकारी देनी पड़ती है। इसस उलझन पैदा होती है और टैक्सपेयर्स पर कंप्लायंस का बोझ बढ़ जाता है।" कुमार का कहना है कि आईटीआर फॉर्म में फॉरेन एसेट्स और इनकम की रिपोर्टिंग के लिए आईटीआर फॉर्म में बदलाव करने की जरूरत है।