फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण 31 जनवरी शुक्रवार को संसद में इकोनॉमिक सर्वे पेश करने वाली हैं। जानिए क्यों खास है यह।
क्या होता है इकोनॉमी सर्वे?
इकोनॉमी सर्वे हर साल बजट से एक दिन पहले पेश किया जाता है। यह इकोनॉमी की आधिकारिक रिपोर्ट होती है। इस साल फाइनेंस मिनिस्टर निर्मला सीतारमण इकोनॉमिक सर्वे पेश कर रही हैं। इसके अगले दिन 1 फरवरी को बजट पेश होने वाला है।
इकोनॉमी सर्वे में क्या बताया जाता है?
इकोनॉमी सर्वे एक रिपोर्ट होती है जिसमें यह बताया जाता है कि अर्थव्यवस्था की हालत कैसी है। इसके लिए क्या संभावनाएं और चुनौतियां हैं। इसमें अलग-अलग सेक्टर की राय और सुधार के उपायों का जिक्र होता है। कुल मिलाकर इकोनॉमी सर्वे भविष्य में बनने वाली पॉलिसी का आधार होता है।
इकोनॉमिक सर्वे कौन तैयार करता है?
इस बार इकोनॉमिक सर्वे चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर (CEA) कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन और उनकी टीम ने तैयार किया है।
क्या है अनुमान?
इकोनॉमिक सर्वे में अर्थव्यवस्था की ग्रोथ की संभावनाएं होती हैं। इसमें यह विस्तार से बताया जाता है कि क्यों अर्थव्यवस्था की रफ्तार घटेगी या बढ़ेगी।
इस साल सर्वे में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
बजट से पहले इस सर्वे में 4 बातों का ध्यान रखना चाहिए।
GDP ग्रोथ
इकोनॉमिक सर्वे में फिस्कल ईयर 2019-20 (मौजूदा फिस्कल ईयर) के लिए GDP ग्रोथ के अनुमान और अगले फिस्कल ईयर 2020-2021 के GDP ग्रोथ के अनुमान के बारे में बताया जाएगा।
इस महीने की शुरुआत में सेंट्रल स्टैटस्टिक्स ऑफिस (CSO) ने अपना पहला एडवांस अनुमान पेश किया था। इसमें अनुमान जताया था कि फिस्कल ईयर 2019-2020 में भारत की GDP ग्रोथ 5 फीसदी रह सकती है। पिछले साल जुलाई में GDP ग्रोथ 7 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया था।
क्या यह इस बात के संकेत हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था बुरे दौर से निकल चुकी है? क्या रिकवरी के शुरुआती संकेत नजर आने लगे हैं? भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार दोबारा बढ़ने वाली है? इकोनॉमी सर्वे में इन सारे सवालों के जवाब मिल जाते हैं।
रोजगार का क्या है हाल?
केंद्र सरकार की सबसे बड़ी चुनौती रोजगार के मौके पैदा करने को लेकर है। इनक्लूजन का सबसे अच्छा तरीका प्रोडक्टिव रोजगार महैया कराना है। विपक्ष इस मुद्दे को लेकर नरेंद्र मोदी की सरकार को बार-बार घेरने की कोशिश करता है।
अगले एक दशक में इंडस्ट्री और सर्विस सेक्टर में कितने लोगों को रोजगार मिल सकता है? बीते साल में जितने जॉब के मौके बने हैं उस हिसाब से रोजगार मिले तो कितने लोगों को नौकरी मिल पाएगी?
क्या डेमोग्राफी की वजह से अब तक जो फायदा मिलता था वह नुकसान में बदल गया है। ऐसे कई सवालों के जवाब इकोनॉमिक सर्वे 2019-20 में मिलेगा।
GST
1 जुलाई 2017 को आधी रात में खूब तामझाम के साथ सरकार ने GST लॉन्च किया था। पिछले कुछ महीनों में GST की कीमतों और बिजनेस पर जो असर हुआ है वह निराशाजनक ही है।
वैट, सेंट्रल एक्साइज, स्पेशल एडिशनल ड्यूटीज, सेस और सर्विस टैक्स की जगह GST ने ले ली। हालांकि GST के लिए सक्षम टैक्स एडमिनिस्ट्रेशन, ट्रांसपेरेंसी, लाल फीताशाही खत्म करने की जरूरत थी। GST का मकसद पूरे देश को एक सिंगल मार्केट बनाना था।
व्यावहारिक इकोनॉमी, Nudge theory
पिछले साल इकोनॉमी सर्वे में "behavioural economics" और "nudge theory" के पक्ष में विस्तार से बताया। भारत जैसे देश में सामाजिक-धार्मिक विचारों से कई मामले तय होते हैं।
सर्वे में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और स्वच्छ भारत मिशन जैसी सरकारी स्कीमों की कामयाबी का जिक्र करते हुए कहा गया था कि पॉलिसी के असर को बढ़ाने के लिए बर्ताव पर खास फोकस किया गया था।
इस साल भी उम्मीद है कि सर्वे एक नए आइडिया के साथ आएगा जिसे किताबों से निकालकर मेनस्ट्रीम पॉलिसी लागू करने भी इस्तेमाल करने की जरूरत है।
क्या सरकार ये सिफारिशें मानने के लिए बाध्य है?
इकोनॉमिक सर्वे में जो भी सिफारिशें की गई हैं सरकार उसे मानने के लिए बाध्य नहीं है। यह सर्वे सरकार के लिए सिर्फ पॉलिसी गाइड की तरह है। पहले भी इकोनॉमिक सर्वे ऐसे आए हैं जिसमें सरकार की सोच और अर्थशास्त्रियों की सोच एकदम अलग होती है। ऐसा कई बार होता है जब सर्वे की सिफारिशों का असर बजट पर नजर नहीं आता है।
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