GTL Bank Fraud Case: केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई (CBI) ने 4,760 करोड़ रुपये के एक बैंक घोटाले मामले में जीटीएल लिमिटेड, कुछ अज्ञात बैंकरों और डायरेक्टरों के खिलाफ केस दर्ज किया है। इन सभी पर फर्जी कंपनियों का एक पूरा मायाजाल बनाकर बैंक के पैसों को डायवर्ट करने और उसे हड़पने का आरोप है। जांच एजेंसी के मुताबिक, कंपनी ने हेराफेरी करके 20 से अधिक बैंकों वाले एक समूह से लोन हासिल किया था। फिर लोन में मिले अधिकतर पैसों का इसने कुछ बैंक अधिकारियों और वेंडरों के साथ मिलकर गबन कर लिया। क्या है यह पूरा मामला और कैसे हुआ यह घोटाला, आइए विस्तार से समझते हैं-
सबसे पहले समझते हैं कि यह GTL लिमिटेड क्या है?
GTL का गठन 23 दिसंबर 1987 को एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के रूप में हुआ था। 12 सितंबर 1991 को इसे एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी में बदल दिया गया। यह कंपनी भारत और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में टेलीकॉम ऑपरेटरों को टेलीकॉम नेटवर्क को लगाने से जुड़ी सेवाएं, उसका संचालन और रखरखाव आदि की सेवाएं मुहैया करने के कारोबार में लगी हुई है। मनोज तिरोडकर और ग्लोबल होल्डिंग कॉरपोरेशन प्राइवेट लिमिटेड इसके प्रमोटर हैं।
यह मामला एक बैंक लोन फ्रॉड से जुड़ा हुआ है, जो कथित रूप से 2009 से 2012 के बीच में हुई था। सीबीआई के मुताबिक, कंपनी ने बैंकों के एक समूह से धोखाधड़ी करके कई सारे क्रेडिट सुविधाएं हासिल की और इस लोन का अधिकांश पैसा कुछ बैंक अधिकारियों और वेंडरों के साथ मिलीभगत डायवर्ट कर लिया।
GTL को लोन देने वाले बैंक कौन हैं और इसमें कितनी राशि शामिल है?
जीटीएल को लोन देने वाले बैंकों के समूह में कुल 24 बैंक शामिल हैं। सीबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, कुल 4,760 करोड़ रुपये का लोन दिया गया था। ICICI बैंक का GTL लिमिटेड पर 650 करोड़ रुपये, बैंक ऑफ इंडिया का 467 करोड़ रुपये और कैनरा बैंक का 412 करोड़ रुपये बकाया है।
घोटाले को किस तरह अंजाम दिया गया?
कंपनी ने बैंकों के समूह से कुछ खास बिजनेस गतिविधियों के लिए कम अवधि के लोन हासिल किए थे और बैंकों से वादा किया था कि वह इन पैसों का इस्तेमाल बताए गए उद्देश्यों के लिए ही करेगी। लेकिन लोन का पैसा मिलने के बाद अधिकतर राशि का इस्तेमाल कंपनी ने बताए गए उद्देश्यों के लिए नहीं किया था और फिर इन पैसों को डायवर्ट कर दिया गया।
कानूनी जानकारों का क्या है कहना?
KS Legal & Associates के मैनेजिंग पार्टनर सोनम चंदवानी ने कहा, "यह यकीन करना मुश्किल है कि डायरेक्टरों को नाक के नीचे इतनी बड़ी राशि में फ्रॉड गतिविधियां होती रहीं और उन्हें इसकी भनक तक नहीं लगी।"
कैसे सामने आया यह घोटाला?
आरबीआई ने 1 अप्रैल 2016 को आईडीबीआई बैंक को लिखे एक लेटर में जीटीएल लिमिटेड को चिह्नित करने और एक फॉरेंसिक ऑडिट कराने का निर्देश दिया था। आईडीबीआई बैंक भी जीटीएल लिमिटेड को लोन देने वालों बैंकों के समूह में शामिल है। हालांकि सीबीआई की FIR से पता चलता है कि दो महीने बाद, IDBI बैंक ने कंसोर्टियम की ओर से प्रतिक्रिया देते हुए खाते को लाल झंडे के रूप में चिह्नित करने और फोरेंसिक ऑडिटर नियुक्त करने के खिलाफ सलाह दी क्योंकि ऐसा करने से कर्ज चुकाने में देरी हो सकती है।
इसके बाद आरबीआई ने 15 जुलाई, 2016 को दोबारा आईडीबीआई बैंक को लेटर लिखा अपने पहले पत्र के निर्देश के पालन का सख्ती से आदेश दिया। इसके बाद जीटीएल के खातों की फॉरेंसिक ऑडिट कराई गई और इसका जिम्मा चार्टर्ड अकाउंटेंसी फर्म एनबीएस एंड कंपनी को सौंपा गया था। इसी के बाद यह घोटाला सामने आया।