'डार्क पैटर्न' से कैसे आपको चुपचाप ठग रहीं ऑनलाइन कंपनियां? सरकार ने शुरू की नकेल कसने की तैयारी
Dark Pattern: डार्क पैटर्न एक चालाक डिजाइन ट्रिक है, जो वेबसाइट्स और ऐप्स के इंटरफेस में छुपे होते हैं। इनका मकसद होता है यूजर को ऐसे फैसले लेने के लिए उकसाना जिसे वो शायद पूरी जानकारी या मंशा के साथ न लेते। ये ट्रिक्स यूजर को अनजाने में किसी सर्विस के लिए साइन-अप करने, ज्यादा पैसा खर्च करने या अपना निजी डेटा शेयर करने के लिए मजबूर कर सकती हैं
Dark Pattern: कंज्यूमर्स अफेयर्स मिनिस्ट्री ने 13 डार्क पैटर्न्स को “अनुचित व्यापार व्यवहार” घोषित किया है
क्या आपको साथ कभी कुछ ऐसा हुआ है कि आप ऑनलाइन शॉपिंग कर रहे हो और अचानक 'लिमिटेड ऑफर’ या काउंटडाउन टाइमर देखकर कोई एक्स्ट्रा सामान खरीद लिया हो? यहां पहले से ही टिक किए गए कुछ बॉक्सेज के चलते आपके पैसे ज्यादा कट गए हों? अगर हां, तो सावधान! आप 'डार्क पैटर्न' का शिकार हो चुके हैं। 'डार्क पैटर्न' चुपचाप हमारी डिजिटल शॉपिंग के तरीकों को प्रभावित कर रही है और अब सरकार ने इन पर नकेस कसने की तैयारी शुरू कर दी है।
'डार्क पैटर्न' इन ऑनलाइन कंपनियों के ऐप या वेबसाइट की डिजाइन की ऐसी रणनीति होती है, जो यूजर को उनकी मर्जी के बिना कोई फैसला लेने पर मजबूर कर देती हैं। जैसे-
- पहले से टिक किए गए ऑप्शन,
- छुपे हुए चार्जेस,
- नकली काउंटडाउन टाइमर्स,
- भ्रम पैदा करने वाले शब्द या रंग,
- बार-बार दिखने वाले 'लास्ट चांस' ऑफर,
- लगातार पॉप-अप जो यूजर के सामने ‘ना’ कहने का ऑप्शन छुपा दें।
- सब्सक्रिप्शन ट्रैप, जहां सर्विस कैंसिल करना मुश्किल बना दिया जाता है
- ‘गिल्ट ट्रिप’ शेमिंग (“क्या आप वाकई ये मौका गंवाना चाहते हैं?)” जैसे विकल्प
ये ट्रिक्स यूजर को ज्यादा खर्च करने, अनजाने में डेटा शेयर करने या अनचाहे सब्सक्रिप्शन लेने के लिए उकसाती हैं।
कंज्यूमर्स अफेयर्स मिनिस्ट्री ने 28 मई को एमेजॉन (Amazon), फ्लिपकार्ट (Flipkart), स्विगी (Swiggy), जोमैटो (Zomato), पेटीएम (paytm), वॉट्सऐप (WhatsApp), एपल (Apple), ओला (Ola), मेकमायट्रिप (MakeMyTrip), मीशो (Meesho) और रिलायंस रिटेल (Reliance Retail) जैसे कई बड़े ई-कॉमर्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के प्रतिनिधियों के साथ उच्चस्तरीय बैठक की।
उपभोक्ता मामलों के मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कंपनियों को निर्देश दिया कि वे अपने डार्क पैटर्न से जुड़े नियमों का पालन करें, अपने प्लेटफॉर्म पर डार्क पैटर्न्स की पहचान करें और उन्हें हटाएं, आंतरिक ऑडिट करें और इन ऑडिट की रिपोर्ट्स सार्वजनिक करें। मंत्रालय ने इस मुद्दे की निगरानी के लिए एक 'ज्वाइंट वर्किंग ग्रुप' बनाने का प्रस्ताव भी रखा है।
डार्क पैटर्न क्या हैं? वे कैसे काम करते हैं और सरकार इसे लेकर क्यों चिंतित हैं? यहां जानिए पूरी जानकारी।
डार्क पैटर्न क्या है?
डार्क पैटर्न एक चालाक डिजाइन ट्रिक है, जो वेबसाइट्स और ऐप्स के इंटरफेस में छुपे होते हैं। इनका मकसद होता है यूजर को ऐसे फैसले लेने के लिए उकसाना जिसे वो शायद पूरी जानकारी या मंशा के साथ न लेते।
ये ट्रिक्स यूजर को अनजाने में किसी सर्विस के लिए साइन-अप करने, ज्यादा पैसा खर्च करने या अपना निजी डेटा शेयर करने के लिए मजबूर कर सकती हैं और वो भी बिना उन्हें पूरी तरह इसका एहसास कराए। इनका इस्तेमाल भ्रामक विजुअल एलिमेंट्स, उलझाऊ भाषा या छुपे हुए विकल्पों के जरिए किया जाता है।
नवंबर 2023 में भारत सरकार के उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने 13 तरह के डार्क पैटर्न्स को अनुचित व्यापार व्यवहार यानी अनफेयर ट्रेड प्रैक्टिस घोषित किया। इनमें ड्रिप प्राइसिंग (जिसमें एक्सट्रा चार्जेज को सबसे लास्ट में चेकआउट करते समय दिखाना), नकली अरजेंसी (नकली टाइमर या 'लिमिटेड स्टॉक' दिखा कर जल्द फैसले लेने को मजबूर करना), बेट एंड स्विच (कुछ और दिखाना, लेकिन कुछ और डिलीवर करना), कन्फर्म शेमिंग (“क्या आप वाकई इतना अच्छा मौका खोना चाहेंगे?” जैसे गिल्ट ट्रैप्स) और सब्सक्रिप्शन ट्रैप (सर्विस को कैंसिल करना बहुत जटिल या भ्रमित कर देना) जैसे तरीके शामिल हैं।
डार्क पैटर्न के बाकी तरीकों में बिना कुछ एक्सेस किए आगे न बढ़ पाने की स्थिति, UI को जानबूझकर इस तरह बनाना जिससे विकल्प छिप जाएं या भ्रमित करें, विज्ञापन को नॉर्मल कंटेंट की तरह पेश करना, उलझाऊ भाषा का इस्तेमाल, सॉफ्टवेयर सेवाओं की बिलिंग को जटिल बनाना, बार-बार पॉप-अप्स के जरिए फैसला लेने को मजबूर करना, यूजर की जानकारी के बिना चेकआउट में एक्स्ट्रा प्रोडक्ट्स जोड़ना, मालवेयर जैसे पॉप-अप्स जो असली सिस्टम अलर्ट जैसे दिखते हैं आदिश शामिल है।
इन डार्क पैटर्न्स से यूजर्स की न सिर्फ डिजिटल स्वतंत्रता पर असर पड़ता है, बल्कि उनके भरोसे को भी नुकसान पहुंचाते हैं और ऑनलाइन सेवाओं के प्रति संदेह बढ़ता है। खासतौर से ऐसे समय में जब ऑनलाइन शॉपिंग रोजमर्रा का हिस्सा बनता जा रहा है।
सरकार ने अब तक क्या एक्शन लिए?
कंज्यूमर्स को गुमराह करने वाले इन डिजाइन ट्रिक्स को रोकने के लिए सरकार ने पिछले एक साल से कोशिशें शुरू की है। इसकी शुरुआत जून 2023 में हुई, जब ASCI ने वॉलेंटरी गाइडलाइंस जारी कीं। ये गाइडलाइंस भ्रामक विज्ञापन और UI डिजाइन पर केंद्रित थीं। हालांकि ये नियम बाध्यकारी नहीं थे, लेकिन इंडस्ट्री को संकेत दे दिया गया था कि सरकार अब सतर्क है।
इसके बाद नवंबर 2023 में सरकार ने इनपर कानूनी शिंकजा कसा। कंज्यूमर्स अफेयर्स मिनिस्ट्री ने 13 डार्क पैटर्न्स को “अनुचित व्यापार व्यवहार” घोषित किया। इन्हें कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट, 2019 के तहत कानूनी अपराध माना गया। इसका उल्लंघन करने वालों पर 20 लाख रुपये तक का जुर्माना और छह महीने तक की कैद शामिल है।
अगस्त 2024 में, ASCI की रिपोर्ट ने इस मुद्दे को और भी ज्यादा अहम बना दिया। ASCI की रिपोर्ट में सूबतों के जरिए बताया गया कि कितने आम हो गए हैं और कैसे इससे कंज्यूमर्स को नुकसान हो रहा है। इस रिपोर्ट के बाद सरकार उपभोक्ताओं को सशक्त बनाने के लिए नए डिजिटल टूल्स लॉन्च किए। इनमें जागृति ऐप, जागो ग्राहक जागो ऐप और एक जागृति डैशबोर्ड शामिल हैं। इनका मकसद ग्राहकों के लिए डार्क पैटर्न्स की पहचान करना, शिकायत दर्ज करना और समाधान तक आसानी से पहुंचने में मदद करना है।
अब 28 मई की बैठक में केंद्र सरकार ने ऑनलाइन कंपनियों को अब तक का सबसे कड़ा निर्देश दिया है। मंत्रालय के मुताबिक, बैठक में सभी कंपनियों ने "सैद्धांतिक सहमति" दी है कि वे इन नियमों का पालन करेंगी। बैठक के दौरान मंत्री प्रह्लाद जोशी ने ओला, उबर, रैपिडो जैसे ऐप्स के "एडवांस टिप" फीचर को लेकर आई शिकायतों पर भी बात की।
उन्होंने कहा कि इन कंपनियों को सुधारात्मक कार्रवाई करने के लिए कुछ समय दिया जाएगा। जोशी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक पुरानी पोस्ट में कहा था, “सेवा के बाद टिप एक अधिकार के रूप में नहीं बल्कि प्रशंसा के प्रतीक के रूप में दी जाती है।”