सरकार के आईबीसी (अमेंडमेंट) बिल पर संसद की प्रवर समिति की सभी सिफारिशें स्वीकार कर लेने की उम्मीद है। यह बिल संसद के बजट सत्र में पेश होगा। एक सीनियर अधिकारी ने मनीकंट्रोल को यह जानकारी दी। प्रवर समिति के प्रमुख बीजेपी नेता बैजयंत पांडा हैं। इस समिति ने नए इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (अमेंडमेंट) बिल में 11 बदलाव करने के सुझाव दिए हैं। इस बिल में 2016 के प्रिंसिपल एक्ट में 68 बदलावों का प्रस्ताव है।
अधिकारी ने बताया, "कमेटी की ज्यादातर सिफारिशें कोड के बुनियादी नियमों का दोहराव हैं। इनमें क्लीन स्टेट प्रिंसिपल, डिस्ट्रिब्यूशन ऑफ एसेट्स, डेफिनिशन ऑफ रिजॉल्यूशन प्लान आदि शामिल हैं। सिफारिशों का मकसद किसी तरह की उलझन को दूर करना है। इसलिए उन्हें फाइनल ड्राफ्ट में शामिल किया जाएगा।" सूत्र ने बताया कि सरकार फरवरी में संसद में आईबीसी (अमेंडमेंड) बिल को पेश करेगी।
कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि 'क्लीन स्टेट प्रिंसिपल' की सिफारिश फाइनल ड्राफ्ट से बाहर रखी जाएगी। अधिकारी ने बताया कि यह प्रिंसिपल तब से है, जब 2016 में आईबीसी की शुरुआत हुई। उन्होंने कहा कि कमेटी की सिफारिशें आईबीसी के बेसिक फीचर के सिर्फ दोहराव हैं। इनमें कुछ नया नहीं कहा गया है। क्लीन स्टेट प्रिंसिपल न्यायिक रूप से मान्यता प्राप्त सिद्धांत है, जो यह सुनिश्चित करता है कि एक बार कंपनी की बिक्री हो जाने या रिजॉल्यूशन प्लान के तहत उसके फिर से चालू हो जाने पर नया मालिक नई शुरुआत (Fresh Slate) करता है।
कंपनी के नए मैनेजमेंट पर किसी तरह की सरप्राइज लायबिलिटीज या क्लेम का बोझ नहीं डाला जा सकता जो टेकओवर से पहले के हैं, लेकिन फाइनल एप्रूवल प्लान में शामिल नहीं हैं। पिछले हफ्ते मनीकंट्रोल को दिए एक इंटरव्यू में पांडा ने कहा था, "दुर्भाग्य की बात यह है कि कई दावेदार रिजॉल्यूशन प्लान एप्रूव होने के बाद भी अपना बकाया मांगते रहते हैं। इनमें सरकारी एजेंसियां भी शामिल हैं।"
पांडा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कई बार क्लीन स्टेट प्रिंसिपल के पक्ष में फैसला सुनाया है...लेकिन, हमने देखा है कि इसका पालन हीं होता है। कमेटी ने इस उलझन को खत्म करने की कोशिश की है। पांडा की अगुवाई में 24 सदस्यीय प्रवर समिति ने 12 अगस्त को पेश नए बिल के जरिए 2016 के प्रिंसिपल एक्ट में शामिल 68 अमेंडमेंट्स की जांच की। सबसे अहम सुझाव आईबीसी अपील के निपटारे के लिए नेशनल कंपनी लॉ एपेलेट ट्राइब्यूनल (NCLAT) को तीन महीने का समय देना था।