कमोडिटीज प्राइसेज में जल्द तेज गिरावट की उम्मीद नहीं, कोटक सिक्योरिटीज के रवींद्र राव ने बताई वजह

इस हफ्ते अमेरिका ने रूस के एनर्जी एक्सपोर्ट पर पूरी तरह से बैन लगाने का ऐलान किया। हालांकि, इसकी उम्मीद पहले से की जा रही थी। उधर, इंग्लैंड ने कहा है कि वह धीरे-धीरे रूस के एनर्जी के इंपोर्ट में कमी लाएगा। हालांकि, उसने रूस के कोयले और नेचुरल गैस पर कोई रोक नहीं लगाई है

अपडेटेड Mar 12, 2022 पर 10:27 AM
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8 मार्च को निकेल की कीमतें 100 फीसदी बढ़कर 100,000 डॉलर प्रति टन के लेवल को पार कर गई। इससे लंदन मेटल स्टॉक एक्सचेंज को थोड़े समय के लिए इसकी ट्रेंडिग पर रोक लगानी पड़ी।

यूक्रेन पर रूस के हमले (Russian Attacks on Ukraine) शुरू होने के बाद से कमोडिटी की कीमतों में उछाल है। इसकी वजह यह है कि रूस से सप्लाई पर लड़ाई का असर पड़ने की आशंका है। कोटक सिक्योरिटी (Kotak Security) के वीपी और हेड (कमोडिटी रिसर्च) रवींद्र राव ने इस बारे में विस्तार से बताया है। आइए जानते हैं उनकी इस बारे में क्या राय है।

रूस कमोडिटीज मार्केट का बड़ा खिलाड़ी

रूस कमोडिटीज मार्केट का बड़ा खिलाड़ी है। सप्लाई को लेकर बढ़ती चिंता से कमोडिटीज की कीमते कई साल की ऊंचाई पर पहुंच गई हैं। कुछ कमोडिटीज के प्राइस तो लाइफ-टाइम हाई पर चले गए हैं। क्रूड ऑयल की कीमतें 2008 के बाद से सबसे ज्यादा ऊंचाई पर हैं। यूरोप में गैस की कीमत अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है।


इंडस्ट्रियल मेटल्स में कॉपर, निकेल और एलुमीनियम के भाव रिकॉर्ड हाई पर पहुंच गए हैं। जिंक 2007 के अपने सबसे ऊंचे भाव से आगे निकल गया है। सोना अगस्त 2020 के बाद से सबसे ऊंचे लेवल पर पहुंच गया है। इसकी वजह यह है कि इनवेस्टर्स निवेश के लिए सुरक्षित इंस्टूमेंट्स का रुख कर रहे हैं।

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बेनतीजा रही रूस और यूक्रेन की बातचीत

इस हफ्ते की शुरुआत में रूस और यूक्रेन के बीच सुलह की उम्मीद दिखी। लेकिन, तुर्की में रूस और यूक्रेन के विदेश मंत्रियों की बातचीत बेनतीजा के बाद यह उम्मीद खत्म हो गई। इस हफ्ते अमेरिका ने रूस के एनर्जी एक्सपोर्ट पर पूरी तरह से बैन लगाने का ऐलान किया। हालांकि, इसकी उम्मीद पहले से की जा रही थी। उधर, इंग्लैंड ने कहा है कि वह धीरे-धीरे रूस के एनर्जी के इंपोर्ट में कमी लाएगा। हालांकि, उसने रूस के कोयले और नेचुरल गैस पर कोई रोक नहीं लगाई है।

कमोडिटी की कीमतों में कुछ नरमी दिखी है। इसकी वजह यह है कि मार्केट प्लेयर्स ने ऊंची कीमतों के असर को समझा है। कीमतों में लगातार उछाल से डिमांड की ग्रोथ पर असर पड़ेगा। बढ़ती कमोडिटी और एनर्जी की कीमतें इनफ्लेशनरी प्रेशर बढ़ाएगी, जिससे पहले इकोनॉमिक एक्टिविटी और फिर डिमांड में कमी आएगी।

कमोडिटीज में दिखी प्रॉफिट-बुकिंग

हमें कमोडिटीज में कुछ प्रॉफिट बुकिंग भी देखने को मिली। दरअसल, मार्केट प्लेयर्स यूक्रेन क्राइसिस का केंद्रीय बैंकों की पॉलिसी पर पड़ने वाले असर का अनुमान लगा रहे हैं। इस हफ्ते यूरोपीयन सेंट्रल बैंक ने अपनी मॉनेटरी पॉलिसी की मीटिंग में इकोनॉमी में गिरावट के रिस्क पर जोर दिया। हालांकि, उसने कहा कि बॉन्ड की खरीदारी तीसरी तिमाही में तभी रुकेगी जब इकोनॉमिक डेटा इसकी इजाजत देंगे।

अमेरिकी केंद्रीय बैंक पर हैं निगाहें

अब सारा फोकस अगले हफ्ते होने वाली फेडरल रिजर्व की बैठक पर है। अब यह माना जा रहा है कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक इंट्रेस्ट रेट बढ़ाने में ज्यादा आक्रामता नहीं दिखाएगा। क्योंकि जियोपॉलिटिकल टेंशन पहले ही ग्रोथ के लिए बड़ा चैलेंज दिख रही है। हालांकि, फेड का स्टैंश एग्रेसिव बना रहेगा, क्योंकि इनफ्लेशन बहुत हाई लेवल पर है। इनफ्लेशन के ताजा आंकड़ों से पता चला है कि फरवरी में इनफ्लेशन 7.9 फीसदी पर पहुंच गया है। यह अमेरिका में पिछले 40 साल में सबसे ज्यादा इनफ्लेशन है।

आगे क्या है उम्मीद?

8 मार्च को निकेल की कीमतें 100 फीसदी बढ़कर 100,000 डॉलर प्रति टन के लेवल को पार कर गई। इससे लंदन मेटल स्टॉक एक्सचेंज को थोड़े समय के लिए इसकी ट्रेंडिग पर रोक लगानी पड़ी। मेरा मानना है कि अभी कमोडिटी की कीमतें में उतार-चढ़ाव जारी रहेगा। क्योंकि मार्केट प्लेयर्स डिमांड-सप्लाई के सिचुएशन को देखना चाहते हैं। उनकी नजरें दुनिया के बड़े केंद्रीय बैंकों की मॉनेटरी पॉलिसी पर भी है। ऐसे में कमोडिटीज की कीमतों में तब तक तेज गिरावट की उम्मीद नहीं है, जब तक यूक्रेन क्राइसिस को खत्म करने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जाते।

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