वैश्विक ब्रोकरेज फर्म जेफरीज के क्रिस वुड (Chris Wood of global brokerage firm Jefferies) ने कहा कि पिछले एक साल में विश्व मंच पर भारत का "बढ़ा हुआ राष्ट्रीय आत्मविश्वास" देखने को मिला है। ये खास तौर पर सस्ते रूसी तेल की खरीद के संबंध में नजर आया है। 24 फरवरी, 2022 को शुरू हुए रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूस से भारत का तेल आयात मार्च 2022 में 4 लाख टन से बढ़कर जनवरी में रिकॉर्ड 60.5 लाख टन हो गया है। इस संदर्भ में, रूसी तेल की कीमत अब ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत में लगभग 35 प्रतिशत की छूट पर ट्रेड कर रही है।
वुड ने अपनी साप्ताहिक 'ग्रीड एंड फीयर' (GREED & Fear') रिपोर्ट में कहा कि नई दिल्ली पर अमेरिका के शुरुआती दबाव के बावजूद मोदी सरकार "अपने सार्वजनिक रुख पर कायम है कि वह अपने राष्ट्रीय हित में काम करना जारी रखेगी। ये हित रूस से सस्ता तेल खरीदने में है।"
"इस रुख को एपल जैसी अमेरिकी कंपनियों के लिए अगले बड़े घरेलू बाजार के रूप में भारत को टारगेट करने के संदर्भ में सपोर्ट मिला। लिहाजा ये समझ विकसित हुई कि वाशिंगटन के लिए बीजिंग और दिल्ली दोनों के साथ लड़ाई करने का कोई रणनीतिक अर्थ नहीं है।" ऐसा उन्होंने कहा।
वुड ने कहा कि भारत द्वारा रूस से सस्ते तेल की खरीदारी जारी है। ये लेन-देन रुपये में तेजी से बढ़ रहे हैं।
इस बीच, इस महीने की शुरुआत में जारी सरकारी बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा की रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल में रूसी तेल का भारत में आयात दस गुना बढ़ गया।
रूस चीन और भारत जैसे देशों को छूट पर एनर्जी बेच रहा है, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है।
आंकड़ों से पता चलता है कि भारत ने पिछले वित्त वर्ष के दौरान रूस से तेल की खरीद से प्रति टन कच्चे तेल पर करीब 89 डॉलर की बचत की है।
अमेरिका और यूरोप के दबाव के बावजूद, भारत ने रूसी आयात पर पश्चिमी प्रतिबंधों का पालन करने से इनकार कर दिया है। नई दिल्ली ने भी स्पष्ट रूप से यूक्रेन पर रूस के आक्रमण की निंदा नहीं की है।
भारत ने अपनी तेल खरीद का बचाव करते हुए कहा है कि ऊर्जा आयात (energy imports) पर निर्भर देश के रूप में, वह बढ़ी हुई कीमतों का भुगतान करने की स्थिति में नहीं है।