Russian Crude Price Cap: रूस के क्रूड ऑयल (Russian Crude Oil) के लिए 60 डॉलर प्रति बैरल की प्राइस लिमिट (Price Limit for Russian Oil) आज (5 दिसंबर) से लागू हो गई है। इस समझौते को Group of Seven (G7) देशों और ऑस्ट्रेलिया का समर्थन हासिल है। इसका मकसद ऑयल की बिक्री से रूस को होने वाली कमाई में कमी लाना है। इस साल फरवरी में यूक्रेन पर रूस के हमले शुरू होने के बाद अमेरिका, पश्चिमी देश और जापान ने रूस पर सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे। इसका असर रूस के एक्सपोर्ट पर पड़ा। लेकिन, रूस ने कुछ देशों को कम कीमत पर ऑयल बेचना शुरू कर दिया। इन देशों में चीन, इंडिया और तुर्की शामिल हैं।
प्राइस कैप तय करने की वजह क्या है?
रूस के इस कदम से सस्ते भाव पर तेल खरीदने वाले देशों को तो बहुत फायदा हो रहा था, लेकिन, रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले देशों को यह पसंद नहीं आया। इसी वजह से इन देशों ने रूस के लिए एक प्राइस लिमिट तय की है। इसका मतलब यह है कि रूस इस लिमिट से कम भाव पर किसी देश को क्रूड नहीं बेच पाएगा।
प्राइस कैप लागू होने के बाद क्या होगा?
G7 के इस प्राइस कैप से नॉन-ईयू देश रूस से क्रूड ऑयल खरीदना जारी रख सकते हैं। लेकिन, रूस अगर इस प्राइस से कम पर तेल बेचेगा तो शिपिंग, इंश्योरेंस और री-इश्योरेंस कंपनियां दुनियाभर में रूसी ऑयल के कार्गों को अपनी सेवाएं नहीं देंगी। चूंकि, सबसे बड़ी शिपिंग और इंश्योरेंस कंपनियां जी7 देशों में हैं, जिससे इस प्राइस कैप की वजह से रूस के लिए ज्यादा कीमत पर अपने ऑयल को बेचना मुश्किल हो जाएगा।
इस समझौते में क्या कहा गया है?
इस समझौते के दायरे में रूसी क्रूड के साथ दूसरे पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स भी आएंगे। इस प्राइस लिमिट की समीक्षा हर दो महीने पर होगी। समझौते में यह कहा गया है कि लिमिट रूसी ऑयल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के मार्केट प्राइस से कम से कम 5 फीसदी कम होगी। इमर्जेंसी की स्थिति में इस समझौते की शर्तों में रियायत दी जा सकती है। अगर रूस इस समझौते का उल्ल्घंन करता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकेगी। इस समझौते में यह कहा गया है कि यह प्राइस लिमिट 5 दिसंबर से पहले खरीदे गए और लोड किए गए ऑयल पर लागू नहीं होगी। ऐसे तेल को 19 जनवरी, 2023 पर उनके डेस्टिनेशन पर पहुंचाना जरूरी होगा।
अमेरिका और पश्चिमी देश क्या चाहते हैं?
एक तरफ जहां अमेरिका और पश्चिमी देश ऑयल की बिक्री से रूस की कमाई पर प्रतिबंध लगाना चाहते हैं, वहीं दूसरी तरफ वे यह भी चाहते हैं कि रूस की तरफ से ऑयल की सप्लाई को पूरी तरह से बंद नहीं किया जाए। ऐसा होने पर क्रूड की कीमतों में उछाल आएगा। इससे उन देशों को भी दिक्कत का सामना करना पड़ेगा, जो रूस से तेल नहीं खरीदते हैं।
एक्सपर्ट्स का कहना क्या है?
एक्सपर्ट्स का कहना है कि प्रति बैरल क्रूड के उत्पादन पर रूस की कॉस्ट 30-40 डॉलर आती है। इसका मतलब है कि 60 डॉलर प्रति बैरल के रेट पर भी क्रूड बेचने से उसे अच्छा मुनाफा मिलेगा। बताया जाता है कि रूस इस समझौते की शर्तों के हिसाब से अपनी तैयारी कर चुका है। उसने बड़ी संख्या में जहाजों के बेड़े तैयार रखें हैं जो चीन, इंडिया और तुर्की जैसे देशों के बंदरगाहों तक उसके क्रूड की डिलीवरी करेंगे।
इंडिया पर पड़ेगा क्या असर?
इस साल रूस से इंडिया के ऑयल इंपोर्ट में तेज उछाल आया है। S&P Global Commodity Insights के डेटा के मुताबिक, अक्टूबर में रूस से इंडिया का ऑयल इंपोर्ट रिकॉर्ड हाई लेवल पर पहुंच गया। यूक्रेन पर रूस के हमले से पहले इंडिया को इंपोर्ट बास्केट में रूस की हिस्सेदारी 1 फीसदी से कम थी। अक्टूबर में यह बढ़कर 42 लाख टन यानी 10 लाख बैरल प्रति दिन पहुंच गई है। इससे इंडियन इंपोर्ट बास्केट में रूस से आयात की हिस्सेदारी 21 फीसदी हो गई है। यह सऊदी अरब से इंपोर्ट के करीब और ईरान से इंपोर्ट के मुकाबले 21 फीसदी ज्यादा है।
जानकारों का कहना है कि रूसी क्रूड के प्राइस कैप का असर इंडिया पर पड़ेगा। वह इस साल मार्च से जिस कीमत पर रूस के ऑयल खरीद रहा था, उसके मुकाबले उसे ज्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी। इससे सरकार का इंपोर्ट बिल बढ़ेगा। हालांकि, वह अब खुलकर रूस से तेल खरीद सकेगा।