पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद यहां के चावल उद्योग के लिए एक नई उम्मीद जगी है। देश के सबसे बड़े चावल उत्पादक राज्य के रूप में बंगाल अब अपनी प्रीमियम किस्मों, विशेष रूप से गोंविंदो भोग और तुलाईपंजी (Gobindo Bhog and Tulai Panji) के जरिए वैश्विक बाजार में अपनी धाक जमाने की तैयारी कर रहा है।
90000 करोड़ रुपये के विशाल भारतीय चावल निर्यात बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए उद्योग जगत ने नई सरकार से बुनियादी ढांचे और निर्यात नीतियों में बड़े बदलाव की मांग की है। पश्चिम बंगाल का चावल उद्योग अब अपनी पहचान केवल घरेलू बाजार तक सीमित नहीं रखना चाहता। राज्य के चावल मिल मालिकों और निर्यातकों ने सरकार से बुनियादी ढांचे में सुधार और ब्रांडिंग के लिए समर्थन मांगा है, ताकि बंगाल का प्रीमियम चावल दुनिया की थाली तक पहुंच सके।
प्रीमियम चावल और GI टैग की ताकत
बंगाल की दो सबसे मशहूर किस्में गोंविंदो भोग और तुलाईपंजी दोनों को GI टैग मिला हुआ है। न्यूज एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट में राइसविला फूड्स के सीईओ सूरज अग्रवाल कहते हैं कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन किस्मों की मांग तेजी से बढ़ रही है। अग्रवाल ने कहा कि अगर सरकार बंगाल की इन प्रीमियम किस्मों की ब्रांडिंग और प्रमोशन में मदद करती है, तो निर्यात में भारी उछाल आ सकता है और बंगाल के चावल को वैश्विक पहचान मिलेगी।
बुनियादी ढांचे की चुनौतियां और मांग
राज्य में चावल की पैदावार तो भरपूर है (लगभग 150 लाख टन), लेकिन बुनियादी ढांचे की कमी एक बड़ी बाधा बनी हुई है। उद्योग जगत इसे लेकर कई मांगें सामने रख रहा है। इसके तहत किसानों, मिल मालिकों और निर्यातकों के बीच तालमेल के लिए एक बोर्ड के गठन की मांग की गई है। लाइसेंस और अप्रूवल की प्रक्रिया को तेज करने के लिए सिंगल विंडो क्लियरेंस की जरूरत बताई जा रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर सड़कें, ड्रेनेज सिस्टम और बिजली कनेक्शन में होने वाली देरी को खत्म करने की मांग की गई है।
चावल के निर्यात बाजार में भारत का दबदबा
भारत मौजूदा समय में दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक है। यहां से वैश्विक चावल व्यापार का लगभग 40% हिस्सा संभाला जाता है। साल 2025 में भारत का चावल निर्यात 19% बढ़कर लगभग 215 लाख टन तक पहुंच गया है। बंगाल में चावल से जुड़े कारोबारियों का मानना है कि सही मार्केटिंग के साथ, राज्य भारत के 90000 करोड़ रुपये के निर्यात उद्योग में अपनी हिस्सेदारी को कई गुना बढ़ा सकता है।
राइस मिलों की मौजूदा स्थिति पर चिंता
पश्चिम बंगाल राइस मिल ओनर्स एसोसिएशन के चेयरमैन सुशील के. चौधरी ने मिलों की आर्थिक स्थिति पर चिंता जताई है। उन्होंने बताया कि राज्य में करीब 1500 राइस मिलें हैं, जिनमें से केवल 550 सरकारी खरीद में शामिल हैं। बड़े पैमाने पर मुफ्त चावल वितरण योजना के कारण कई मिलें घाटे में हैं और बंद हो रही हैं। उद्योग का सुझाव है कि जो लाभार्थी गरीबी रेखा (BPL) से ऊपर हैं, उन्हें मुफ्त चावल वितरण बंद किया जाना चाहिए ताकि मिल मालिकों के लिए बाजार में व्यवहार्यता (Viability) बनी रहे।
पश्चिम बंगाल सालाना 150 लाख टन चावल का उत्पादन करता है, लेकिन इसका बहुत कम हिस्सा सीधे निर्यात बाजार तक पहुंच पाता है। अगर बेहतर रेल और पोर्ट कनेक्टिविटी के साथ ब्रांडिंग पर जोर दिया गया, तो बंगाल का गोंविंदो भोग और तुलाईपंजी चावल राज्य की अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल सकता है।