Air India के एंप्लॉयीज की बदलेगी तकदीर, कभी नौकरी जा रही थी अब बनेंगे कंपनी के मालिक

एयर इंडिया कभी आसमान में राज करती थी। लेकिन, खराब प्रबंधन , सरकार की अनदेखी और प्राइवेट कंपनियों से प्रतिस्पर्धा की वजह से इसकी दुर्गति शुरू हो गई। धीरे-धीरे इसकी हालत इतनी खराब हो गई कि जरूरी सेवाएं जारी रखने तक के लिए इसके पास पैसे नहीं थे

अपडेटेड Apr 21, 2022 पर 11:29 AM
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एयर इंडिया ईसॉप्स देने वाली टाटा समूह की दूसरी कंपनी बन जाएगी। इससे पहले टाटा मोटर्स ने अपने एंप्लॉयीज को 2018 में ईसॉप्स दिया था।

एयर इंडिया के एंप्लॉयीज की किस्मत बदलने जा रही है। कभी उनकी नौकरी जाने का खतरा मंडरा रहा था। अब वे कंपनी के मालिक बनने जा रहे हैं। दरअसल एयर इंडिया अपने एंप्लॉयीज को ईसॉप्स देने जा रही है। सरकार ने पिछले साल एयर इंडिया को बेच दिया था। टाटा समूह ने सबसे ज्यादा बोली लगाकर एयर इंडिया को खरीदा था। अब यह टाटा समूह का हिस्सा बन गई है।

एयर इंडिया कभी देश की सबसे बड़ी एयरलाइंस थी। टाटा समूह इसकी पुरानी साख लौटाना चाहता है। इसके लिए एंप्लॉयीज का भरोसा हासिल करना जरूरी है। इसे ध्यान में रख टाटा समूह एयर इंडिया के कर्मचारियों के लिए कई नई सुविधाएं देने जा रहा है। ईसॉप्स इसी कड़ी का हिस्सा है।

अभी यह तय नहीं है कि एयर इंडिया किस लेवल तक के एंप्लॉयीज को ईसॉप्स देगी। उसका मकसद अपने एंप्लॉयीज को खुश रखना है। दरअसल, कोरोना की महामारी के बाद एयरलाइंस इंडस्ट्री फिर से पटरी पर लौट रही है। हवाई यात्रियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। उधर, दिग्गज स्टॉक इनवेस्टर राकेश झुनझुवाला आकाशा एयरलाइंस शुरू करने जा रहे हैं। ऐसे में एयरलाइंस इंडस्ट्री में एंप्लॉयीज की मांग बढ़ गई है।


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एयर इंडिया ईसॉप्स देने वाली टाटा समूह की दूसरी कंपनी बन जाएगी। इससे पहले टाटा मोटर्स ने अपने एंप्लॉयीज को 2018 में ईसॉप्स दिया था। कंपनियों कर्मचारियों को अपने साथ बनाए रखने के लिए ईसॉप्स देती हैं। इसके तहत एंप्लॉयीज को धीरे-धीरे कंपनी के शेयर खरीदने का मौका दिया जाता है। इसका प्राइस मार्केट प्राइस के मुकाबले बहुत कम होता है। एक तरह से यह कंपनी से जुड़े रहने का इनाम होता है। इंडिया में इंफोसिस ने ईसॉप्स की शुरुआत की थी।

एयर इंडिया कभी आसमान में राज करती थी। लेकिन, खराब प्रबंधन , सरकार की अनदेखी और प्राइवेट कंपनियों से प्रतिस्पर्धा की वजह से इसकी दुर्गति शुरू हो गई। प्राइवेट एयलाइंस कंपनियों ने इसकी बाजार हिस्सेदारी हथिया ली। धीरे-धीरे इसकी हालत इतनी खराब हो गई कि जरूरी सेवाएं जारी रखने तक के लिए इसके पास पैसे नहीं थे। सरकार हर साल हजारों करोड़ रुपये इसमें डालती रही। लेकिन, इसकी हालत नहीं सुधरी। आखिरकार सरकार ने इसे बेचने का फैसला लिया।

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