RBI के इंटरेस्ट रेट बढ़ाने का सिलसिला इस साल के अंत तक खत्म हो सकता है। इसकी वजह यह है कि आने वाले महीनों में महंगाई में कमी आने की उम्मीद है। CRISIL के चीफ इकोनॉमिस्ट धर्मकीर्ति जोशी ने यह अनुमान जताया है। उन्होंने कहा कि अगर मुद्रास्फीति की दर में उम्मीद के मुताबिक कमी आती हो तो मॉनेटरी पॉलिसी में सख्ती इस साल के अंत तक खत्म हो सकती है।
जोशी ने कहा कि सितंबर की मॉनेटरी पॉलिसी में आरबीआई रेपो रेट में 0.25 फीसदी वृद्धि कर सकता है। एक और वृद्धि इस साल के अंत तक हो सकती है। उसके बाद इंटरेस्ट रेट अपने पीक (सबसे ऊंचे स्तर) पर पहुंच जाएगा। इस साल मई में केंद्रीय बैंक ने इंटरेस्ट रेट बढ़ाने का सिलसिला शुरू किया था। उसने तेजी से बढ़ती महंगाई को काबू में करने के लिए यह कदम उठाया।
कोरोना की महामारी शुरू होने पर देश भर में लॉकडाउन लगा था। इकोनॉमी को लॉकडाउन के असर से बचाने के लिए RBI ने रेपो रेट को घटाकर 4 फीसदी कर दिया था। केंद्रीय बैंक ने इकोनॉमी को सहारा देने के लिए बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी बढ़ाने के भी उपाय किए थे। आरबीआई ने धीरे-धीरे इन कदमों को वापस ले लिया।
कोरोना की महामारी के कमजोर पड़ने के बावजूद इकोनॉमी में रिकवरी एक समान नहीं आई है। इसकी वजह रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध है। इसका काफी ज्यादा असर सप्लाई चेन पर पड़ा है। इसके चलते क्रूड ऑयल, गैस और फूड की कीमतें बहुत बढ़ गई हैं।
आरबीआई महंगाई को काबू में करने के लिए मई से अब तक रेपो रेट में 1.40 फीसदी वृद्धि कर चुका है। पिछले सात महीनों से इनफ्लेशन आरबीआई के टारगेट से ऊपर बना हुआ है। हालांकि, अब इसमें थोड़ी नरमी दिख रही है। इसकी वजह दुनियाभर में कमोडिटी की कीमतों में आई नरमी के साथ सरकार की तरफ से उठाए गए कदम हैं।
जोशी ने कहा, "मुद्रास्फीति की दर में जो नरमी देखने को मिल रही है, उसकी वजह खाद्य तेलों की वैश्विक कीमतों में कमी के साथ कुछ दूसरी वजहें हैं। इसमें फिस्कल पॉलिसी का भी हाथ रहा है, क्योंकि मुद्रास्फीती में उछाल का संबंध सप्लाई की दिक्कतों से रहा है।"
क्रिसिल ने इस फाइनेंशियल ईयर में रिटेल इनफ्लेशन 6.8 फीसदी रहने का अनुमान जताया है।। यह आरबीआई के 6.7 फीसदी अनुमान के मुकाबले ज्यादा है। वैश्विक अर्थव्यवस्था की ग्रोथ सुस्त पड़ने का असर क्रूड ऑयल और कमोडिटी की कीमतों पर पड़ेगा। इससे कीमतों पर दबाव घटेगा।
उन्होंने कहा कि इनफ्लेशन इस फाइनेंशियल ईयर के अंत से नीचे आने लगेगा। यह 6 फीसदी से नीचे आ जाएगा। अभी यह बताना मुश्किल है कि यह कब 4 फीसदी पर आ जाएगा। लेकिन, मेरा मानना है कि अगले साल औसत मुद्रास्फीति करीब 5 फीसदी रहेगी।