कोलंबिया यूनिवर्सिटी में इकोनॉमी के प्रोफेसर और नीति आयोग के पूर्व वाइस चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया का कहना है कि अगले दशक में भारत की ग्रोथ रेट 7-8 फीसदी से ज्यादा रह सकती है और सरकार द्वारा किए गए 4 सुधारों के दम पर 2030 तक भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी इकोनॉमी बन सकता है। उन्होंने यहां तक कहा कि इकोनॉमी की बढ़ती साइज, इकोनॉमिक गतिविधियों में आ रही तेजी और संरक्षणवाद की समाप्ति के साथ ही भारत की विकास दर आगे 9-10 फीसदी तक जा सकती है।
अरविंद पनगढ़िया ने आगे कहा कि मैं इस बात की भविष्यवाणी करता हूं कि अगले दशक में भारत की विकास दर 7-8 फीसदी रहेगी लेकिन इसके लिए शर्त यह है कि कोविड से हमें मुक्ति मिल जाए। हालांकि अगर हमें सरकार द्वारा किए गए 4 अहम रिफॉर्म का पूरा फायदा उठाना है तो हमें इकोनॉमी खोलनी होगी और अपने कारोबारी गतिविधियों का आकार बढ़ाना होगा।
अरविंद पनगढ़िया ने अपने कथन में कहा कि वे जिन बड़े सुधारों को ध्यान में रखकर यह बात कर रहें है वह बैंककरप्सी कोड , लेबर रिफॉर्म, जीएसटी और कॉर्पोरेट टैक्स। अरविंद पनगढ़िया ने यह बातें इंस्टिट्यूट ऑफ़ इकॉनोमिक ग्रोथ (IEG) द्वारा फाइनेंस मिनिस्ट्री के आर्थिक मामलों के विभाग के साथ मिलकर आयोजित किए गए एक लेक्चर सीरिज में कहीं। इस लेक्चर सीरीज का आयोजन भारत के स्वतंत्रता के 75 साल पूरे होने के अवसर पर किया गया था।
अरविंद पनगढ़िया का कहना है कि भारत में कुशल और अकुशल श्रमिकों की एक बड़ी संख्या है जिसके चलते दुनियाभर की तमाम बड़ी कंपनियां चीन से बाहर भारत में अपनी उत्पादन ईकाई लगाने के लिए आकर्षित हो सकती है जिसके लिए हमें काम करना होगा। हालांकि पनगढ़िया सरकार द्वारा 13 सेक्टरों में शुरु किए गए PLI स्कीम से खुश नहीं है। क्योंकि इनमें भारी मात्रा में सरकार की तरफ से पूंजी लगाए जाने की जरुरत है।
उन्होंने कहा कि भारत भारी पूंजी जरुरत वाले क्षेत्रों में सरकारी निवेश करने और संरक्षणवाद की पुरानी नीति पर कायम है। उन्होंने आगे कहा कि PLI स्कीम के तहत सब्सिडी पूंजी पर दी जाने वाली है ना कि लेबर पर। अरविंद पनगढ़िया का कहना है कि भारत के सामने एक बड़ी चुनौती है सस्ते दर पर भूमि का अधिग्रहण करना। इसके अलावा कारोबारी गतिविधियों के लिए सीमाओं को खोलना और बड़ी मात्रा में श्रम आधारित उत्पादन ईकाईयां लगाना हमारी सबसे बड़ी जरुरत है तभी हम दुनिया से प्रतिस्पर्धा कर पाएंगे।
उन्होंने आगे कहा कि लेकिन सरकारी नीतियों ने भूमि के अधिग्रहण को इतना महंगा और कठिन बना दिया है जिसके चलते फैक्टरियों के लिए भूमि हासिल करना बहुत मुश्किल हो गया। भूमि अधिग्रहण के इस बड़ी लागत के चलते फैक्टरियों में ना तो हॉरिजेन्टल विकास हो पाता है और ना ही वर्टिकल।
इस लेक्चर सीरीज में उन्होंने संरक्षणवाद का विरोध करते हुए कहा कि संरक्षणवाद से देश की इकोनॉमी को कोई सहायता नहीं मिलने वाली। भारत को बड़े बाजार हासिल करने के लिए यूरोपी यूनियन UAE,Canada और Australia जैसे देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट करने की जरुरत है।