बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी का क्या मतलब है, RBI इसे कैसे नियंत्रित करता है?

बैंकिंग सिस्टम में पर्याप्त लिक्विडिटी होना जरूरी है। यह इकोनॉमी और मार्केट दोनों के लिए जरूरी है। बैंकिंग सिस्टम में पर्याप्त लिक्विडिटी बनाए रखने की जिम्मेदारी रिजर्व बैंक की होती है। केंद्रीय बैंक के पास ऐसे कई टूल्स होते हैं, जिनका इस्तेमाल वह लिक्विडिटी को मैनेज करने के लिए करता है

अपडेटेड Feb 07, 2025 पर 6:10 PM
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इकोनॉमी में कुल लिक्विडिटी कितनी है, इसका पता लगाने के लिए ब्रॉड मनी यानी M3 का इस्तेमाल होता है।

पिछले कुछ समय से बैंकों को लिक्विडिटी की कमी का सामना करना पड़ रहा है। इकोनॉमी और मार्केट्स के लिए पर्याप्त लिक्विडिटी जरूरी है। रिजर्व बैंक (आरबीआई) लिक्विडिटी पर्याप्त बनाए रखने की कोशिश करता है। किसी वजह से लिक्विडिटी कम होने पर वह उसे बढ़ाने के उपाय करता है। किसी वजह से लिक्विडिटी बढ़ जाने पर वह उसे कम करने की कोशिश करता है। इसके लिए केंद्रीय बैंक कुछ तरीकों का इस्तेमाल करता है। इनमें रिजर्व मनी (एमO) और ब्रॉड मनी (M3) सबसे प्रमुख हैं।

लिक्विडिटी बनाए रखने की जिम्मेदारी आरबीआई पर

रिजर्व मनी यानी MO में सर्कुलन में उपलब्ध करेंसी, आरबीआई के पास बैंकों के डिपॉजिट और दूसरे रिजर्व शामिल होते हैं। यह मनी का सबसे लिक्विड रूप है। इसका सीधा असर बैंकिंग सिस्टम की लिक्विडिटी पर पड़ता है। आरबीआई लिक्विडिटी को नियंत्रण में रखने के लिए कई ऑपरेशन का इस्तेमाल करता है। इनमें रेपो, रिवर्स रेपो, सीआरआर और ओपन मार्केट ऑपरेशन शामिल होते हैं।


कई वजहों से लिक्विडिटी कम हो जाती है

इकोनॉमी में कुल लिक्विडिटी कितनी है, इसका पता लगाने के लिए ब्रॉड मनी यानी M3 का इस्तेमाल होता है। इसमें M1 (कैश + डिमांड डिपॉजिट) और बैंकों के पास पड़ा टाइम डिपॉजिट शामिल होता है। अगर बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी कम है तो इसका मतलब है कि M3 ग्रोथ कम हुई है। कई बार सख्त मॉनेटरी पॉलिसी और लोन की ज्यादा मांग की वजह से ऐसी स्थिति बन जाती है।

आरबीआई के डॉलर बेचने से भी लिक्विडिटी पर असर पड़ता है

अगर लिक्विडिटी से जुड़ा मसला शॉर्ट टर्म का होता है तो MO की मदद ली जाती है, क्योंकि इससे बैंकिंग सिस्टम में जल्द कैश की उपलब्धता सुनिश्चित हो जाती है। आरबीआई जिस लिक्विडिटी डेफिसिट या सरप्लस को मॉनिटर करता है वह नेट बैंक रिजर्व पर आधारित होता है, जो MO का हिस्सा है। कई बार आरबीआई को विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करना पड़ता है। इसका मकसद रुपये को डॉलर के मुकाबले कमजोर होने से बचाना होता है। इसका असर भी लिक्विडिटी पर पड़ता है।

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एडवान्स टैक्स पेमेंट से भी बढ़ती है लिक्विडिटी

RBI जब कभी डॉलर बेचता है, वह बैंकिंग सिस्टम से रुपये को सोख (soak) लेता है। इससे बैंकिंग सिस्टम में रुपये की कमी हो जाती है। इसका मतलब यह है कि विदेशी मुद्रा बाजार में आरबीआई के हस्तक्षेप करने का असर रुपये की लिक्विडिटी पर पड़ता है। कंपनियों के एडवान्स टैक्स जमा करने का असर भी लिक्विडिटी पर पड़ता है। हालांकि, इससे बैंकिंग सिस्टम में थोड़े समय के लिए लिक्विडिटी बढ़ती है। यह पैसा सरकार के खर्च के जरिए फिर से इकोनॉमी में लौट आता है।

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