चंदन श्रीवास्तव
चंदन श्रीवास्तव
आज मन बुझा हुआ है, आज देश का झंडा आधा झुका हुआ है— टीवी बता रहा है कि दो दिन का राष्ट्रीय शोक है। इस राष्ट्रीय शोक की घोषणा ना होती तो भी मन के आंगन में शोक ही होता क्योंकि सब जानते हैं — इस देश का मन अपने पचहतर साल के सफर में खुशी और गम के जितने पड़ावों से गुजरा है उन सभी पड़ावों पर कुछ गीत रखे हैं मगर इन गीतों को सुर और स्वर देने वाला महामौन में लीन हो चुका है।
एक सवाल सबको सता रहा है-अब देश के दर्द-ओ-गम को, इसकी हंसी-खुशी को सुर और स्वर कौन देगा ? धीरज रखिए, गीतों का वह अलबेला गवैया भले ही महामौन में लीन हो चुका लेकिन महामौन का मतलब महाशून्य नहीं होता। गवैये के महामौन में इस देश की जिन्दगी में आने वाले सारे वक्तों के गीत है। बीती सदी के विश्व-कवि टैगोर कहते थे ना कि काल के गाल पर जो आंसू हमेशा के लिए ठहर जाये उसे ताजमहल कहते हैं उसी टेक पर आज कहने को जी हो रहा है कि काल के कंठ में भारत नाम की सभ्यता के जो दर्द गीत बनकर बस जायें वे लता मंगेशकर कहलाते है।
श्रद्धांजलि के ये शब्द नाकाफी हैं
ना..ना... बिल्कुल ना! महाशोक इस घड़ी में सुरों की उस महासाधिका के लिए टैगोर की टेक पर ऐसी पंक्ति दर्ज करने का कोई मतलब नहीं। आज ये दुख ज्यादा सता रहा है कि कलम से लिखा शब्द कोई भी हो, सुरों की महासाधिका के लिए नाकाफी है— कलम का लिखा शब्द कितना भी सुथरा और निखरा हो, उनमें कंठ नहीं होता, कोई आवाज नहीं होती। इन शब्दों में वह वह झनक और खनक कहां से लायें जिसका नाम लता मंगेशकर है? इन शब्दों में तान की वह उठान और उठान का ठहराव कहां से लायें जिसका नाम लता मंगेशकर है? कहां से लायें आवाज में पेवस्त वो सारी भाव-मुद्रायें `जो पायो जी मैंने रामरतन धन पायों` से लेकर `कभी खुशी कभी गम…ना जुदा होंगे हम` तक समायी हैं?
लता मंगेशकर का 92 साल की उम्र में निधन हो गया
एकटक और अपलक निहारा जाना वाला दृश्य आंखों के सामने हो तो अचरज क्यों होता है? इसलिए कि जो आंखें देखती हैं उनके पास कंठ नहीं होता, अपनी कोई आवाज नहीं होती और जो वह कंठ जिसके पास कहने के लिए आवाज होती है, खुद बिन आंखों का होता है। आंखें अपना देखा कहें तो कैसे उनके पास आवाज नहीं, कंठ इस देखे पर अपनी आवाज में कुछ कहे तो कैसे कि उसके पास आंखें ही नहीं।
श्रद्धांजलि के इन शब्दों के साथ भी यही सनातन मुश्किल जुड़ी है— श्रद्धांजलि उसे दी जा रही है जिसके कंठ में इस देश के हर भाव के लिए लय-ताल और सुर में बंधे गीत थे लेकिन श्रद्धांजलि के इन शब्दों में वैसी कोई तान और पुकार नहीं कि एक लहर इधर से आये- एक लहर से उधर से आये और इस झंझा-झकोर में वह राग मुखरित हो जाये जिसे भारत-राग कहते हैं, वही राग जिसे उस महासाधिका ने अपनी उम्र के पांचवें साल से साधना सीखा था।
याद आती रही, दिल दुखाती रही..
भारत-राग को काल के कंठ में बसा देने वाली उस महासाधिका की देह मुंबई के शिवाजी पार्क की मिट्टी में राख हो चुकी है, लेकिन सुर और स्वर बचा रह गया है। हर भारतवासी ने उस स्वर में भारत-राग को महसूस किया है। सात फरवरी की इस सुबह सूरज निकलने की इन घड़ियों में जब ये पंक्तियां लिखी जा रही हैं तो दूर के मंदिर के लाऊडस्पीकर पर वही स्वर गूंज रहा है—वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड़ परायी जाणे रे।
सूरज कुछ और चढ़ेगा, सुबह जब दिन में बदलने को आगे बढ़ेगा तो उसी स्वर में मंदिर के लाऊड स्पीकर पर बजेगा- यशोमती मैया से बोले बोले नंदलाला, राधा क्यों गोरी, मैं क्यों काला? घर की बिटिया, एक छोटी राधा उठ जायेगी। वह याद करेगी कि स्कूल वाली मैम ने म्युजिक के क्लास में कल एक गीत गाकर सिखाया था—इचक दाना बिचक दाना, दाने ऊपर दाना और घर में फिर से वही स्वर छोटी राधा के मन में आंगन में गूंजेगा। गृहलक्ष्मी अपनी चिर-परिचित हड़बड़ी में किचन से बाहर निकलेगी. उसे घर के छोटे-बड़े सबके लिए रोटी सेंकनी है लेकिन इसी बीच इस छोटी राधा की चोटी भी गूंथनी है, एक साथ वह ऐसे दोहरे-तिहरे काम कैसे करे? उसने अपनी इस शिकायत को किसी से सीधे ना कहकर एक गीत में गुनगुना शुरु कर दिया है-मोसे चल किये जाये, हाय रे हाय हाय देखो सैंया बेइमान—फिर से वही स्वर—वही सुर!
दिन और चढ़ेगा, घर का नंदलाल नौकरी की तलाश में निकलेगा। वह किसी देवता के आगे सिर नहीं नवाता लेकिन बाहर नौकरी तलाशने जैसे कठिन काम से निकलना हो तो घर से बाहर पैर निकालते वक्त उसके होठ आप से आप बुदबुदा उठते हैं— इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो ना... और जब शाम ढलेगी तो पिता के दुनिया-जहान की खाक छानकर, ना जाने कहां-कहां कि खबरों में खोये पिता के मुंह से अचानक फूट पड़ेगा वही सुर, वही स्वर---सुख के सब साथी दुख में ना कोय..! घर के बाहर एक फकीर अपनी झोली फैलाये एक गीत के मुखड़े और अन्तरे के साथ आवाज देगा – रमैय्या वस्ता वैय्या..रमैय्या वस्तावैय्या... याद आती रही, दिल दुखाती रही.....अपने मन को मनाना न आया हमें!
राग जब सारे कंठों से सारे भावों में गूंजे तो वह भारत-राग कहलाता है। यों ये सच है कि जिस भारत भारत के लिए वह राग बना और गूंजा, वह भारत अब नहीं है। अब एक नया भारत है— इस भारत में `शीला की जवानी` है, इस भारत में ऐसी जोर-जोर की अंगड़ाई हैं कि चारो तरफ ऊह..आह की आवाज मच जाये। इस भारत की तमन्नाओं में हैः वह चले इस कदर कि मच जाये रे गदर..होश वाले मदहोश नजर आयें और लोग अपने प्रियतम के फोटो को सीने पर फेविकोल से चिपकाये घूमें। इस नये भारत का नया गाना है और गली-गली जोर-जोर से बज रहा है—अंटवा...ओ..ओ...अंटवा। इसे एस्पिरेशनल इंडिया कहा जाता है— खोजिए, भावों और जतन में गजब के हिंसक हो उठे इस इंडिया में उस राग के लिए जगह कहां है, जिसे भारत-राग कहा जाता था. खोजिए कि वह राग कैसे बना था ?
अजीब दास्तां है..कहां शुरु कहां खत्म
भारत-राग के खत्म होने का मुकाम हमें पता है, वह मुकाम अंटवा..अंटवा में प्रतिध्वनित हो रहा है। भारत राग की शुरुआत कहां हुई यह खोजना मुश्किल है, ठीक वैसे ही जैसे कि भगीरथी कहलाने वाली गंगा का उद्गम खोजना मुश्किल है। जैसे गंगा के पानी में हर की इच्छाएं डुबकी लेती हैं और उभरती हैं और डुबकी मारती ऐसी हर इच्छा के लिए गंगा के पानी के पास एक वरदान होता है— लता मंगेशकर के कंठ में बसे उस भारत-राग की भी ऐसी ही खासियत थी।
भारत-राग के भीतर यह गुण आया पुरानी सारी पहचानों और उन पहचानों से जुड़ी दोस्ती-दुश्मनी, राग-द्वेष के सारे संबंधों को भुलाकर स्वतंत्रता के उस नये विहान में प्रवेश करने से जो 14-15 अगस्त की आधी रात इस देश की संसद में उतरा था। घड़ियाल ने जब रात के बारह के गजर बजाये थे तो इस देश ने अपने से एक वादा किया था कि `हम भारत के लोग` कुल-गोत्र, जाति-धर्म, लिंग, क्षेत्र के भेद और भाव भुलाकर एक नया इंसान बनने के दौर में प्रवेश कर रहे हैं, ऐसे नये दौर में जहां व्यक्ति की पहचान उसके गुण से हो, जाति और धर्म से नहीं। इस भारत ने नानक और कबीर की वाणी को याद किया था कि मोल तलवार का होता है, उस म्यान का नहीं जिसमें वह रखी गई होती है।
गुण के आधार पर पहचान अर्जित करने के वादे वाले इस भारत का एक शुरुआती लम्हा लता मंगेशकर की जिन्दगी से बंधा रहा या यों कहें लता की जिन्दगी में भारत-राग का यह शुरुआती लम्हा था। याद करें फिल्म महल का दृश्यः एक नीम-रोशन कमरा..तस्वीर से झांकती स्त्री को देखते पीठ फेरकर खड़े अशोक कुमार... एक स्वर उस नीम-रोशन कमरे के सन्नाटे को भेदते हुए कौंधता है। अशोक कुमार के पांव बेसाख्ता उस बेशक्ल आवाज को खोजने के लिए बढ़ते हैं। दरवाजा खुलता है..बाहर फिर से सन्नाटा.. कदम कुछ और बढ़ते हैं...विशाल हॉल में सन्नाटा... सन्नाटा सीढ़ियों पर..सन्नाटा बारजे पर.. सन्नाटा नायक अशोक कुमार की अपनी ही भटकती परछाइयों में... इस सन्नाटे को एक सुरीली आवाज भेदते जाती है। इस सन्नाटे में गीत के बोल गूंजते हैं—आयेगा...आयेगा...आयेगा आने वाला।
साल 1949 का, संगीत खेमचंद्र प्रकाश का और आवाज लता मंगेशकर की। फिल्मी गीतों के समीक्षक मानते हैं कि इस फिल्म और गीत से एक नये युग की शुरुआत होती है। देश के राजनीतिक इतिहास का यह एक तरह से संधिकाल था। देश आजाद हो चुका था लेकिन देश को जिस व्याकरण पर चलना था, वह व्याकरण यानी संविधान पूरी तरह बनकर लागू नहीं हुआ था। आज के बॉलीवुड कहलाने वाली मायानगरी में तब संगीतकार गुलाम हैदर के नाम का सिक्का चलता था। फिल्म खजांची के गीतों की धुन के सहारे उन्होंने पंजाबी तर्ज की धुनों को नई ऊंचाइयां बख्शी थीं।
गुलाम हैदर के मुंह से जब लोगों ने मराठी फिल्मों में सहनायिका की भूमिका निभाने वाली एक नवांगतुक पार्श्वगायिका के आवाज की प्रशंसा सुनी तो उन्हें यकीन नहीं हुआ। उनका सवाल था—आखिर एक नन्हीं सी, दो चोटियों वाली किशोरी अपनी पतली-महीन आवाज के साथ हिन्दी फिल्मी गीतों की पंजाबी ठसक वाली इस दुनिया में कैसे टिकेगी ? जी हां, वह दौर शमशाद बेगम, जोहराबाई अंबेवाली, अमीरबाई कर्नाटकी और नूरजहां का था।
थम गया सुरों का कारवां...
ऐसे ही दौर में बाम्बे टॉकीज ने रहस्य-रोमांच के भाव को केंद्र में रखकर महल फिल्म बनाने की सोची। आगे अपने तरह की यह पहली फिल्म कहलाने वाली थी। कमाल अमरोही को फिल्म के निर्देशन का जिम्मा मिला और खेमचंद्र प्रकाश को फिल्म के गीतों की धुन बनाने का। मास्टर जी कहलाने वाले खेमचंद्र प्रकाश ने फिल्म के थीम सांग के लिए लता मंगेशकर को बतौर गायिका चुना। रियाज के कई दौर के बाद शाम के छह बजे फाइनल रिकार्डिंग की शुरुआत हुई और फिर अगली सुबह सात बजे इस रिकार्डिंग को विराम मिलाः आयेगा..आयेगा आनेवाला..गीत बन चुका था !
गीत पर बाम्बे टॉकीज के मुखिया शशिधर मुखर्जी की पहली प्रतिक्रिया थी कि इस गीत को आखिर कौन गुनगुना चाहेगा? लेकिन फिर खेमचंद्र प्रकाश गीत की कामयाबी को लेकर विश्वास से भरे थे, उन्हीं के कहे का मान रखने के लिए गीत को फिल्म में रहने दिया गया. खेमचंद्र का विश्वास बेजा नहीं था—रसिकों के बीच उन दिनों रेडियो का बड़ा मान था और रेडियो की दुनिया में रेडियो सिलोन किसी गंधर्व की तरह महिमावान माना जाता था। यह गीत रेडियो सीलोन पर खूब बजा।
मुश्किल ये थी कि गीत बजा तो खूब लेकिन नाम किसी और का ही जाता था। उन दिनों के चलन के मुताबिक ग्रामोफोन रिकार्ड पर, `आयेगा...आयेगा..आएगा आनेवाला` गीत के गायिका नाम कामिनी रखा गया था। फिल्म में मधुबाला ने इस नाम से अपना किरदार निभाया था। लेकिन गीत के रसिया जन को चैन कहां? उन्हें गीत का स्वाद अनोखा लगा, रेडियो सीलोन में चिट्ठियों की भरमार हो गई कि बताओ आखिर इस गीत को गाया किसने है? लोग पारखी थे और गानेवाले के गुण को पहचान चुके थे। इन चिट्ठियों से परेशान रेडियो-स्टेशन के डायरेक्टर ने गीत की असल गायिका के नाम का पता लगाया और फिर एक दोपहर आएगा आनेवाला गीत के बजने के तुरंत पहले घोषणा कर डालीः गायिका लता मंगेशकर।
यह हिन्दी संगीत की इंडस्ट्री में एक नये नाम की पहचान कायम होने की पहली धमक थी—यह जाति-धर्म, क्षेत्र से परे ठेठ गुण के आधार पर कायम एक गायिका की पहचान थी। इसके बाद से इस गायिका की आवाज में वह सारा कुछ आना था जिसे यहां लेख में `भारत-राग` कहा गया हैः अभी एक दुखियारी स्त्री को भारतमाता के स्वर में गाना था कि दुनिया में हम आये हैं तो जीना ही पड़ेगा, शहंशाह के दरबार में एक प्रेम-दीवानी को अपनी जंजीरों की झंकार के साथ चुनौती के बोल बोलने थे कि प्यार किया तो डरना, परदा नहीं जब कोई खुदा से, बंदो से पर्दा करना क्या। भारत-राग का वह हिस्सा अभी आना शेष था जिसमें एक स्त्री सारे बंधनों को तोड़कर कहेगी-तोड़ के बंधन बांधी पायल...आज फिर जीने की तमन्ना है !
भारत-राग को आवाज देने वाली वह देह खाक हुई जैसे कि हर देह हुआ करती थी. लेकिन, याद रहे उस देह पर हिन्द की चादर लिपटी थी और इस चादर पर जितना ये लिखा था कि `ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी उतना ही यह भी कि मेरी आवाज ही पहचान है—गर याद रहे `. पुराने भारत और उस भारत के राग को मनीकंट्रोल हिन्दी की आंसू भरी श्रद्धांजलि !
(लेखक सामाजिक-सांस्कृतिक स्कॉलर हैं)
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