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...जब लता मंगेशकर का नाम पहली बार रेडियो सिलोन पर गूंजा

भारत-राग को आवाज देने वाली वह देह खाक हुई जैसे कि हर देह हुआ करती थी. लेकिन, याद रहे उस देह पर हिन्द की चादर लिपटी थी और इस चादर पर जितना ये लिखा था कि `ऐ मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी, उतना ही यह भी कि मेरी आवाज ही पहचान है—गर याद रहे `. पुराने भारत और उस भारत के राग को मनीकंट्रोल हिन्दी की आंसू भरी श्रद्धांजलि !

MoneyControl Newsअपडेटेड Feb 07, 2022 पर 1:07 PM
...जब लता मंगेशकर का नाम पहली बार रेडियो सिलोन पर गूंजा
भारत-राग को काल के कंठ में बसा देने वाली इस महासाधिका की देह मुंबई के शिवाजी पार्क की मिट्टी में राख हो चुकी है, लेकिन सुर और स्वर बचा रह गया है

चंदन श्रीवास्तव

आज मन बुझा हुआ है, आज देश का झंडा आधा झुका हुआ है— टीवी बता रहा है कि दो दिन का राष्ट्रीय शोक है। इस राष्ट्रीय शोक की घोषणा ना होती तो भी मन के आंगन में शोक ही होता क्योंकि सब जानते हैं — इस देश का मन अपने पचहतर साल के सफर में खुशी और गम के जितने पड़ावों से गुजरा है उन सभी पड़ावों पर कुछ गीत रखे हैं मगर इन गीतों को सुर और स्वर देने वाला महामौन में लीन हो चुका है।

एक सवाल सबको सता रहा है-अब देश के दर्द-ओ-गम को, इसकी हंसी-खुशी को सुर और स्वर कौन देगा ? धीरज रखिए, गीतों का वह अलबेला गवैया भले ही महामौन में लीन हो चुका लेकिन महामौन का मतलब महाशून्य नहीं होता। गवैये के महामौन में इस देश की जिन्दगी में आने वाले सारे वक्तों के गीत है। बीती सदी के विश्व-कवि टैगोर कहते थे ना कि काल के गाल पर जो आंसू हमेशा के लिए ठहर जाये उसे ताजमहल कहते हैं उसी टेक पर आज कहने को जी हो रहा है कि काल के कंठ में भारत नाम की सभ्यता के जो दर्द गीत बनकर बस जायें वे लता मंगेशकर कहलाते है।

श्रद्धांजलि के ये शब्द नाकाफी हैं

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