हर्ष वर्धन त्रिपाठी
किसानों को मंडी के मकड़जाल से मुक्ति दिलाने, अपनी उपज की कीमत तय करने के लिए किसी के साथ उपज का सौदा करने वाले विधेयकों को रविवार को ही राज्यसभा से स्वीकृति मिल गयी थी। हालांकि, दोनों विधेयकों का पारित होते समय देश के उच्च सदन में जिस तरह का निम्न हरकत राज्यसभा सांसदों ने की, अकल्पनीय थी। देश की संसदीय परंपरा के इतिहास में जिस दिन को किसानों को कई अधिकार देने के लिए याद किया जाएगा, दुर्भाग्य से उसी दिन को देश की संसदीय परंपरा के सबसे धूमिल दिन के तौर पर भी याद किया जाएगा।
मंगलवार, 22 सितंबर 2020 को राज्यसभा से किसानों और कृषि कारोबारियों के लिए एक और महत्वपूर्ण विधेयक आवश्यक वस्तु अधिनियम 2020 भी पारित हो गया। अब 20 सितंबर 2020 की तारीख जैसे किसानों के लिए महत्वपूर्ण कानूनों का मार्ग प्रशस्त होने के साथ ही उच्च सदन में हुई निम्न हरकत के लिए याद की जाएगी। वैसे ही 22 सितंबर 2020 की तारीख भी आवश्यक वस्तु अधिनियम के साथ ही देश में गांधी जी के उच्च आदर्शों को जीवन में कैसे उतारा जा सकता है, इसे बताने के लिए भी याद की जाएगी।
संयोग देखिए कि दूसरी बार राज्यसभा के उपसभापति चुने गये हरिवंश जी ने राज्यसभा के 8 हिंसक सांसदों के जरिये देश को गांधी दर्शन उस समय समझाया, जब देश में किसानों के नाम पर राजनीतिक मतदाता समूह तैयार करने की कोशिश की जा रही है। ठीक उसी तरह से जैसे गांधी उपनाम लेने भर से कांग्रेस पार्टी और आज के गांधी परिवार ने खुद को भारत की स्वाभाविक सत्ता का स्थाई दावेदार साबित करने की लगातार कोशिश की, लेकिन समय बदल गया है।
गांधी जी की पार्टी कांग्रेस तो भारत की स्वतंत्रता के साथ ही नहीं रही थी और आदर्श स्थिति होती कि देश की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वाली कांग्रेस पार्टी के नाम पर देश में चुनावी राजनीति न की जाती। कांग्रेस के बैनर तले देश की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वाले सभी नेता अपनी पार्टी बनाते या कोई भी और दल बनाकर चुनाव लड़ते और यह लिखा जाता कि कांग्रेस कोई चुनावी पार्टी नहीं है कि अंग्रेजों के जाने के बाद उसे सत्ता की गारंटी मान ली जाए। यह अलग बात है कि कांग्रेस देश के किसानों को कभी पूरी तरह से न्यूनतम समर्थन मूल्य की भी गारंटी नहीं दे सकी।
न्यूनतम समर्थन मूल्य देश के चुनिंदा किसानों को ही मिल पाता था, ठीक वैसे ही जैसे देश के चुनिंदा लोगों को ही स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक सत्ता सुख मिलता रहा। यह सिर्फ सन्दर्भ के लिए ध्यान में रहे, लेकिन असली बात यह कि जब देश में किसानों से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयक सदन में पेश होने तय थे तो गांधी उपनाम वाले कांग्रेस पार्टी के नेता सदन में नहीं थे। सोनिया गांधी “नियमित स्वास्थ्य परीक्षण” के लिए विदेश में है और उनके साथ उनके पुत्र राहुल गांधी भी गये हैं। पुत्र के तौर पर मां के साथ स्वास्थ्य परीक्षण के समय होना प्राथमिकता होती ही है, लेकिन राहुल गांधी इस देश के भावी प्रधानमंत्री के तौर पर प्रस्तुत किए जाते रहे हैं, संभवत: भविष्य में भी प्रस्तुत किए जाएंगे, ऐसे में क्या यह प्रश्न नहीं उठना चाहिए कि राहुल गांधी की सदन में मौजूदगी क्यों नहीं रही।
पूरे देश में किसान सिर्फ एक राज्य में सड़कों पर है और उस राज्य का नाम है पंजाब, जहां कांग्रेस के मजबूत नेता कैप्टन अमरिंदर कुर्सी संभाल रहे हैं। हरियाणा में किसानों के सड़कों के होने की बात अगर की जाएगी तो यह बात भी तथ्य के तौर पर जरूर सामने रहनी चाहिए कि रोहतक में किसानों ने विधेयकों के पारित होने के समर्थन में ट्रैक्टर रैली निकाली। किसानों की अगुआई का दावा करने वाली भारतीय किसान यूनियन के साथ किसान ही नहीं खड़े हैं। किसान नेता चौधरी चरण सिंह के बेटे अजित सिंह के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कोई किसान खड़ा होने को तैयार नहीं है।
धरतीपुत्र कहे जाने वाले मुलायम सिंह यादव के बेटे और अब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ पूरे प्रदेश में कहीं किसान नहीं खड़े हो रहे। सामाजिक न्याय की लड़ाई की झंडा लहराने का दावा करने वाले लालू प्रसाद यादव की पार्टी बिहार में किसानों को इस मुद्दे पर अपने साथ नहीं खड़ा कर पाई और तो और किसानों, सहकारी संगठनों, चीनी मिलों पर एकछत्र राज करने वाले शरद पवार के साथ भी किसान नहीं खड़े हुए। आखिर, क्यों। इस प्रश्न का उत्तर समझने के लिए यह आंकड़ा पहले ध्यान कर लीजिए। 2015 में फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया में बदलाव के लिए बनी समिति बताती है कि देश में 6 प्रतिशत से भी कम किसानों को सरकारी खरीद का लाभ मिल पाता है।
जाहिर है, किसी भी योजना की तरह इस सरकारी खरीद योजना का लाभ भी बड़े किसान ही ले पाते हैं क्योंकि उनमें ही ताकत है कि मंडी समिति, मकड़जाल में फंसे कृषि बाजार में सरकारी खरीद वाली पर्ची कटवा पाएं। अब इस आंकडे से आपको आसानी से समझ आ गया होगा कि, विपक्ष के बार-बार चिल्लाने के बाद भी कि तीनों विधेयकों को कानून बनाकर नरेंद्र मोदी सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था और मंडियों को खत्म करने जा रही है, किसान क्यों सरकार के विरोध में नहीं उतर रहा है।
अब दूसरी महत्वपूर्ण बात जिन किसानों को लगता है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था उसे लाभ दे रही है, उन्हें 2013-14 और 2019-20 तक की सरकारी खरीद का आंकड़ा ध्यान में आ रहा होगा। किसान विधेयकों पर हंगामे के बीच केंद्र सरकार ने रबी विपणन वर्ष 2021-22 के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित कर दिया। इस बार मोदी सरकार ने रबी सत्र के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य का एलान समय से पहले कर दिया, लेकिन किसान और कृषि से जुड़े लोग जब 2013-14 से 2019-20 की सरकारी खरीद कीमतों की तुलना करते हैं तो, उन्हें इसमें राजनीति दिखने के बजाय स्वाभाविक प्रक्रिया दिखने लगती है।
2013-14 में गेहूं का समर्थन मूल्य 1400 रुपये क्विंटल था जो अभी 1975 रुपये क्विंटल हो गया है। 2013-14 में धान का समर्थन मूल्य 1310 रुपये अभी 1868 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है। सरसों 3050 रुपये से अभी 4650 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है और मूंगफली 4000 से बढ़कर अभी 5275 रुपये प्रति क्विंटल हो गया। UPA 2 की सरकार जाते 2013-14 में गेहूं खरीदा गया 250.92 लाख टन और 2019-20 में गेहूं खरीदा गया 341.32 लाख टन। 2013-14 में UPA शासनकाल में धान की सरकारी खरीद हुई 355.78 लाख टन और किसानों के खाते में गये। 47851 करोड़ जबकि 2019-20 में मोदी सरकार ने धान की सरकारी खरीद 762.08 लाख टन की और किसानों के खाते में गये 1,39,841 करोड़ रुपये। 2013-14 में मसूर, मूंग और चना की सरकारी खरीद हुई ही नहीं और मोदी सरकार ने मसूर 56 हजार टन, मूंग 1.66 लाख टन और चना 7.76 लाख टन खरीदा।
इसे ऐसे समझिए कि सिर्फ गेहूं, धान की सरकारी खरीद का लाभ पाने वाले किसान से मोदी सरकार अब दूसरी उपज भी खरीदने लगी है। इसे ऐसे समझिए कि कुल किसानों में 6 प्रतिशत से भी कम किसान जिन्हें सरकारी खरीद का लाभ मिलता रहा है, उन्हें भी मोदी सरकार ने ज्यादा लाभ दिया और जिन सीमांत और छोटे किसानों की लड़ाई लड़ने का दावा कांग्रेस सहित पूरा विपक्ष और किसान संगठन कर रहे हैं, उन किसानों के खाते में बिना नागा मोदी सरकार प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की रकम डाल रही है।
कुल मिलाकर अभी की स्थिति में किसानों के पास कोई जायज वजह नहीं है कि किसानों के लिए बनाए जा रहे नये कानूनों का विरोध करें। वह भी तब जब कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल अलग-अलग समय पर इन्हीं कानूनों के पक्ष में किसानों और अपने कार्यकर्ताओं को समझा चुकी हैं। एपीएमसी से फल, सब्जी की बाहर निकालने और इन तीनों अध्यादेशों की खूबियां बताने वाला कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल और शिरोमणि अकाली दल नेता सुखबीर बादल का वीडियो खूब वायरल हो रहा है।
गांधी उपनाम लगाकर सत्ता का स्थाई सुख भोगने का समय 2014 में चला गया और अब किसानों के नाम पर सत्ता सुख भोगने का समय भी जाता दिख रहा है, उस पर किसानों के इतने महत्वपूर्ण दिन पर उच्च सदन में हुई निम्न हरकत ने किसानों का रहा-सहा समर्थन भी खत्म कर दिया और गांधी प्रतिमा के समक्ष धरने पर बैठे हिंसक सांसदों के लिए चाय लेकर पहुंचे राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश जी ने और पक्का कर दिया। उम्मीद की जा सकती है कि हिंसक राज्यसभा सांसदों को गांधी दर्शन पाठ पढ़ाकर हरिवंश जी ने किसानों को हिंसका बनाने की प्रवृत्ति पर भी तगड़ी चोट कर दी है।
(लेखक पत्रकार और हिंदी ब्लॉगर हैं)
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