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किसानों पर कर्जा बढ़ा है लेकिन क्या कर्ज चुकाने की उनकी क्षमता भी बढ़ी है?

जो किसान शिक्षा या इलाज जैसी अपनी जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहे हैं वो कर्ज कैसे चुका पाएंगे

MoneyControl Newsअपडेटेड Oct 03, 2021 पर 10:21 AM
किसानों पर कर्जा बढ़ा है लेकिन क्या कर्ज चुकाने की उनकी क्षमता भी बढ़ी है?

चंदन श्रीवास्तव

अगले साल कुल सात राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं। क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि इनमें से किस राज्य में कोई प्रमुख पार्टी किसानों से कर्जमाफी का चुनाव-जिताऊ वादा कर सकती है और किसी राज्य में नहीं? आइए, इस सवाल को जरा आसान बनायें।

साल 2022 में चुनाव देश के धुर पूरब और पश्चिम के राज्यों में होने हैं तो उत्तर और दक्षिण के राज्य (बशर्ते गोवा को दक्षिण का राज्य गिनें) में भी। विधानसभा चुनाव वाले इन छोटे-बड़े राज्यों में कुछ परंपरागत तौर पर धनी माने जाते हैं तो कुछ गरीब। इनमें एक राज्य ऐसा है जिसे हाल-हाल तक विकास का मॉडल राज्य कहकर पेश किया गया तो एक राज्य ऐसा भी जो साल भर से जारी किसान-आंदोलन का मुख्य गढ़ रहा है।

साल 2022 में विधानसभा चुनाव वाले राज्य हैः उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर पंजाब, हिमाचल प्रदेश, गुजरात और गोवा। पंजाब को छोड़ दें तो इन शेष राज्यों की सत्ता पर बीजेपी का दबदबा है। सो, परिपाटी के मुताबिक इन राज्यों में होने जा रहे चुनावों को 2024 के लोकसभा चुनावों के सेमी-फाइनल के रुप में देखा जायेगा।

ऐसे में सवाल बनता है कि किस राज्य में खेती-किसानी के सवाल को चुनाव का प्रमुख मुद्दा बनाया जा सकता है और किस राज्य में नहीं, किस राज्य में किसानों की आमदनी को दोगुना करने के केंद्र सरकार के वादे को विपक्षी दल प्रमुख सवाल के रुप में उठा सकते हैं और किस राज्य में नहीं।

कोरोना की महामारी हो या बेरोजगारी और गरीबी का सवाल, इन मुद्दों पर ठीक-ठीक आंकड़ों के लिए तरसते अपने देश में हाल-फिलहाल सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने एक बड़ी कमी पूरी की। मंत्रालय से जुड़े राष्ट्रीय सांख्यिकीय कार्यालय ने भारत के किसान-परिवारों की स्थिति और ऐसे परिवारों के पास मौजूद जमीन तथा पशुधन आदि के सर्वेक्षण के आधार पर एक बड़ी रिपोर्ट जारी की है।

इस रिपोर्ट के तथ्यों के सहारे आप कह सकते हैं कि अगले साल के विधान-सभा चुनाव में पंजाब, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड और गुजरात में किसानों की कर्जमाफी के मुद्दे के उछलने की संभावना ज्यादा है बनिस्पत गोवा, हिमाचलप्रदेश या मणिपुर के। वजह ये कि उत्तरप्रदेश, पंजाब या गुजरात जैसे राज्यों में कर्जदार किसान-परिवारों की तादाद ज्यादा है और आंकड़ों से ये भी झांकता है कि इन खेतिहर-परिवारों पर औसत कर्जे की रकम लगातार बढ़ती गई है।

किसान और कर्जदारी

मंत्रालय की रिपोर्ट देश के खेतिहर परिवारों पर मौजूद कर्ज के बारे में कई अहम तथ्यों का पता देती है। एक बड़ी बात तो यही निकलकर सामने आती है कि बीते छह सालों यानि 2013 से 2019 के बीच देश में खेती-किसानी करने वाले परिवारों पर औसत कर्जा 50 प्रतिशत से ज्यादा (कुल 57.7 प्रतिशत) बढ़ा है।

नेशनल सैम्पल सर्वे के 70 वें दौर की गणना पर आधारित छह साल पुरानी रिपोर्ट से पता चला था कि देश के किसान-परिवारों पर 2013 में औसतन 47000 रुपये का कर्जा था. नई रिपोर्ट (एनएसएस के 77 वें दौर की गणना पर आधारित) बताती है कि कर्ज की यह औसत रकम 2019 में बढ़कर 74,121 रुपये हो गई है।

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