चंदन श्रीवास्तव

चंदन श्रीवास्तव
अगले साल कुल सात राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं। क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि इनमें से किस राज्य में कोई प्रमुख पार्टी किसानों से कर्जमाफी का चुनाव-जिताऊ वादा कर सकती है और किसी राज्य में नहीं? आइए, इस सवाल को जरा आसान बनायें।
साल 2022 में चुनाव देश के धुर पूरब और पश्चिम के राज्यों में होने हैं तो उत्तर और दक्षिण के राज्य (बशर्ते गोवा को दक्षिण का राज्य गिनें) में भी। विधानसभा चुनाव वाले इन छोटे-बड़े राज्यों में कुछ परंपरागत तौर पर धनी माने जाते हैं तो कुछ गरीब। इनमें एक राज्य ऐसा है जिसे हाल-हाल तक विकास का मॉडल राज्य कहकर पेश किया गया तो एक राज्य ऐसा भी जो साल भर से जारी किसान-आंदोलन का मुख्य गढ़ रहा है।
साल 2022 में विधानसभा चुनाव वाले राज्य हैः उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर पंजाब, हिमाचल प्रदेश, गुजरात और गोवा। पंजाब को छोड़ दें तो इन शेष राज्यों की सत्ता पर बीजेपी का दबदबा है। सो, परिपाटी के मुताबिक इन राज्यों में होने जा रहे चुनावों को 2024 के लोकसभा चुनावों के सेमी-फाइनल के रुप में देखा जायेगा।
ऐसे में सवाल बनता है कि किस राज्य में खेती-किसानी के सवाल को चुनाव का प्रमुख मुद्दा बनाया जा सकता है और किस राज्य में नहीं, किस राज्य में किसानों की आमदनी को दोगुना करने के केंद्र सरकार के वादे को विपक्षी दल प्रमुख सवाल के रुप में उठा सकते हैं और किस राज्य में नहीं।
कोरोना की महामारी हो या बेरोजगारी और गरीबी का सवाल, इन मुद्दों पर ठीक-ठीक आंकड़ों के लिए तरसते अपने देश में हाल-फिलहाल सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने एक बड़ी कमी पूरी की। मंत्रालय से जुड़े राष्ट्रीय सांख्यिकीय कार्यालय ने भारत के किसान-परिवारों की स्थिति और ऐसे परिवारों के पास मौजूद जमीन तथा पशुधन आदि के सर्वेक्षण के आधार पर एक बड़ी रिपोर्ट जारी की है।
इस रिपोर्ट के तथ्यों के सहारे आप कह सकते हैं कि अगले साल के विधान-सभा चुनाव में पंजाब, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड और गुजरात में किसानों की कर्जमाफी के मुद्दे के उछलने की संभावना ज्यादा है बनिस्पत गोवा, हिमाचलप्रदेश या मणिपुर के। वजह ये कि उत्तरप्रदेश, पंजाब या गुजरात जैसे राज्यों में कर्जदार किसान-परिवारों की तादाद ज्यादा है और आंकड़ों से ये भी झांकता है कि इन खेतिहर-परिवारों पर औसत कर्जे की रकम लगातार बढ़ती गई है।
किसान और कर्जदारी
मंत्रालय की रिपोर्ट देश के खेतिहर परिवारों पर मौजूद कर्ज के बारे में कई अहम तथ्यों का पता देती है। एक बड़ी बात तो यही निकलकर सामने आती है कि बीते छह सालों यानि 2013 से 2019 के बीच देश में खेती-किसानी करने वाले परिवारों पर औसत कर्जा 50 प्रतिशत से ज्यादा (कुल 57.7 प्रतिशत) बढ़ा है।
नेशनल सैम्पल सर्वे के 70 वें दौर की गणना पर आधारित छह साल पुरानी रिपोर्ट से पता चला था कि देश के किसान-परिवारों पर 2013 में औसतन 47000 रुपये का कर्जा था. नई रिपोर्ट (एनएसएस के 77 वें दौर की गणना पर आधारित) बताती है कि कर्ज की यह औसत रकम 2019 में बढ़कर 74,121 रुपये हो गई है।
दूसरे शब्दों में कहें तो किसान-परिवार अगर अपने ऊपर चढ़े कर्जे की रकम प्रधानमंत्री किसान-सम्मान निधि योजना के मार्फत मिलने वाली सहायता राशि के सहारे चुकाना चाहें तो उन्हें कर्जा (74,121 रुपये का) चुकता करने में लगभग 12 साल लग जायेंगे। किसान सम्मान-निधि के तहत किसान परिवारों को सालाना 6,000 रुपये दिये जाते हैं।
किसान-परिवारों पर मौजूद कर्ज के इन तथ्यों को एक और रिपोर्ट के आंकड़े से मिलाकर पढ़ने की जरुरत है। देश के ग्रामीण-संकट के विभिन्न पहलुओं के आंकड़ों के एकीकृत संग्रह और विश्लेषण पेश करने वाली संस्था इन्कूलिसिव मीडिया फॉर चेंज के मुताबिक नाबार्ड (नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रुरल डेवलपमेंट) की साल 2016-17 की रिपोर्ट में कहा गया कि देश के कुल 52.5 प्रतिशत किसान-परिवार कर्जदार हैं और तब इन किसान-परिवारों पर औसतन 1,04,602 रुपये का कर्जा था।
इसका मतलब हुआ कि NSSO की 70 वें दौर की गणना पर आधारित 2013 की रिपोर्ट और नाबार्ड की 2016-17 की रिपोर्ट के बीच की अवधि में किसान-परिवारों पर मौजूद कर्जे की रकम में दोगुना से ज्यादा बढ़ी।
किन राज्यों के किसान सबसे ज्यादा कर्जदार
राष्ट्रीय सांख्यिकीय कार्यालय की नई रिपोर्ट से किसान-परिवारों पर मौजूद कर्जे को लेकर जो बड़ी तस्वीर उभरती है, उसकी एक अहम बात ये है कि दक्षिण भारत के राज्यों के किसान-परिवारों पर कर्जे का बोझ सबसे ज्यादा है। रिपोर्ट के मुताबिक आंध्रप्रदेश के कर्जदार किसान-परिवारों पर औसतन 2,45,554 रुपये का कर्जा है। यह शेष राज्यों की तुलना में सबसे ज्यादा है।
इसके बाद आता है केरल जहां प्रत्येक किसान-परिवार पर 2,42,482 रुपये का कर्ज है। पंजाब के किसान-परिवारों पर औसतन 1,19,500 रुपये का कर्ज है, सो कर्जदारी की रकम के मामले में पंजाब के किसान तीसरे नंबर पर आयेंगे जबकि तेलंगाना के किसान चौथे नंबर (कर्जे की रकम 1,52,113 रुपये) पर।
जहां तक कर्जदार किसान-परिवारों की संख्या का सवाल है, दक्षिण भारत के राज्य इस मामले में भी बाकी राज्यों से आगे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक साल 2019 में आंध्रप्रदेश में 93.2 प्रतिशत किसान-परिवार कर्जदार थे जबकि तेलंगाना में 91.7 फीसद किसान-परिवारों पर कर्जा था। इसके बाद नंबर है केरल का जहां 69.9 प्रतिशत किसान-परिवार कर्ज में डूबे हैं और चौथे नंबर पर है कर्नाटक जहां 67.6 प्रतिशत किसान-परिवार कर्जदार हैं।
लेकिन, इसके मायने ये नहीं कि कर्जदारी के मामले में उत्तर भारत के राज्यों में किसान-परिवारों की स्थिति बेहतर है। मिसाल के लिए, राजस्थान में 61.8 फीसद किसान-परिवार कर्जदार हैं तो उत्तरप्रदेश में आधे से अधिक(50.8 प्रतिशत) किसान-परिवारों पर कर्जा है। मघ्यप्रदेश के 45.7 फीसद किसान-परिवारों पर कर्ज की रकम चढ़ी है तो उत्तराखंड में ऐसे किसान-परिवारों की संख्या 43.8 प्रतिशत हैं।
राष्ट्रीय सांख्यिकीय कार्यालय की रिपोर्ट से यह भी झांकता है कि 2013 से 2019 के बीच कई राज्यों में किसान-परिवारों पर मौजूद कर्जे में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई है। मिसाल के लिए, असम के किसानों पर छह साल की अवधि में कर्जा 382 प्रतिशत बढ़ा है तो त्रिपुरा के किसानों पर कर्जे की रकम में 378 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। मिजोरम में तो किसान-परिवारों पर कर्जे की रकम में 709 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है।
छह सालों में किसान-परिवारों पर कर्जे की रकम में शत-प्रतिशत से ज्यादा बढ़ोत्तरी वाले अन्य राज्यों में प्रमुख हैं छत्तीसगढ़ (110.2 प्रतिशत), हरियाणा (131.5 प्रतिशत), हिमाचल प्रदेश (206.5 प्रतिशत), मध्यप्रदेश (131.8 प्रतिशत), नगालैंड (191.7 प्रतिशत) और सिक्किम (225.1 प्रतिशत)।
क्या कर्ज अदा हो सकेगा
उत्पादकता बढ़े और इसी के अनुरुप आमदनी के बढ़ने से कर्ज चुकाने की क्षमता बढ़े तो कर्जा लेना कत्तई बुरा नहीं। सवाल उठता है कि क्या देश के ज्यादातर किसान-परिवार अपने ऊपर बढ़ रहे कर्ज को कम कर पाने या पूरी तरह चुका पाने में सक्षम हैं ?
इस सवाल का उत्तर है- नहीं। वजह का पता चलता है राष्ट्रीय सांख्यिकीय कार्यालय की रिपोर्ट में यह देखने पर कि ज्यादातर किसान-परिवार किन कारणों से कर्जा ले रहे हैं और कितनी आमदनी वाले किसान-परिवार सबसे ज्यादा संख्या में कर्जदार हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक कम जोत वाले किसान-परिवारों के बीच कर्जदार किसान-परिवारों की संख्या सबसे ज्यादा है और कर्ज की रकम इनके ऊपर भले ही कुछ कम हो लेकिन ऐसे परिवारों की कुल आमदनी (यानि खेतीबाड़ी तथा अन्य काम जैसे मजदूरी आदि) इतनी नहीं कि वे अपने कर्जे की रकम चुका सकें।
मिसाल के लिए, कुल कर्जदार किसान-परिवारों में 34.4 प्रतिशत तादाद ऐसे किसान-परिवारों की है जिनके पास 0.40-1.00 हैक्टेयर की जमीन है। ऐसे ही, 0.01 से 0.40 हैक्टेयर जमीन की मिल्कियत वाले किसान-परिवारों के बीच 27.8 प्रतिशत परिवार कर्जदार हैं। अगर इसमें 1.01-2.00 हैक्टेयर तक की भूमि के मालिक किसानों-परिवारों को शामिल करें तो इस वर्ग में कर्जदार किसानों की संख्या 20.2 प्रतिशत है। मतलब, सबसे ज्यादा कर्जदार किसान-परिवार सीमांत या फिर छोटी जोत के किसान परिवार हैं।
ये परिवार खेती-बाड़ी की जरुरतों के लिए कम और परिवार की कोई अन्य जरुरत पूरी करने के कारण से ज्यादा कर्ज ले रहे हैं। जिस किसान-परिवार के पास भूमि की मिल्कियत जितनी ही कम है, उतनी ही ज्यादा आशंका है कि वह खेती-बाड़ी की अपेक्षा किसी अन्य जरुरत से कर्जा ले रहा है। मिसाल के लिए, रिपोर्ट के मुताबिक 0.01 हैक्टेयर से कम जमीन वाले कुल किसान-परिवारों में कर्जदार किसान-परिवारों की संख्या 38.5 प्रतिशत है। इनमें प्रत्येक पर 26,883 रुपये का कर्ज है।
लेकिन, कर्ज की इस रकम का 42 प्रतिशत हिस्सा इन परिवारों ने या तो अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का खर्चा उठाने के लिए लिया है या फिर बीमारी के इलाज का खर्चा चुकाने के लिए। ऐसे परिवारों पर मौजूद कर्जे की रकम में 12.8 प्रतिशत हिस्सा शादी-ब्याह, श्राद्ध-भोज आदि की जरुरतों के मद्देनजर ली गई रकम का है। 0.01 हैक्टेयर से कम जोत के मालिक किसान-परिवारों के कर्जे की रकम में बस 7 प्रतिशत हिस्सा ऐसी रकम का है जिसे खेती पर हुआ व्यय कह सकते हैं।
रिपोर्ट के तथ्यों से जाहिर है कि सर्वाधिक कर्जदार किसान-परिवार छोटी जोत के हैं और कर्ज की रकम चाहें उनके ऊपर बड़ी जोत वाले किसान-परिवारों की तुलना में एक चौथाई हो लेकिन ऐसे परिवारों में कर्जदारी का मुख्य कारण खेती-बाड़ी नहीं बल्कि अन्य जरुरतों की भरपायी है।
जो किसान-परिवार अपनी आमदनी से रोजमर्रा की जरुरतें (जैसे शिक्षा या बीमारी की दशा में उपचार पर हुआ खर्च) तक पूरी नहीं कर पा रहे उनके बारे में कैसे माना जाये कि वे कर्ज की रकम चुका पायेंगे?
(लेखक सामाजिक सांस्कृ्तिक स्कॉलर हैं)
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