देश में ब्लैक फंगस की चुनौती, डॉक्टरों ने कहा, मिथाइलिन ब्लू से हो सकता है इलाज

कोरोना के मरीजों के लिए इंडस्ट्रियल ऑक्सिजन और स्टेरॉइड्स का अधिक इस्तेमाल ब्लैक फंगस के मामले बढ़ने के कारण हो सकते हैं

अपडेटेड May 25, 2021 पर 9:46 PM
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देश में कोरोना वायरस की दूसरी लहर के बीच म्युमायकोसिस या ब्लैक फंगस की एक अन्य चुनौती आ रही है। कोरोना पॉजिटिव मरीजों में ब्लैक फंगस के मामले बढ़ रहे हैं। कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने इसे एक महामारी घोषित कर दिया है। पिछले वर्ष कोरोना फैलने की शुरुआत में भी ब्लैक फंगस के कुछ मामले आए थे लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस बार इलाज के दौरान स्टेरॉइड्स के अधिक इस्तेमाल के साथ ही गलत तरीके से इंडस्ट्रियल ऑक्सिजन या ऑक्सिजन कंस्ट्रेटर्स के इस्तेमाल ने इस बीमारी को बढ़ाया है।

लगभग तीन दशक का अनुभव रखने वाले सीनियर फिजिशियन डा अजय मोहन अग्रवाल ने कहा कि ब्लैक फंगस के मामलों में आ रही तेजी का कारण इंडस्ट्रियल ऑक्सिजन का अधिक इस्तेमाल हो सकता है। उन्होंने बताया कि ब्लैक फंगस होने के कारण हमारे वातावरण में मौजूद हैं। हालांकि, इससे पहले केवल कमजोर इम्युनिटी वाले लोगों को ही इसका खतरा होता था। स्टेरॉइड लेने वाले मरीज, डायबिटीज पर नियंत्रण नहीं रखने वाले लोगों की इम्युनिटी कमजोर हो सकती है और ऐसे में ब्लैक फंगस का एक संक्रमण के तौर पर शरीर पर हमला हो सकता है।

डा अग्रवाल ने कहा, "मेडिकल ऑक्सिजन की अचानक कमी होने पर अधिकतर मरीजों के पास इंडस्ट्रियल ऑक्सिजन इस्तेमाल करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। इंडस्ट्रियल ऑक्सिजन बहुत अधिक स्वच्छ नहीं होती और यह ब्लैक फंगस के मामले बढ़ने का कारण हो सकती है। अधिकतर मरीजों के लिए ऑक्सिजन सिलेंडर के फ्लो मीटर में डिस्टिल्ड वॉटर के बजाय नल के पानी का इस्तेमाल हो रहा है और इससे फंगस दूषित पानी से शरीर में पहुंच सकती है।"

क्या है मिथाइलिन ब्लू

मिथाइलिन ब्लू का इस्तेमाल कई दशकों से जख्मों को ठीक करने के लिए एक एंटीसेप्टिक के तौर पर किया जाता रहा है। इसमें एंटी-फंगल एक्टिविटी होती है क्योंकि यह मिटोचोंड्रिया में रिडॉक्स को घटाती है।

पिछले वर्ष कुछ डॉक्टरो ने कोरोना के मरीजों को मिथाइलिन ब्लू की सलाह दी थी। इसकी कम कीमत के कारण भी यह भारत जैसे विकासशील देशों में ऐसी बीमारी के इलाज के लिए बेहतर मानी जाती है।


मुंबई में कंसल्टेंट फिजिशन और डायबिटोलॉजिस्ट, डा वसीम घोरी ने बताया कि कुछ डॉक्टरों ने शुरुआत में इस दवा का इस्तेमाल किया था लेकिन क्लिनिकल ट्रायल नहीं होने के कारण बाद में इसे बंद कर दिया गया।

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