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अलपन बंदोपाध्याय पर ममता बनर्जी की जिद्द और केंद्र के साथ उनके टकराव से खड़ा हुआ संवैधानिक संकट

अब सवाल यह है कि केंद्र सरकार आलापन बंदोपाध्यायन के ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई कर सकती है?

MoneyControl Newsअपडेटेड Jun 01, 2021 पर 1:10 PM
अलपन बंदोपाध्याय पर ममता बनर्जी की जिद्द और केंद्र के साथ उनके टकराव से खड़ा हुआ संवैधानिक संकट

हर्ष वर्धन त्रिपाठी

ममता बनर्जी ने साफ़ कर दिया है कि नरेंद्र मोदी की सरकार की कोई बात नहीं मानेंगी। केंद्र सरकार को स्पष्ट चुनौती देते हुए पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव अलपन बंदोपाध्याय ने त्यागपत्र दे दिया। अब वह भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी नहीं रह गए।

दरअसल, 31 मई को ही अलपन की सेवानिवृत्ति की तारीख़ भी थी, लेकिन राज्य सरकार के आग्रह पर उन्हें तीन महीने का सेवा विस्तार मिला था और इसी बीच यास तूफ़ान प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की समीक्षा बैठक में न आलापन के न जाने से सेवा शर्तों के उल्लंघन का गम्भीर मामला सामना आ गया और उस पर सफ़ाई देने के लिए उन्हें सोमवार 31 मई 2021, सुबह 10 बजे, केंद्र सरकार के कार्मिक विभाग में उपस्थित होना था।

उनसे पूछा जाना था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पश्चिम बंगाल दौरे के समय मुख्य सचिव ने भारतीय प्रशासनिक सेवा की सेवा शर्तों का उल्लंघन क्यों किया। देश के प्रधानमंत्री किसी राज्य में जाते हैं तो राज्य के मुख्यमंत्री के साथ मुख्य सचिव और संबंधित ज़िले/विभाग के प्रमुख अधिकारियों का उपस्थित रहना सामान्य सेवाशर्तों के तहत आता है।

लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार से हर मोर्चे पर लगातार लड़ रही ममता बनर्जी न ख़ुद समय से पहुंची और न ही मुख्य सचिव को जाने दिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क़रीब आधे घंटे तक प्रतीक्षा करते रहे।

इसके बाद अलपन बंदोपाध्याय पर कार्रवाई तय मानी जा रही है। यहां एक और बात महत्वपूर्ण है कि आलापन बंदोपाध्याय को 24 मई को ही राज्य सरकार के अनुरोध पर तीन महीने का सेवा विस्तार मिला है वरना आलापन 31 मई 2021 को ही सेवानिवृत्त हो जाते।

ज़ाहिर है अलपन पश्चिम बंगाल कैडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं, सेवानिवृत्ति की दहलीज़ पर है और उन्हें सेवा विस्तार भी ममता बनर्जी की कृपा से मिला है तो उन्हें प्रधानमंत्री की अनदेखी करने का निर्णय लेने में ज़्यादा सोचना नहीं पड़ा होगा क्योंकि ममता बनर्जी जिस तरह से अपने नज़दीकी अधिकारियों के बचाव में उतरती हैं, उसमें आलापन को ज़्यादा नुक़सान नहीं दिख रहा होगा, लेकिन इससे केंद्र-राज्य के बीच संवैधानिक दायरे की लक्ष्मण रेखा को लेकर बड़ा संकट खड़ा हो गया है।

पश्चिम बंगाल की सरकार ने यह पहली बार नहीं किया है कि इससे पहले भी भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों को केंद्र भेजने से ममता बनर्जी की सरकार ने स्पष्ट इनकार कर दिया था। ममता बनर्जी की सरकार तीसरी बार प्रचंड बहुमत से पांच वर्षों के लिए चुनकर आ गई है। उसमें किसी अधिकारी के ख़िलाफ़ केंद्र के कड़े से कड़े निर्णय के बावजूद उस अधिकारी को राज्य सरकार की लाभ की छतरी लगाकर ममता बनर्जी बचाने की स्थिति में हैं।

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