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सरकारी पैसे से कारपेट, बेडशीट और तौलिया खरीदने पर जब सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के खिलाफ लाया गया महाभियोग प्रस्ताव

सत्ताधारी कांग्रेस ने पहले ही यह फैसला कर लिया था कि जज वी. रामास्वामी को बचाना है। सुप्रीम कोर्ट के जज के खिलाफ 1993 में संसद में गिर जाने से न्यायपालिका में सुधार की गति धीमी पड़ गई। जानकार लोग बताते हैं कि यह घटना विभिन्न अदालतों में भ्रष्टाचार के बढ़ने की एक महत्वपूर्ण कारक बनी

Surendra Kishoreअपडेटेड Mar 20, 2023 पर 8:21 AM
सरकारी पैसे से कारपेट, बेडशीट और तौलिया खरीदने पर जब सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के खिलाफ लाया गया महाभियोग प्रस्ताव
11 मई, 1993 को लोक सभा में जस्टिस रामास्वामी के खिलाफ पेश महाभियोग प्रस्ताव इसलिए गिर गया क्योंकि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के 205 सदस्यों ने सदन में चर्चा के दौरान उपस्थित रहने के बावजूद मतदान में भाग ही नहीं लिया

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वी. रामास्वामी के खिलाफ संसद में पेश महाभियोग प्रस्ताव गिर गया था। उस कारण न्यायपालिका में सुधार की गति धीमी पड़ गयी। पी.वी. नरसिंहराव के कार्य काल में सन 1993 में महाभियोग आया था। कांग्रेस का तब यह अघोषित तर्क था कि महाभियोग प्रस्ताव पास करने से दक्षिण भारतीय मतदातागण कांग्रेस से नाराज हो जाएंगे। अनेक लोगों का यह मानना था कि यदि प्रस्ताव के जरिए रामास्वामी पद से हटाए गए होते तो न्यायपालिका के विवादास्पद तत्वों में भय पैदा होता। इसका प्रभाव अन्य क्षेत्रों पर भी पड़ा।

नतीजतन भारतीय संसद लोकतंत्र के विभिन्न स्तम्भों में बढ़ रहे भीषण भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में विफल साबित हो रही है। 11 मई, 1993 को लोक सभा में जस्टिस रामास्वामी के खिलाफ पेश महाभियोग प्रस्ताव इसलिए गिर गया क्योंकि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के 205 सदस्यों ने सदन में चर्चा के दौरान उपस्थित रहने के बावजूद मतदान में भाग ही नहीं लिया। प्रस्ताव के पक्ष में मात्र 196 मत पड़े। महाभियोग प्रस्ताव के विरोध में एक भी मत नहीं पड़ा। कांग्रेस ने कोई व्हीप जारी नहीं किया था ।

सत्ताधारी कांग्रेस ने पहले ही यह फैसला कर लिया था कि जज वी. रामास्वामी को बचाना है। जानकार लोग बताते हैं कि यह घटना विभिन्न अदालतों में भ्रष्टाचार के बढ़ने की एक महत्वपूर्ण कारक बनी। खुद सुप्रीम कोर्ट के अनेक मुख्य न्यायाधीश समय -समय पर इस देश की न्यायपालिका में बढ़ते भ्रष्टाचार को लेकर चिंता जाहिर करते रहे हैं। लोकसभा में किसी जज के खिलाफ महाभियोग चलाने का वह एक मात्र उदाहरण है।

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दूसरी ओर, जब-जब सांसदों के खिलाफ न्यायपालिका कोई फैसला करती है तो दबे और खुले स्वर में सांसद न्यायपालिका पर आरोप लगा देते हैं। पर जब किसी जज को सजा देने का मौका आता है तो अधिकतर सांसद कन्नी काट लेते हैं। आखिर अधिकतर सांसद चाहते क्या हैं ? क्या वे यही चाहते हैं कि न्यायपालिका उनके भ्रष्टाचार पर पर्दा डाले और मौका आने पर हम रामास्वामी जैसे जजों को बचा लें ?

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