Jharkhand Politics: 'मेरा अपमान और तिरस्कार हुआ' चंपई सोरेन ने कर दी बगावत, बोले- कोई साथी मिल जाए, तो...
Jharkhand JMM Crisis: झारखंड के पूर्व CM चंपई सोरेन ने लिखा, मेरे पास तीन विकल्प थे। पहला, राजनीति से संन्यास ले लूं, दूसरा, अपना अलग संगठन बना लूं और तीसरा, अगर मुझे इस रास्ते पर कोई साथी मिल जाए, तो उसके साथ आगे की यात्रा करूं। उस दिन से लेकर आज तक और आगामी झारखंड विधानसभा चुनाव तक, इस यात्रा में मेरे लिए सभी विकल्प खुले हैं
Jharkhand Politics: चंपई सोरेन ने कर दी बगावत, बोले- कोई साथ मिल जाए, तो...
आखिरकार झारखंड की राजनीति में वो भूचल मच ही गया, जिसका अंदेशा था। न न करते हुए भी चंपई सोरेन ने खुलकर ये बता दिया कि JMM में सब कुछ ठीक नहीं है। झारखंड के पूर्व सीएम और जेएमएम नेता चंपई सोरेन ने X पर बहुत लंबा पोस्ट लिखा। इसमें उन्होंने लिखा, "इतने अपमान और तिरस्कार के बाद मुझे वैकल्पिक रास्ता तलाशने के लिए मजबूर होना पड़ा। भारी मन से मैंने विधायक दल की बैठक में कहा कि ''एक नया अध्याय'' आज से मेरी जिंदगी की शुरुआत होने जा रहा है। इसमें मेरे पास तीन विकल्प थे। पहला, राजनीति से संन्यास ले लूं, दूसरा, अपना अलग संगठन बना लूं और तीसरा, अगर मुझे इस रास्ते पर कोई साथी मिल जाए, तो उसके साथ आगे की यात्रा करूं। उस दिन से लेकर आज तक और आगामी झारखंड विधानसभा चुनाव तक, इस यात्रा में मेरे लिए सभी विकल्प खुले हैं।"
अपने X अकाउंट पर JMM विधायक ने लिखा, "आज समाचार देखने के बाद, आप सभी के मन में कई सवाल उमड़ रहे होंगे। आखिर ऐसा क्या हुआ, जिसने कोल्हान के एक छोटे से गांव में रहने वाले एक गरीब किसान के बेटे को इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया। अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत में औद्योगिक घरानों के खिलाफ मजदूरों की आवाज उठाने से लेकर झारखंड आंदोलन तक, मैंने हमेशा जन-सरोकार की राजनीति की है।"
उन्होंने कहा कि राज्य के आदिवासियों, मूलवासियों, गरीबों, मजदूरों, छात्रों और पिछड़े तबके के लोगों को उनका अधिकार दिलवाने की कोशिश करता रहा हूं। किसी भी पद पर रहा या नहीं, लेकिन हर पल जनता के लिए उपलब्ध रहा, उन लोगों के मुद्दे उठाता रहा, जिन्होंने झारखंड राज्य के साथ, अपने बेहतर भविष्य के सपने देखे थे।
उन्होंने दावा किया कि INDIA गठबंधन ने उन्हें मुख्यमंत्री के लिए चुना था। सोरेन ने लिखा, "इसी बीच, 31 जनवरी को, एक अभूतपूर्व घटनाक्रम के बाद, इंडिया गठबंधन ने मुझे झारखंड के 12वें मुख्यमंत्री के तौर पर राज्य की सेवा करने के लिए चुना। अपने कार्यकाल के पहले दिन से लेकर आखिरी दिन (3 जुलाई) तक, मैंने पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ राज्य के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया। इस दौरान हमने जनहित में कई फैसले लिए और हमेशा की तरह, हर किसी के लिए सदैव उपलब्ध रहा। बड़े-बुजुर्गों, महिलाओं, युवाओं, छात्रों और समाज के हर तबके तथा राज्य के हर व्यक्ति को ध्यान में रखते हुए हमने जो निर्णय लिए, उसका मूल्यांकन राज्य की जनता करेगी।"
चंपई सोरेन ने लिखा, "जब सत्ता मिली, तब बाबा तिलका मांझी, भगवान बिरसा मुंडा और सिदो-कान्हू जैसे वीरों को नमन कर राज्य की सेवा करने का संकल्प लिया था। झारखंड का बच्चा- बच्चा जनता है कि अपने कार्यकाल के दौरान, मैंने कभी भी, किसी के साथ न गलत किया, न होने दिया।"
अपमान का कड़वा घूंट पी लिया: चंपई सोरेन
उन्होंने लिखा, इसी बीच, हूल दिवस के अगले दिन, मुझे पता चला कि अगले दो दिनों के मेरे सभी कार्यक्रमों को पार्टी नेतृत्व की ओर से स्थगित करवा दिया गया है। इसमें एक सार्वजनिक कार्यक्रम दुमका में था, जबकि दूसरा कार्यक्रम पीजीटी शिक्षकों को नियुक्ति पत्र वितरण करने का था। पूछने पर पता चला कि गठबंधन ने 3 जुलाई को विधायक दल की एक बैठक बुलाई है, तब तक आप सीएम के तौर पर किसी कार्यक्रम में नहीं जा सकते।
उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, क्या लोकतंत्र में इस से अपमानजनक कुछ हो सकता है कि एक मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों को कोई और व्यक्ति रद्द करवा दे? अपमान का यह कड़वा घूंट पीने के बावजूद मैंने कहा कि नियुक्ति पत्र वितरण सुबह है, जबकि दोपहर में विधायक दल की बैठक होगी, तो वहां से होते हुए मैं उसमें शामिल हो जाऊंगा, लेकिन, उधर से साफ इंकार कर दिया गया।
आत्म-सम्मान पर लगी चोट मैं किसे दिखाता?
उन्होंने लिखा कि पिछले चार दशकों के अपने बेदाग राजनैतिक सफर में, मैं पहली बार, भीतर से टूट गया। समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं। दो दिन तक, चुपचाप बैठ कर आत्म-मंथन करता रहा, पूरे घटनाक्रम में अपनी गलती तलाशता रहा। सत्ता का लोभ रत्ती भर भी नहीं था, लेकिन आत्म-सम्मान पर लगी इस चोट को मैं किसे दिखाता? अपनों की ओर से दिए गए दर्द को कहां जाहिर करता?
चंपई सोरेन (Champai Soren) ने कहा कि जब सालों से पार्टी के केंद्रीय कार्यकारिणी की बैठक नहीं हो रही है, और एकतरफा आदेश पारित किए जाते हैं, तो फिर किस से पास जाकर अपनी तकलीफ बताता? इस पार्टी में मेरी गिनती वरिष्ठ सदस्यों में होती है, बाकी लोग जूनियर हैं, और मुझ से सीनियर सुप्रीमो जो हैं, वे अब स्वास्थ्य की वजह से राजनीति में सक्रिय नहीं हैं, फिर मेरे पास क्या विकल्प था? अगर वे सक्रिय होते, तो शायद अलग हालात होते।
मुझसे बिना बताए इस्तीफा ले लिया गया
कहने को तो विधायक दल की बैठक बुलाने का अधिकार मुख्यमंत्री का होता है, लेकिन मुझे बैठक का एजेंडा तक नहीं बताया गया था। बैठक के दौरान मुझ से इस्तीफा मांगा गया। मैं हैरान था, लेकिन मुझे सत्ता का मोह नहीं था, इसलिए मैंने तुरंत इस्तीफा दे दिया, लेकिन आत्म-सम्मान पर लगी चोट से दिल भावुक था।
पिछले तीन दिनों से हो रहे अपमानजनक व्यवहार से भावुक होकर मैं आंसुओं को संभालने में लगा था, लेकिन उन्हें सिर्फ कुर्सी से मतलब था। मुझे ऐसा लगा, मानों उस पार्टी में मेरा कोई वजूद ही नहीं है, कोई अस्तित्व ही नहीं है, जिस पार्टी के लिए हम ने अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। इस बीच कई ऐसी अपमानजनक घटनाएं हुईं, जिसका जिक्र फिलहाल नहीं करना चाहता। इतने अपमान और तिरस्कार के बाद मैं वैकल्पिक राह तलाशने हेतु मजबूर हो गया।
इस राह में अगर कोई साथी मिले, तो...
सोरेन ने बताया कि मैंने भारी मन से विधायक दल की उसी बैठक में कहा, "आज से मेरे जीवन का नया अध्याय शुरू होने जा रहा है।" इसमें मेरे पास तीन विकल्प थे। पहला, राजनीति से सन्यास लेना, दूसरा, अपना अलग संगठन खड़ा करना और तीसरा, इस राह में अगर कोई साथी मिले, तो उसके साथ आगे का सफर तय करना।
उस दिन से लेकर आज तक, तथा आगामी झारखंड विधानसभा चुनावों तक, इस सफर में मेरे लिए सभी विकल्प खुले हुए हैं।
उन्होंने आखिर में लिखा, "एक बात और, यह मेरा निजी संघर्ष है, इसलिए इसमें पार्टी के किसी सदस्य को शामिल करने और संगठन को किसी तरह का नुकसान पहुंचाने का मेरा कोई इरादा नहीं है। जिस पार्टी को हमने अपने खून-पसीने से सींचा है, उसका नुकसान करने के बारे में तो कभी सोच भी नहीं सकते। लेकिन, हालात ऐसे बना दिए गए हैं कि..