सुरेंद्र किशोर
सुरेंद्र किशोर
डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने 1954 में अपने दल के विधायकों से कहा था कि वे अपना सामान्य जीवन स्तर नहीं बढ़ाएं। डॉक्टर लोहिया तब प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव थे। डॉक्टर लोहिया का नाम लेकर इस देश के विभिन्न प्रदेश में राजनीति करने वाले कितने नेतागण लोहिया की उस सलाह को आज मानते हैं ? आज के कुछ समाजवादी नेता यदाकदा चार्टर्ड विमान में यात्रा कर रहे हैं। जबकि सांसद रहते हुए भी खुद लोहिया अपने लिए एक कार तक नहीं खरीद सके थे। 1967 में जब वे सांसद थे तो आम तौर पर ट्रेन और बस से ही लंबी यात्राएं करते थे।
क्या इस बीच यह देश इतना अमीर हो चुका है कि उसके समाजवादी नेता भी चार्टर्ड विमान से यात्रा करें और फाइव स्टार जीवन जिएं? सन 1967 में डॉक्टर लोहिया ने यह भी कहा था कि देश में सामान्य नागरिक संहिता लागू की जानी चाहिए। सन 1967 में मुलायम सिंह यादव लोहिया जी की पार्टी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से पहली बार उत्तर प्रदेश विधान सभा के लिए चुने गए थे। आज मुलायम सिंह यादव की पार्टी सामान्य नागरिक संहिता के सख्त खिलाफ है। 'वोट बैंक' को खुश रखना उस विरोध का एकमात्र कारण है।
फिर तो लोग पूछते हैं कि ऐसे नेता गण खुद को लोहियावादी क्यों कहते हैं? क्या उन्हें ऐसा कहने का कोई नैतिक अधिकार भी है? दरअसल लोहिया का नाम लेना और उनके बताए मार्ग पर चलना, अब ये दोनों दो अलग-अलग बातें चुकी है। सन 1954 में जब डॉक्टर लोहिया ने विधायकों को सलाह दी थी तब आजादी के लड़ाई के मूल्यों को मानने वाले नेता और कार्यकर्ता अधिक थे। वे सादा जीवन और उच्च विचार के पक्षधर होते थे। भरसक वे वैसा आचरण भी करते थे।
पर, समय बीतने के साथ जिस तरह सत्ताधारी दल में गिरावट आने लगी,उसी तरह प्रतिपक्ष भी अछूता नहीं रहा। कांग्रेसियों के बराबर तो नहीं, किंतु प्रतिपक्ष के जो नेता सांसद व विधायक बनने लगे, वे भी अपना जीवन स्तर ऊंचा करने में लग गए। पहले राजनीति सेवा थी,फिर नौकरी जैसी हुई। अब तो राजनीति और व्यापार में कोई फर्क नहीं रह गया है।अपवादों की बात और है। पिछले कुछ दशकों में धीरे-धीरे कांग्रेस व प्रतिपक्ष में फर्क मिटता चला गया। इस तरह वे आम गरीब जनता से कटने लगे। धर्म, जाति और दूसरे तत्व राजनीति व चुनाव पर हावी होते गए।
गिरावट की शुरुआत देखकर ही डॉक्टर लोहिया को पहले ही इससे चिंता हुई थी। इसी कारण उन्होंने 12 जून 1954 को इस संबंध में देश भर के अपने विधायकों को पत्र लिखा था। कई वर्षों तक तो कांग्रेसी नेताओं और प्रतिपक्षी नेताओं के जीवन स्तर में अंतर साफ नजर आता था।किंतु सन 1967 और खास कर सन 1977 के बाद अंतर कम होने लगा। आज स्थिति और भी खराब है।
डॉक्टर लोहिया ने अपने पत्र में लिखा था कि विधान मंडल का सदस्य चुने जाने पर राजनीतिक प्रतिष्ठा के अलावा आमदनी भी होती है। मौद्रिक लाभ के कारण भी लोग इस काम के प्रति आकर्षित होते हैं। इसलिए समाजवादी विधायकों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि वे अपना जीवन स्तर नहीं बढ़ाएं। पार्टी के सदस्यों को भी चाहिए कि अपनी जिम्मेदारी कारगर ढंग से निभाने के लिए विधायकों को मिलने वाली जरूरी सुविधाओं की शिकायत न करें।
डॉक्टर लोहिया ने लिखा था कि "सबसे जरूरी यह है कि विधायकगण अपने भाषणों और कामों से जनशक्ति निर्माण में सहायता करें। संसदीय कार्यों को पार्टी के अन्य कार्यों, आंदोलन ,रचनात्मक और कल्याणकारी काम से जोड़ना जरूरी है। यह मानना गलत है कि विधायिका का ही काम सब कुछ है। उतना ही गलत यह कहना है कि इसका कोई महत्व नहीं।" लोहिया ने अपने पत्र में कुछ अन्य जरूरी बातें भी लिखी थीं।
पर, सवाल है कि आज के लोहियावादी, डॉक्टर लोहिया के नाम का तोता- रटंत कर रहे हैं या उनके मूल्यों-आदर्शों को लागू करने के लिए भी कुछ कर रहे हैं? अनेक नकली लोहियावादियों का जीवन स्तर इतना बढ़ चुका है कि मध्ययुगीन राजाओं व आज के कुछ नेताओं में फर्क करना मुश्किल हो गया है। अपवादों को छोड़कर अनेक नेता व दल चुनावी टिकट बेच रहे हैं। जिनके पास अपार धन हैं, वे ही तो टिकट खरीद रहे हैं।
यह एक ही दल की बात नहीं है। अपवादों को छोड़कर अधिकतर दल इस धंधे में लिप्त हैं। धनाढ्य लोगों के साथ-साथ ऐसे -ऐसे बाहुबलियों को विधायिकाओं में भेजा जा रहा है जिन पर दर्जनों मुकदमे चल रहे हैं। डॉक्टर लोहिया कहा करते थे कि हम चुनाव जीतने के लिए नहीं बल्कि देश बनाने के लिए राजनीति करते हैं। यह कहने का मौका उन्हें सन 1967 के चुनाव में भी आया था। तब वे उत्तर प्रदेश से लोक सभा चुनाव लड़ रहे थे। एक संवाददाता ने उनसे पूछा कि क्या आप देश में सामान्य नागरिक संहिता लागू करने के पक्ष में हैं? डॉक्टर लोहिया ने कहा कि हां,मैं उसके पक्ष में हूं।
याद रहे कि भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्वों वाले अध्याय में यह लिखा गया है कि "राज्य, भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।" डॉक्टर लोहिया के इस बयान का मुस्लिम समुदाय ने विरोध किया। लोहिया के समाजवादी साथियों ने भी लोहिया से कहा कि अब तो आप चुनाव हार जाएंगे। उस पर लोहिया ने कहा कि मैं सिर्फ चुनाव जीतने के लिए राजनीति नहीं करता। बल्कि देश बनाने के लिए राजनीति करता हूं। भले मैं हार जाऊं, किंतु मैं अपने विचार पर कायम रहूंगा। वे सिर्फ करीब 400 मतों से ही जीत सके थे।पर उन्हें इसकी परवाह नहीं थी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)
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