Rahul Gandhi Defamation Case: गुजरात हाई कोर्ट (Gujarat High Court) ने कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) की उस पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने 'मोदी सरनेम (Modi Surname Case)' वाली टिप्पणी को लेकर आपराधिक मानहानि मामले में उनकी दोषसिद्धि पर रोक लगाने का अनुरोध किया था। मोदी सरनेम और मानहानि मामले में गुजरात हाई कोर्ट ने राहुल गांधी की दो साल की सजा बरकरार रखी है। इस मामले में दो साल की सजा के खिलाफ राहुल गांधी की अपील पर गुजरात हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया है। दोषसिद्धि पर रोक लगाने से इनकार करने के बाद गांधी की संसद सदस्यता फिलहाल रद्द रहेगा।
कांग्रेस अब अगले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकती है। राहुल गांधी ने मानहानि के इस मामले में निचली कोर्ट से मिली सजा पर रोक लगाने की मांग के साथ हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। जस्टिस हेमंत प्रच्छक ने मई में राहुल गांधी की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोई अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया था। जज ने कहा था कि वह ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद अंतिम आदेश पारित करेंगे।
Modi Surname Case: 2019 का है मामला
2019 लोकसभा चुनावों से जुड़े बयान के लिए सूरत की CJM कोर्ट ने 23 मार्च को राहुल गांधी को दो साल की सजा सुनाई थी। इसके बाद उनकी लोकसभा की सदस्यता भी चली गई थी। राहुल गांधी ने सीजेएम कोर्ट के फैसले को सूरत सेशंस कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन वहां से राहत नहीं मिलने पर राहुल गांधी हाई कोर्ट पहुंचे थे।
राहुल गांधी के वकील ने 29 अप्रैल को सुनवाई के दौरान गुजरात हाई कोर्ट में तर्क दिया था कि एक जमानती एवं गैर-संज्ञेय अपराध के लिए अधिकतम दो साल की सजा का मतलब है कि उनके मुवक्किल अपनी लोकसभा सीट खो सकते हैं।
Modi Surname Case: बीजेपी विधायक की याचिका पर फैसला
गुजरात में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के विधायक पूर्णेश मोदी द्वारा दायर 2019 के मामले में सूरत की मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट अदालत ने 23 मार्च को राहुल गांधी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 499 और 500 (आपराधिक मानहानि) के तहत दोषी ठहराते हुए दो साल जेल की सजा सुनाई थी।
फैसले के बाद गांधी को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधानों के तहत संसद की सदस्यता से अयोग्य घोषित कर दिया गया था। राहुल गांधी 2019 में केरल के वायनाड से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए थे। 2 मई को इस मामले में सुनवाई पूरी हो गई थी। इसके बाद हाई कोर्ट समर वेकेशन के लिए बंद था। इसलिए जस्टिस एम एम प्राच्छक ने फैसले को आदेश पर रख लिया था।