यूपी विधानसभा चुनाव के नतीजें बहुत कुछ कहते हैं। क्या कहते हैं यह सुनने के लिए आपको थोड़ा ध्यान होगा। यूपी की सत्ता में भाजपा की वापसी का संकेत तो एग्जिट पोल ने दे दिया था। इसलिए यूपी के नतीजों ने सपा गठबंधन को छोड़ किसी को हैरान नहीं किया। लेकिन, 2017 के मुकाबले कम ताकत (कम सीटों) के साथ सरकार बनाने जा रही भाजपा ने देश के पॉलिटिकल फ्यूचर का संकेत दे दिया है।
1985 के बाद भाजपा पहली पार्टी है जो यूपी में लगातार दूसरी बार सरकार बनाने जा रही है। 2012 में हुए विधानसभा चुनावों में सपा को जीत मिली थी। अखिलेश यादव ने सरकार बनाई, जिसने पांच साल पूरे किए। इससे पहले 2007 में बसपा जीती थी। मायावती ने सरकार बनाई, जो पांच साल चली। इससे पहले हुए कई विधानसभा चुनावों में किसी दल को जनता ने स्पष्ट बहुमत नहीं दिया था। इसलिए खिचड़ी सरकारें बनती और टूटती रहीं।
यूपी में पहली विधानसभा 20 मई, 1952 को वजूद में आई थी। तब से अब तक के 70 साल में यूपी को 21 मुख्यमंत्री मिले। लेकिन, योगी आदित्यनाथ पहले मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने अपना पांच साल का पहला कार्यकाल पूरा करने के बाद दोबारा मुख्यमंत्री बनने के करीब हैं। यह उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य को देखते हुए बड़ी उपलब्धि है। राज्य की सीमा एक तरफ दिल्ली को छूती है तो दूसरी तरफ बिहार को। करीब 900 किमी की लंबाई में फैले इस राज्य में अलग-अलग संप्रदाय और जाति के लोग रहते हैं। ये राजनीतिक रूप से बहुत ज्यादा बंटे हैं। ऐसे में भाजपा को दोबारा जीत मिलना मुख्यमंत्री योगी के लिए बड़ी उपलब्धि है।
भाजपा की जीत ने संकेत दे दिया है कि राज्य का मतदाता समय के साथ अब काफी होशियार हो चुका है। यह भी साबित हो चुका है की नेताओं की रैलियों में दिखने वाली भीड़ को पार्टियों की जीत की गारंटी नहीं मानी जा सकती। यूपी में तीन नेताओं ने सबसे ज्यादा रैलियां की थीं। इनमें कांग्रेस की प्रियंका गांधी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और सपा प्रमुख अखिलेश यादव शामिल हैं। अखिलेश की रैलियों में बहुत भीड़ दिखती थी। कई बार तो उनकी रैली में भीड़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली से ज्यादा होती थी।
अखिलेश जिस तरह चुनाव से ठीक पहले आरएलडी जैसे छोटे दलों के साथ गठबंधन बनाने में सफल हुए थे, उससे माना जा रहा था कि वह भाजपा को कड़ी टक्कर देने में सफल होंगे। किसान आंदोलन के चलते पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक बड़े मतदाता वर्ग की नाराजगी को भी अखिलेश को फायदा के रूप में देखा जा रहा था। लेकिन, अब तक आए सीटों के रुझान बताते हैं कि अखिलेश सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने के लिए जरूरी जादुई आंकड़े से दूर रह गए। उन्हें अपना चाचा शिवपाल यादव का साथ भी चुनाव नहीं जीता सका।