क्या है CAA? मोदी सरकार ने लोकसभा चुनाव से पहले किया लागू, नागरिकता कानून को लेकर क्यों मचा था बवाल?
CAA Rules: इस बीच, पिछले दो सालों में, नौ राज्यों के 30 से ज्यादा जिला मजिस्ट्रेटों और गृह सचिवों को नागरिकता कानून 1955 के तहत अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आने वाले हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैनियों, पारसियों और ईसाइयों को भारतीय नागरिकता देने की शक्तियां दी गई हैं। दिलचस्प बात यह है कि असम और पश्चिम बंगाल के किसी भी जिले के अधिकारियों को अब तक ये अधिकार नहीं दिए गए हैं
केंद्र की मोदी सरकार ने लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections 2024) से ठीक पहले नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (CAA), 2019 लागू करने की घोषणा कर दी। गृह मंत्रालय (MHA) ने CAA का नोटिफिकेशन जारी कर दिया है, यानि इस नए कानून के नियम अब देशभर में लागू होंगे। CAA नियम जारी किए जाने के बाद, बगैर दस्तावेज के पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश से आये हिंदुओं, सिखों को नागरिकता मिलेगी।
27 दिसंबर, 2023 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि CAA के कार्यान्वयन को कोई नहीं रोक सकता, क्योंकि यह देश का कानून है और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर इस मुद्दे पर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाया।
केंद्र सरकार ने पिछले दो साल में नौ राज्यों को पुराने कानून के तहत ही नागरिकता देने की शक्तियां दी हैं। ये नौ राज्य, जहां पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत रजिस्ट्रेशन या नेचुरलाइजेशन के जरिए भारतीय नागरिकता दी जाती है, वे हैं गुजरात, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और महाराष्ट्र।
दिलचस्प बात यह है कि असम और पश्चिम बंगाल के किसी भी जिले के अधिकारियों को अब तक ये अधिकार नहीं दिए गए हैं, जहां यह मुद्दा राजनीतिक रूप से बहुत संवेदनशील है।
क्या है CAA?
नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 (CAA) एक अधिनियम है, जो 11 दिसंबर, 2019 को संसद में पारित किया गया था। CAA 2019 में 1955 के नागरिकता अधिनियम में बदलाव किया गया। इसमें अब हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता की अनुमति दी गई, जो दिसंबर 2014 से पहले "धार्मिक उत्पीड़न या उत्पीड़न" के कारण पड़ोसी मुस्लिम बहुसंख्यक देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भाग कर भारत आए हैं।
हालांकि, अधिनियम में मुसलमानों को शामिल नहीं किया गया है। CAA 2019 संशोधन के तहत, 31 दिसंबर, 2014 तक भारत में प्रवेश करने वाले और अपने मूल देश में "धार्मिक उत्पीड़न या धार्मिक उत्पीड़न के डर" का सामना करने वाले प्रवासियों को नए कानून के तहत भारतीय नागरिकता के लिए पात्र बनाया गया था।
ऐसे प्रवासियों को छह सालों में फास्ट ट्रैक भारतीय नागरिकता प्रदान की जाएगी। संशोधन ने इन प्रवासियों के देशीयकरण के लिए निवास की जरूरत को 11 साल से घटाकर पांच साल कर दिया।
देश के कई हिस्सों में CAA को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन
CAA के खिलाफ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और पूर्वोत्तर राज्यों समेत देश भर में व्यापक विरोध प्रदर्शन भी हुए। असम और दूसरे पूर्वोत्तर राज्यों में विरोध प्रदर्शन इस डर से हिंसक हो गया कि इस कदम से उनके "राजनीतिक अधिकारों, संस्कृति और भूमि अधिकारों" का नुकसान होगा और बांग्लादेश से आने वाले और ज्यादा लोगों को बढ़ावा मिलेगा।
आंदोलनकारियों का कहना था कि नागरिकता कानून में नया संशोधन मुसलमानों के साथ भेदभाव करता है और देश के संविधान में दिया गया समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है। कई विरोधियों का कहना ये भी था कि 'सरकार इसके जरिए देश में रह रहे मुस्लिमों की नागरिकता भी खारिज कर देगी।'
मुस्लिम पक्ष का ये भी कहना था कि शिया और अहमदी जैसे संप्रदायों को भी पाकिस्तान जैसे मुस्लिम-बहुल देशों में उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, लेकिन उन्हें CAA में शामिल नहीं किया गया है।
इसमें तिब्बत, श्रीलंका और म्यांमार जैसे दूसरे देशों से सताए गए धार्मिक अल्पसंख्यकों के बहिष्कार पर भी सवाल उठाए गए थे। इस तरह के विरोध प्रदर्शन और विवादों के कारण ही पांच साल से CAA के नियमों को देश में लागू नहीं किया गया था। जबकि संसद से पास होने के बाद, इसे राष्ट्रपति से भी मंजूरी मिल गई थी।