सुरेंद्र किशोर
सुरेंद्र किशोर
बेनजीर भुट्टो ने अपने परिवार के कहने पर अरेंज मैरेज के लिए हामी भर दी थी। और, इस तरह उन्होंने अपने एक अरमान की कुर्बानी दे दी। बेनजीर का अरमान था कि "मैं किसी ऐसे व्यक्ति से शादी करूंगी जिसे मैं जानती -समझती हो। मुझे उससे इतना प्यार हो जाए कि मैं उससे शादी करने की तमन्ना करने लगूं।" पर, यह हो न सका। आत्मकथा में वह लिखती हैं कि "मेरे राजनीतिक जीवन ने ऐसी किसी स्थिति का रास्ता पूरी तरह बंद कर दिया था। किसी से भी, जहां दूर -दूर तक ऐसी बात न हों, वहां भी, जरा सी अंतरंगता दिखने पर अफवाहें फैलने और तिल का ताड़ बनने में देर न लगती।"
"पूरब की बेटी" नामक अपनी जीवनी में, बेनजीर ने लिखा है कि ज्यादातर पूरब वालों में, परिवार की तरफ से तय शादी ही की जाती है। हालांकि मेरे लिए ऐसा होना एक इत्तेफाक की बात थी। बेनजीर के माता-पिता ने प्रेम विवाह किया था। उस पृष्ठभूमि से उत्साहित बेनजीर ने सोचा था कि "मैं किसी के प्रेम में पहले डूबूंगी, फिर उससे शादी करूंगी। पर मेरी निजी जिंदगी ने सन 1987 में एक नाटकीय मोड़ लिया,जब मैंने अपने परिवार के कहने पर एक तय की हुई शादी के लिए हामी भर दी।अपने राजनीतिक जीवन के हित में मुझे अपने अरमान की कुर्बानी देनी पड़ी।"
बेनजीर के अनुसार, "शादी के लिए रिश्ते पहले से ही आने लगे थे। मैं एक पुराने और पाकिस्तान के इज्जतदार घराने की लड़की थी। उस समय प्रधान मंत्री की बेटी तो थी ही। ग्रेजुएशन स्तर की पढ़ाई करते समय अमेरिका में मैं स्त्री आंदोलनों का विकास होता देख रही थी तभी से मेरा यह सोचना था कि शादी और आजीविका दोनों में आपस में कोई विरोध नहीं है। इन्हें साथ -साथ निभाया जा सकता है। मैं किसी ऐसे आदमी से शादी करने को तैयार थी जो अपने जीवन में कुछ उद्देश्य लेकर चल रहा हो और वह मुझे भी ऐसा करने की आजादी दे। पर फौजी विद्रोह ने ऐसे किसी विचार को छितरा दिया।
हालांकि मेरे लिए रिश्ते मार्शल लॉ के कुछ वर्षों के दौरान भी आते रहे, पर मैं उन्हें ठुकरा देती रही। मैं उस दौर में शादी जैसा सुख पाना कैसे सोच सकती थी, जब मेरे पिता जेल में थे और उनके जीवन पर खतरा मंड़रा रहा था। मेरे पिता की हत्या के बाद मेरी शादी जैसा सवाल और भी ज्यादा बेमानी हो गया। मैंने यहां तक कि इस बारे में बात भी करने से इनकार कर दिया। मैं अपने पिता की मौत से बहुत विह्वल हो गई थी।
याद रहे कि जनरल जिया उल हक के मार्शल लॉ शासन काल में सन 1979 में बेनजीर के पिता जुल्फीकार अली भुट्टो को जेल में ही फांसी पर लटका दिया गया था। भुट्टो पर एक हत्या का आदेश देने के आरोप था। बेनजीर ने लिखा कि "सन 1980 में मेरी मां ने जब मेरी शादी की बात मुझसे चलाई तो मैंने साफ मना कर दिया। मैं और दो साल रुकना चाहती थी। दरअसल यह न केवल मेरी अपने पिता को श्रद्धांजलि थी, बल्कि अपनी जिंदगी में दर्द से इतनी भरी हुई थी कि उसमें ऐसी किसी खुशी की गुंजाइश ही नहीं थी। बाद में मेरी मां और आंटी मन्ना ने मुझसे एक प्रस्ताव को लेकर बात की।
एक जरदारी खानदान का लड़का था जिसके लिए बात चलाई जा रही थी। आसिफ नाम था उसका। मुझे बाद में पता चला कि आंटी मन्ना ने जरदारी लोगों से आसिफ के बारे में, मेरी मां से भी बात करने से पहले, पूरी जानकारी जुटा ली थी। आसिफ ने लंदन सेंटर ऑफ इकोनोमिक्स एंड पालिटिकल स्टडीज में पढ़ाई की थी। बड़ी जायदाद, खेती बाड़ी और इमारतें बनवाने का उसका काम था। उसे तैराकी करने, स्क्वैश खेलने और पोलो का शौक था। उसे पढ़ने का भी शौक था।
उसके पिता जनाब हाकिम अली जो नेशनल असेम्बली के सदस्य थे, अब एक अवामी नेशनल पार्टी के वाइस प्रसिडेंट थे और MRD के सदस्य थे। उन्होंने कहा था कि मेरा खैर बेनजीर की बराबरी तो नहीं कर सकता, लेकिन पढ़ने का शौक उसे भी है। आंटी मन्ना आसिफ परिवार की पुरानी दोस्त हैं। उन्होंने भी एक बार दुल्हे से मिलना चाहा। आसिफ को उनके घर बुलाया गया। जहां उसने सारे इम्तहान पास कर लिये।
छरहरा स्मार्ट जिस्म और उस पर पोलो खेलने का लिवास-सब कुछ संतोषजनक रहा। आंटी मन्ना ने इंगलैंड में मेरी मां से संपर्क किया। अंततः आसिफ अली जरदारी से सन 1987 के अंत में बेनजीर की शादी हो गई।
अपनी शादी के बारे में बेनजीर ने प्रेस बयान में कहा कि "अपने मजहब की रीति और अपने परिवार की तरफ से अपनी जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए मैं शादी के उस प्रस्ताव पर अपनी सहमति देती हूं जिसे मेरी मां बेगम नुसरत भुट्टो ने मेरे सामने रखा था। मेरी यह शादी किसी भी तरह मेरे राजनीतिक मंसूबों को नहीं बदलती।"
(लेखक राजनीतिक मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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