Ram Mandir: 'सरयू नदी में तैर रही थीं साधु-संतों की लाशें' राम मंदिर संघर्ष की कहानी कार सेवक दिलीप शुक्ला की जुबानी
Ram Mandir Inauguration: कोटा के दिलीप शुक्ला (Dilip Shukla) भी हैं, जो 1990 और 1992 हर पल के गवाह रहे, अब 22 जनवरी को दिवाली की तरह अपने परिवार के साथ मनाने की तैयारी कर रहे हैं । दिलीप शुक्ला की दास्तां उस वक्त बने हालात और कठिन संघर्ष के बाद आज के सुखद परिणाम को बताती है
Ram Mandir: 'सरयू नदीं बह रही थीं साधु-सांतों की लाशें' राम मंदिर संघर्ष की कहानी कार सेवक दिलीप शुक्ला की जुबानी
Ram Mandir Iauguration: 22 जनवरी, वो तारीख जब देश में राम मंदिर (Ram Mandir) का लक्ष्य साकार हो रहा है, लेकिन इस भव्य मंदिर के साथ एक लंबे संघर्ष की भी कहानी है। इस लड़ाई को बड़े पैमाने पर कार सेवकों ने लड़ा, उन्हीं में से एक कोटा के दिलीप शुक्ला (Dilip Shukla) भी हैं, जो 1990 और 1992 हर पल के गवाह रहे, अब 22 जनवरी को दिवाली की तरह अपने परिवार के साथ मनाने की तैयारी कर रहे हैं । दिलीप शुक्ला की दास्तां उस वक्त बने हालात और कठिन संघर्ष के बाद आज के सुखद परिणाम को बताती है।
दिलीप बताते हैं, "जब 1990 मैं मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के खुजनेर कस्बे से कार सेवा के लिए गया, लेकिन पूरे संघर्ष के बाद भी हम मंदिर तक नहीं पहुंच पाए झांसी और इटावा के बीच नदी के पुल पर पुलिस ने बैरिकेडिंग कर, जनरेटर के जरिए उसमें करंट छोड़ा दिया। उसके बाद हम सभी कार सेवकों ने जनरेटर को बंद किया, तो पुलिस ने हम पर लाठियां बरसाईं। हमारे लिए जो लोग खाने और बैठने की व्यवस्था कर रहे थे, उनकी मोटरसाइकिलों में आग लगा दी। हम पर आंसू गैस के गोले फेंके।
उन्होंने आगे बताया कि स्थिति ऐसी थी कि पुलिस हम पर गोला फेंकती और हम उसे उठा कर नदी में फेंकते रहे। उसके बाद हवाई फायरिंग की गई, भगदड़ मच गई उसके बाद सभी कार सेवकों को बसों में भरकर कानपुर में कृषि उपजमंडी में अस्थाई जेल बनाकर कैद कर दिया गया।
'सरयू नदी में तैर रही थीं साधु-संतों और कार सेवकों की लाशें'
दिलीप ने याद किया, "जब हमें पता चला कि अयोध्या में गोली कांड हो गया और कई कार सेवक मारे गए, मैं और मेरे साथ में हजारों कार सेवक, जो कानपुर में उपजमंडी में अस्थाई जेल में कैद थे, वहां से भाग निकले। पुलिस के साथ धक्का मुक्की कर वहां से सभी कार सेवक बाहर तो निकल गए थे, लेकिन सब बिछड़ गए थे।
चारों ओर पुलिस कार सेवकों को ढूंढ रही थी, सारे रास्ते बंद थे, लेकिन मैं और मेरे साथ, जो कार सेवक थे, उन्होंने ठान लिया था कि अयोध्या तो जाना है। हम वहां से अयोध्या के लिए निकले अयोध्या पहुंचे, तो सरयू नदी के किनारे दूसरी तरफ से पुलिस आवाज लगा रही थी कि इधर कोई नहीं आएगा। हमने देखा कि सरयू नदी में साधु-संतों और कार सेवकों की लाशें तैर रही थीं, और पुल के ऊपर कार सेवकों के चप्पल जूते और बैग के ढेर लगे हुए थे।
उन्होंने बताया कि इस मंजर को देख कर सबकी आंखों में आंसू थे दिल दहल उठा था। कुछ देर के लिए सब शांत हो गए, समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करें। उसके बाद हमें नदी किनारे केवट समाज के लोग दिखे हम उनके पास गए उनसे बातचीत की क्या घटना हुई, बस उन्होंने इतना ही कहा कि पुलिस चारों ओर ढूंढ रही है, आप यहां से चले जाएं। हमारे पास कोई रास्ता नहीं था, कहां से वापस लौटें। लौटते-लौटते हमने सरयू नदी मैं जलपान कर यह कसम खाई की रामलला हम आएंगे, मंदिर यहीं बनाएंगे और उसके बाद हम वहां से वापस लौट आए।
1992 में दिलीप कोटा विश्व हिंदू परिषद (VHP) के संपर्क में आए और विश्व हिंदू परिषद की तरफ से कहा गया कि आपको कार सेवा के लिए चलना है। दिलीप ने बताया की कोटा से बाकी लोगों के साथ में अयोध्या के लिए स्टेशन पहुंचा, तो बाकी कार सेवकों का तो रिजर्वेशन था, लेकिन मेरे पास पैसे नहीं थे, तो सब लोगों ने कहा जिसके पास व्यवस्था है, वह अपने हिसाब से चले।
अयोध्या में कार सेवकों की संख्या ज्यादा होने के कारण प्रतिबंध लगा दिया था कि अब आप लोग वहां ज्यादा संख्या में न पहुंचे। उसके बाद में कोटा स्टेशन से दूसरी ट्रेन पकड़ कर सवाई माधोपुर स्टेशन पहुंचा और वहां से जो बाकी कार सेवक जा रहे थे, उसी ट्रेन में बिना टिकट चढ़ गया। जिन कार सेवकों का रिजर्वेशन था, वह अयोध्या से एक स्टेशन पहले मनिकापुर स्टेशन पर उतर गए। हम भी वहां उतरे और आगे दौड़कर इंजन पर चढ़ गए और उसके बाद हमें ऐसा लगा कि अब अयोध्या आ गई। वहीं से 'जय श्री राम' के नारों के साथ हम अयोध्या स्टेशन पहुंचे। 4 दिसंबर शाम को हम पहुंचे और 5 दिसंबर को हमने सभी प्रमुख मंदिरों के दर्शन किए।
यही वो कठिन संघर्ष था, जो लगभग-लगभग हर कार सेवक ने उस समय देखा और आज वही कार सेवक उस समय तय किए लक्ष्य को अपनी आंखो के सामने साकार होते भी देख रहे हैं।