देश के जाने-माने उद्योगपति, समाजसेवी और टाटा ग्रुप के मानद चेयरमैन रतन नवल टाटा अब हमारे बीच नहीं है। वह अपने पीछे एक बड़ी विरासत छोड़ गए हैं। रतन टाटा पारसी समुदाय से आते थे। हालांकि पारसी समुदाय में टाटा कोई सरनेम नहीं है। ऐसे में कई लोगों के लिए यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि आखिर उनका सरनेम ‘टाटा’ कैसे पड़ा? इसका जवाब जानने के लिए सबसे पहले रतन टाटा की वंशावली के बारे में जानना जरूरी है।
रतन टाटा के वंश की शुरुआत नुसरवानजी टाटा से मानी जाती है। इन्हें ‘टाटा’ परिवार का कुलपति कहा जाता है। टाटा के वंश की शुरुआत यहीं से होती है। वो एक पारसी पुजारी थे। उन्हें दस्तूर कहा जाता है। जैसे हिंदुओं में पूजा पाठ कराने वालों को ब्राह्मण कहा जाता है। वैसे ही पारसी में पूजा पाठ कराने वालों को दस्तूर कहा जाता है।
दस्तूर पारसी से टाटा कैसे बन गए?
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष केरसी कैखुशरू देबू ने Moneycontrol के पॉडकास्ट 'संवाद' में बताया कि जमेशदजी टाटा के पूर्वज दस्तूर परिवार से आते थे। ये पारसियों में पुजारी वर्ग होता है। नेटवर्क18 के ग्रुप एडिटर कन्वर्जेंस ब्रजेश कुमार सिंह के साथ बातचीत में उन्होंने कहा कि नुसरवानजी टाटा के बेटे जमशेदजी अपने पिता के मुकाबले कुछ बड़ा बिजनेस करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने मुंबई का रूख किया। उस दौरान जमशेद जी के पिता ने उन्हें करीब 21,000 रुपये कारोबार करने के लिए दिए थे।
केरसी कैखुशरू देबू ने बताया कि जमशेदजी के पिता बेहद गरम मिजाज के थे। यानी हाई टेंपर वाले। गरम मिजाज वालों को गुजराती में टाटा कहा जाता है। इसलिए लोग उन्हें टाटा कहकर बुलाने लगे। बाद में यही टाटा नाम सरनेम पड़ गया। अब पूरी दुनिया दस्तूर के बजाय इन्हें टाटा सरनेम से जानती है।
क्या कहता है टाटा का सिंबल?
कहा जाता है कि पारसी समुदाय में परोपकार करना उनके DNA में है। शायद यही वजह है कि ज्यादातर पारसी समुदाय के लोग अपनी कमाई का एक हिस्सा परोपकार में लगाते हैं। टाटा का सिंबल भी कुछ यही कहता है। केरसी कैखुशरू देबू ने बताया कि टाटा के सिंबल में लिखा है – हुमंडा हुक्ता हावर्सतम..... जिसका मतलब सद्वचन, सदाचार और अच्छा आचरण होता है।
रतन टाटा के वंशज नवसारी में कब आए?
केरसी कैखुशरू देबू ने बताया कि साल 1122 में पारसी समुदाय के कुछ लोग संजण से नवसारी आए। धीरे-धीरे नवसारी में पारसी समुदाय की संख्या बढ़ने लगी। यहां फायर टेंपल (मंदिर) बनाए गए। टावर ऑफ साइलेंस (शवों के अंतिम संस्कार की जगह) बनाया गया। इस तरह से नवसारी में आकर पारसी समुदाय बन गया।