भुवन भास्कर
भुवन भास्कर
हाल ही में ब्लूमबर्ग का एक सर्वे सोशल मीडिया पर वायरल हुआ जिसमें बार चार्ट के जरिए दुनिया की कुछ प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के मंदी में फंसने की आशंका को दिखाया गया था। इसमें जहां चीन और जापान जैसी अर्थव्यवस्थाओं में मंदी की संभावना क्रमशः 20 और 25 प्रतिशत बताई गई, वहीं भारत में यह आशंका शून्य प्रतिशत दिखी।
इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) ने भी 26 जुलाई को विश्व की अर्थव्यवस्था का जायजा लेने वाली अपनी रिपोर्ट वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक अपडेट जुलाई 2022 जारी की जिसमें 2022 के लिए ग्लोबल इकनॉमी की वृद्धि दर का अनुमान 3.2% कर दिया गया है, जो कि अप्रैल में जारी रिपोर्ट में 3.6% था। पिछले साल ग्लोबल इकनॉमी 6.1% की दर से बढ़ी थी।
नोमुरा होल्डिंग्स की हालिया रिपोर्ट में भी दावा किया गया है कि अगले 12 महीनों में अमेरिका, यूरोप, कनाडा, जापान, ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया जैसी तमाम अग्रणी अर्थव्यवस्थाएं मंदी की चपेट में आने वाली हैं। चीन में हालांकि फिलहाल मंदी का खतरा नहीं दिख रहा है, लेकिन IMF के मुताबिक 2022 के दौरान उसकी वृद्धि दर गिरकर 3.3% पर पहुंच जाएगी जो पिछले 40 वर्षों में चीन की सबसे धीमी वृद्धि दर है।
अगले साल 2023 में चीन की वृद्धि दर 4.6% रहने का अनुमान है, जबकि ग्लोबल वृद्धि दर इस साल के 3.2% से और सरक कर 2023 में 2.9% पर पहुंच सकती है। भारत फिलहाल मंदी के इस शोर से अछूता है, लेकिन यह मान लेना कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर दुनिया की परिस्थितियों का कोई प्रभाव नहीं होगा, अव्यावहारिक होगा।
भारत पर इसका क्या होगा असर?
इसका भारत पर क्या असर होगा, यह समझने से पहले यह समझ लेते हैं कि मंदी का मतलब होता क्या है। दरअसल कोई भी अर्थव्यवस्था जो भी माल या सेवाएं उत्पादन करती है, उन्हें मूल्य के रूप में आंका जाए, तो उसे सकल घरेलू उत्पाद यानी GDP कहते हैं। किसी भी अर्थव्यवस्था से यह उम्मीद की जाती है कि हर साल उसका GDP पिछले साल के मुकाबले कुछ बढ़ेगा, क्योंकि अर्थव्यवस्था का आधार बढ़ने से ही उसमें आने वाली नई जनसंख्या के लिए परिवहन के साधन बढ़ेंगे, सेवाएं बढ़ेंगी, खाद्य पदार्थ बढ़ेंगे, नए वर्कफोर्स के लिए रोजगार के मौके बढ़ेंगे।
लेकिन कई बार अलग-अलग कारणों से उलटा हो जाता है। यानी अर्थव्यवस्था में वृद्धि की जगह कमी आने लगती है। दूसरे शब्दों में किसी एक साल में जो अर्थव्यवस्था 100 रुपये का माल और सेवाएं पैदा कर रही है, वही अगले साल यह मूल्य घटकर 96 या 95 रुपये रह जाता है। इसे मंदी कहते हैं।
यह किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक स्थिति है, क्योंकि मंदी में मांग कम होने लगती है, जिससे कंपनियों को अपना उत्पाद और सेवाएं बेचने के लिए मूल्य घटाना पड़ता है। इससे कंपनियों की आमदनी घटती है और उन्हें अपनी विस्तार योजनाओं को रोकना पड़ता है, उत्पादन घटाना पड़ता है और कर्मचारियों के वेतन में कटौती करनी पड़ती है। यह एक दुष्चक्र तैयार करता है, जिसके कारण लोगों की आमदनी व मांग और घटती हैं।
कमोडिटी की डिमांड दे रही सुस्ती के संकेत
फिलहाल यदि दुनिया भर में कमोडिटी की कीमतों को देखें, तो मंदी की आहट साफ सुनी जा सकती है। खाद्य तेल से लेकर कच्चे तेल तक और कॉफी से लेकर स्टील तक – हर कमोडिटी की कीमतें नरम पड़ रही हैं। भारत का व्यापार संतुलन कुल मिलाकर आयात की ओर झुका हुआ है। जहां देश की जरूरतों का करीब 60% खाद्य तेल आयात होता है, वहीं कच्चे तेल में यह हिस्सेदारी 90% से ज्यादा है। जाहिर है कि कमोडिटी की नरम पड़ती कीमतें भले ही दुनिया भर में मंदी के खतरे की घंटी बजा रही हों, भारत के लिए यह राहत की खबर है।
इंडोनेशिया के पाम तेल का निर्यात बहाल करने के बाद से खाद्य तेलों के दाम में जो कमी शुरू हुई थी, उसके बाद से गिरावट का रुझान और तेज हुआ है। तेल उत्पादकों के संगठन SEA के मुताबिक जून के पहले हफ्ते से लेकर जुलाई के पहले हफ्ते के बीच भारतीय बंदरगाहों पर उतरे पाम ऑयल की कीमतों में 33% की गिरावट आई, वहीं सोया ऑयल इस अवधि में 24% और सूरजमूखी तेल 14% सस्ता हुआ। कच्चे तेल की कीमतें भी 11 मई के बाद पहली बार $100 के नीचे आई हैं।
सिटीग्रुप ने हाल ही में यह अनुमान जताया है कि इस साल के आखिर तक कच्चा तेल $65 प्रति बैरल तक पहुंच सकता है और 2023 के आखिर तक यह $45 प्रति बैरल पर पहुंच जाएगा। मई 2024 में भारत में आम चुनाव होंगे, जहां नरेंद्र मोदी की सरकार तीसरी बार जनादेश के लिए मैदान में उतरेगी। ऐसे में 2023 के आखिर तक यदि वैश्विक मंदी चरम पर पहुंचेगी, तो मोदी सरकार के लिए इसमें अच्छी खबर छुपी हो सकती है।
भारत के लिए खाने के और परिवहन के इन दोनों तरह के तेलों की कीमत में कमी कितनी राहत लेकर आएगी, यह समझने के लिए दो आंकड़े देखना पर्याप्त होगा। सोयाबीन प्रोसेसिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सोपा) के मुताबिक अप्रैल-दिसंबर 2020 के दौरान 9 महीनों में भारत ने 59,543 करोड़ रुपये के खाद्य तेल का आयात किया था, जो अगले साल की इसी अवधि में 75% बढ़कर 1,04,354 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक पूरे साल में यह बिल 2 अरब डॉलर पार करने की संभावना है। अब यही आंकड़ा कच्चे तेल में देखिए। वित्त वर्ष 2021-22 में भारत ने $119.2 अरब कच्चे तेल के आयात पर खर्च किए जो उसके पिछले साल 2020-21 में खर्च $62.2 अरब से लगभग 92% ज्यादा है।
साफ है कि दुनिया में आ रही मंदी भारत और नरेंद्र मोदी सरकार को बड़ी राहत दे सकती है। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि भारतीय अर्थव्यवस्था के रास्ते में सिर्फ फूल ही फूल बिछे हैं। दरअसल इन फूलों के बीच में महंगाई दर का कांटा सरकार और RBI को सिरदर्द देने के लिए काफी हैं।
वैसे तो मंदी परिभाषा से ही महंगाई कम करती है, लेकिन आर्थिक तंत्र के बही खाते में अक्सर दो जोड़ दो सीधे चार नहीं होते। दुनिया भर में मंदी आने की जो संभावना बनी है, नोमुरा होल्डिंग्स की रिपोर्ट में उसके लिए रूस-यूक्रेन युद्ध के साथ ही विश्व की सरकारों द्वारा अपनाई गई नीतियों को भी बराबर जिम्मेदार ठहराया गया है। ये नीतियां मॉनिटरी टाइटनिंग यानी ब्याज दरों में वृद्धि कर विभिन्न देशों द्वारा अपनी-अपनी करेंसी को महंगा बनाने से जुड़ी हैं। जाहिर है कि ऐसा करने के पीछे देशों के केंद्रीय बैंकों की अपनी मजबूरी है।
नोमुरा के मुताबिक सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, फिलिपीन्स और भारत में साल के उत्तरार्द्ध में खाद्य वस्तुओं की कीमतों में अधिकतम स्तर पर होंगी। अमेरिका में महंगाई दर 40 साल के उच्चतम स्तर पर है और भारत में भी खुदरा महंगाई 8 साल के शीर्ष पर पहुंची हुई है। अप्रैल में 7.79% को छूने के बाद हालांकि महंगाई दर कुछ नरम पड़ी है, लेकिन अब भी यह 7% के ऊपर रहते हुए लगातार चौथे महीने RBI के लक्ष्य से ऊपर है। नोमुरा की इसी रिपोर्ट में संभावना जताई गई है कि आने वाले महीनों में भारत में खुदरा महंगाई दर 8% से ऊपर निकल जाएगी।
दूसरी ओर रुपये में लगातार गिरावट बनी हुई है। पहली बार रुपया डॉलर के मुकाबले 80 का आंकड़ा पार कर चुका है। जाहिर है कि इन परिस्थितियों में RBI मूक दर्शक नहीं बना रह सकता। मई के बाद से पहले ही वह ब्याज दरों में 90 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी कर चुका है, जिसके कारण होम लोन से लेकर तमाम दूसरे कर्ज महंगे होने शुरू हो गए हैं।
ऐसे में सरकार और RBI को संतुलन की एक महीन धार पर चलते हुए नीतिगत लचीलेपन का प्रदर्शन करना होगा और जैसे ही वैश्विक मंदी के कारण भारतीय कमोडिटी की कीमतों में राहत मिलना शुरू हो, उसी समय घरेलू मॉनिटरी पॉलिसी को भी ढीला करना होगा, ताकि भारतीय अर्थव्यवस्था भी दुनिया के साथ कदम ताल करते हुए मंदी की ओर अग्रसर न हो जाए।
(लेखक कृषि और आर्थिक मामलों के जानकार हैं)
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