Pension: भारत के गरीब बुजुर्गों को मिलती है सिर्फ 300 रुपये प्रति माह पेंशन, 10 साल से कर रहे हैं बढ़ने का इंतजार

मध्य प्रदेश स्थित कार्यकर्ता चंद्र शेखर गौर की ओर से दायर एक RTI पर ग्रामीण विकास मंत्रालय ने जवाब दिया कि राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के तहत पेंशन की राशि में बदलाव का फिलहाल कोई प्रस्ताव नहीं है

अपडेटेड Jul 31, 2022 पर 10:54 PM
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10 साल बाद लोग अपनी पेंशन में एक और बढ़ोतरी की आस लगाए बैठे हैं

भारत में कुछ लोगों के लिए 300 रुपये की ज्यादा अहमियत नहीं होती, वे इसे एक फिल्म के टिकट, कॉफी, सप्ताहभर की सब्जी या किसी ढाबे में परिवार के साथ खाना खाकर खर्च कर सकते हैं। लेकिन इसी देश में हजारों लोग ऐसे हैं जिनकी एक महीने की पेंशन (Pension) मात्र 300 रुपये है।

बुजुर्गों के पेंशन में पिछली बार 2012 में वृद्धि की गई थी। उस वक्त इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय दिव्यांग पेंशन योजना के तहत पेंशन की राशि 200 रुपये से बढ़ाकर 300 रुपये प्रति माह कर दी गई थी।

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न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, मध्य प्रदेश स्थित कार्यकर्ता चंद्र शेखर गौर की ओर से दायर आरटीआई पर ग्रामीण विकास मंत्रालय ने जवाब दिया कि राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के तहत पेंशन की राशि में बदलाव का फिलहाल कोई प्रस्ताव नहीं है।

10 साल से कर रहे हैं बढ़ने का इंतजार

10 साल बाद लोग अपनी पेंशन में एक और बढ़ोतरी की आस लगाए बैठे हैं। सरकार, गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों के लिए राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रमों (NSAP) के तहत विभिन्न पेंशन योजनाओं का क्रियान्वयन करती है। कई लाभार्थियों के लिए पेंशन में थोड़ी सी बढ़ोतरी भी स्वागतयोग्य है, भले ही वह महंगाई को देखते हुए अपर्याप्त हो।

भारत, परंपरागत रूप से एक आदर्श कल्याणकारी राज्य नहीं है। जीवनयापन करने के लिए पेंशन अपने आप में कभी पर्याप्त नहीं हो सकती। हालांकि, यह भी तथ्य है कि केंद्र सरकार की कई योजनाओं के तहत दी जाने वाली राशि ‘कुछ सौ’ में है और राज्य सरकार की योजनाओं में ‘कुछ हजार’ की राशि दी जाती है।

जानें, कैसे मुश्किल हालात में जीवन-यापन कर रहे हैं बुजुर्ग

पिछले 10 साल से बिस्तर पर पड़ी दिल्ली के जहांगीरपुरी में रहने वाली लकवाग्रस्त हिरी देवी (65) को दिव्यांग पेंशन योजना के तहत 300 रुपये प्रतिमाह मिलते हैं। हिरी देवी ने न्यूज एजेंसी पीटीआई से कहा, 'मेरे पति 70 साल से ज्यादा की उम्र के हैं और उन्होंने महंगाई को देखते हुए दिहाड़ी मजदूर के तौर पर काम करना शुरू कर दिया है। हमें इन पैसों से 5 दिन का राशन भी नसीब नहीं होता।'

पीटीआई के मुताबिक, कुछ महीने पहले तक हिरी देवी को गैर सरकारी संगठनों से एडल्ट डायपर और अतिरिक्त राशन की मदद मिल जाया करती थी। लेकिन महामारी की स्थिति में सुधार होते ही यह सहायता बंद हो गई। आगे कोई राहत मिलने की उम्मीद भी नहीं दिखाई देती।

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इस प्रकार की कई अन्य कहानियां भी हैं। लाला राम (72) भी लकवाग्रस्त हैं और साफ बोल नहीं पाते। उनकी बहु गंगा ने परिवार की समस्याओं के बारे में पीटीआई को बताया। दिल्ली के मयूर विहार में रहने वाली गंगा ने कहा, 'हमारी कुल पारिवारिक आय 2,000 रुपये है, जिसमें पेंशन शामिल है। 6 लोगों के परिवार के लिए इसमें जीवन यापन करना बेहद कठिन है। इसके अलावा हमेशा इतनी आय नहीं रहती।'

कुछ लोगों को विभिन्न स्रोतों से पेंशन मिलती है। नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर 76 वर्षीय एक महिला ने कहा कि उनके पति की 2015 में कैंसर से मौत हो गई थी। अब वह 300-300 रुपये की दो पेंशन पर निर्भर हैं जो उन्हें विधवा पेंशन योजना और वृद्धावस्था पेंशन योजना से मिलती है।

रांची में रहने वाली इस महिला को झारखंड सरकार से भी कुछ पैसे मिलते हैं, लेकिन कुल मिलाकर ढाई हजार रुपये भी आज के जमाने में अपर्याप्त हैं। महिला ने कहा, 'महंगाई इतनी ज्यादा है कि इससे 10 दिन का भोजन जुटाना मुश्किल हो जाता है। मैं दवाई तक नहीं खरीद सकती।'

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