Indian Railways: ट्रेन का टिकट बुक करते समय अपनी सीट क्यों नहीं सेलेक्ट कर पाते? जानिए इसके पीछे का विज्ञान

Indian Railways: ट्रेन में जब आप टिकट बुक करते हैं तो मनचाही सीट नहीं सेलेक्ट कर सकते हैं। इसके पीछे रेलवे का एक बहुत विज्ञान छिपा हुआ है। जानिए इसके पीछे क्या है रहस्य

अपडेटेड Jun 13, 2022 पर 12:43 PM
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रेलवे की ओर से जो सीट दी जाती है। उसी में यात्रियों को सफर करना होता है।

Indian Railways: बहुत से लोग ट्रेन में सफर करना आराम दायक मानते हैं। इंडियन रेलवे की ओर से भी यात्रियों की सुविधा के लिए हमेशा कुछ न कुछ अपडेट आता रहता है। ऐसे ही तमाम यात्री यह सोचते होंगे कि जब रेलवे इतनी सुविधाएं मुहैया कराता है तो फिर मनचाही सीट क्यों नहीं मिलती। जब हम ट्रेन का टिकट बुक करते हैं तो सिनेमा हॉल की तरह अपनी सीट नहीं सेलेक्ट कर सकते हैं। रेलवे की ओर से जो सीट मुहैया कराई जाती है। उसी में हमें सफर करना पड़ता है। आखिर ऐसा क्यों होता है? आइये आपको इसके पीछे का पूरा विज्ञान समझाते हैं।

सीटे बुक करने का ये है मैकेनिजम

इसके पीछे रेलवे का पूरा मैकेनिजम (Mechanism) काम करता है। ट्रेन में सीट बुक करना किसी थिएटर में सीट बुक करने बिल्कुल अलग है। फिल्म थिएटर एक हॉल है, जबकि ट्रेन एक चलती हुई वस्तु है। इसलिए ट्रेनों में सुरक्षा की एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है। लिहाजा इंडियन रेलवे टिकट बुकिंग सॉफ्टवेयर को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि ये टिकट इस तरह से बुक करेगा। जिससे ट्रेन में समान रूप से लोड बांटा जा सके।


ऐसे होती है सीट की बुकिंग

मान लीजिए किसी ट्रेन में S1, S2 S3... S10 नंबर वाले स्लीपर कोच हैं। इन सभी कोच में 72-72 सीटें हैं। इस ट्रेन के स्लीपर क्लास में जब कोई पहली बार टिकट बुक करेगा, तो सॉफ्टवेयर बीच के कोच में एक सीट दे देगा। जैसे कोच S5, में 30 से लेकर 40 नंबर तक की कोई सीट मिलेगी। इसके अलावा रेलवे पहले लोअर बर्थ को भरता है। जिससे गुरुत्वाकर्षण केंद्र कम मिले।

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अंत में बुक होती है अपर बर्थ

रेलवे का सॉफ्टवेयर कुछ इस तरह से सीटें बुक करता है कि सभी कोचों में एक समान यात्री रहें। यानी यात्रियों की संख्या बराबर रहे। इसके साथ ही ट्रेन में सीटें बीच की सीटों (36) से शुरू होकर गेट के पास की सीटों तक यानी 1-2 या 71-72 से निचली बर्थ से ऊपरी तक भरी जाती हैं। ट्रेन का संतुलन बनाए रखने के लिए रेलवे की ओर स नियम का पालन किया जाता है। यह वजह है कि आखिरी में बुक करने पर अपर सीट मिलती है।

अगर इस नियम का न करें पालन तो....

अब सोचिए अगर रेलवे इस सिस्टम से टिकट से बुक न करे तो क्या होगा? बता दें कि ट्रेन एक चलती हुए वस्तु है। ट्रेन की स्पीड करीब 100 किलोमीटर प्रति घंटा तक होती है। ऐसे में इसमें कई तरह के बल और मैकेनिजम काम करते हैं। अगर S1, S2, S3 पूरी तरह से भरे हुए हैं और S5, S6 पूरी तरह से खाली हैं। अन्य कोच में मामूली यात्री हैं। ऐसे में जब कहीं मोड आता है तो कुछ डिब्बे अधिकतम अपकेंद्र बल (centrifugal force) का सामना करते हैं और कुछ न्यूनतम, और इससे ट्रेन के पहिए पटरी से उतर सकते हैं।

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