महाकुंभ पर किसने लगाया था टैक्स, जब 10 रुपये से भी कम होती थी सैलरी तब चुकाना पड़ता था 1 रुपये टैक्स

हिन्दुओं के आस्था का महापर्व महाकुंभ का आगाज हो चुका है। इस महापर्व के आगाज के साथ ही संगम में 2 करोड़ से ज्यादा लोगों ने डुबकी लगा ली है। देश की आजादी के पहले लगने वाले महाकुंभ की आभा को अंग्रोजों ने काफी नुकसान पहुंचाया था। अंग्रेजों ने महाकुंभ मेले के महत्व को गंभीरता से नहीं समझा और इसे कमाई के एक मौके के रूप में भी देखा था

अपडेटेड Jan 14, 2025 पर 6:40 PM
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कुंभ पर किसने लगाया था 'TAX'

Mahakumbh 2025 : वैसे तो प्रयागराज बेहद ही शानदार शहर है और इसे संगम नगरी के रूप में जाना जाता है। लेकिन हर 12 साल बाद लगने वाले कुंभ के समय ये शहर एक अद्भुत, अविश्वसनीय भव्यता का रूप ले लेता है। इस समय प्रयागराज में संगम किनारे बसा एक अनोखी दुनिया बसी है। संगम किनारे बसी इस नगरी की फिलहाल ऐसी चमक-धमक है मानो उसके सामने इंद्रलोक भी फीका पड़ जाए। 144 साल बाद इस बार महाकुंभ में एक अद्भुत संयोग पड़ रहा है, जिसने इस धार्मिक महापर्व को और भी खास बना दिया है। वैसे तो महाकुंभ का इतिहास हजारों साल पुराना बताया जाता है पर क्या आपको बता भारतीयों की आध्यात्मिक चेतना को जागृत करने वाले इस महापर्व पर कभी टैक्स भी लगाया गया था।

जब कुंभ में देना पड़ता था टैक्स

दशकों पहले कुंभ मेला बिल्कुल अलग था। ब्रिटिश शासन के दौरान यह मेला, अंग्रेजों के लिए पैसा कमाने का एक जरिया बन गया था। जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1801 में प्रयागराज पर कब्ज़ा किया, तो उन्हें पता चला कि कुंभ मेला हर 12 साल में आयोजित किया जाता है। हालांकि अंग्रेजों को कुंभ के धार्मिक महत्व में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी., वे इसे एक व्यवसाय के तौर पर देखते थे। इस मेले में आने वाले हर व्यक्ति से अंग्रेज 1 रुपये का कर वसूलते थे। यह 'कुंभ कर' था, जिसे मेले में पवित्र संगम में स्नान करने के लिए हर श्रद्धालु को देना पड़ता था।


इतना लगता था पैसा

गौरतलब है कि उस समय एक रुपया बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी, क्योंकि उस समय औसत भारतीय की मजदूरी 10 रुपये से भी कम थी। उदाहरण के लिए, एक दर्जी महीने में सिर्फ 8 रुपये कमाता था और एक सफाईकर्मी या वेटर महीने में 4 रुपये कमाता था। इसके बावजूद, कुंभ कर 1 रुपये रखा गया। यह भारतीयों का शोषण करने के अंग्रेजों के तरीकों में से एक था।

बाल मुंडवाने पर भी लगता था टैक्स

भारत में करीब 24 साल बिताने वाली ब्रिटिश महिला फैनी पार्क ने इस कुंभ कर और स्थानीय व्यापारियों पर इसके प्रभावों के बारे में लिखा है। उन्होंने बताया कि, यह कर कुंभ मेले में आने वाले श्रद्धालुओं से लिया जाता था। इसके साथ ही कुंभ मेले में व्यापार करने वालों जैसे नाई से भी कर वसूला जाता था। कुंभ में कई श्रद्धालु अपने बाल मुंडवाते थे, जिससे नाई का व्यापार काफी बढ़ गया। 1870 में अंग्रेजों ने 3,000 नाई केंद्र स्थापित किए और उनसे करीब 42,000 रुपये कमाए। इसमें से करीब एक चौथाई रकम नाइयों से ली जाती थी, प्रत्येक नाई को 4 रुपये का कर देना पड़ता था।

स्थानीय लोगों की नाराजगी

कुंभ मेले के बढ़ते टैक्स ने स्थानीय समुदायों, खासकर प्रयागवाल ब्राह्मणों को नाराज कर दिया था। ये लोग श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन करते थे और बदले में उन्हें दक्षिणा भी मिलती थी, लेकिन कुंभ कर ने उनकी कमाई में कटौती कर दी थी। साथ ही इस समय कई ईसाई मिशनरी भी प्रयागराज आकर हिंदू श्रद्धालुओं को धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित कर रहे थे, जिससे स्थानीय लोग और भी नाराज हो गए।

इतिहासकारों का ये भी दावा है कि अकबर के शासनकाल में कुंभ मेले से टैक्स वसूलने की शुरुआत हुई। बाद में हिंदुओं की मांग पर कुंभ में वसूला जाने वाला टैक्स अकबर द्वारा ही खत्म करने की बात भी सामने आती है।

कुंभ में महात्मा गांधी

20वीं सदी में कुंभ मेला राष्ट्रवादियों के लिए एक प्रमुख स्थान बन गया। 1918 में महात्मा गांधी ने कुंभ मेले का दौरा किया और गंगा में स्नान किया। इससे ब्रिटिश प्रशासन काफी चिंतित हुआ और उन्होंने गांधीजी पर नजर रखने के लिए खुफिया रिपोर्ट तैयार की। 1942 के कुंभ मेले के दौरान अंग्रेजों ने तीर्थयात्रियों पर प्रतिबंध लगा दिया। आधिकारिक तौर पर अंग्रेजों ने कहा कि वे जापानी हमले से बचने के लिए यह कदम उठा रहे हैं, लेकिन कई इतिहासकारों का मानना ​​है कि यह कदम ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की बढ़ती ताकत के कारण उठाया गया था।

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