महाकुंभ मेला हिंदूओं का सबसे बड़ा सांस्कृतिक और धार्मिक मेला है। साल 2025 के प्रयागराज में महाकुम्भ मेला लगने वाला हैं। यह 13 जनवरी 2025 से शुरू होगा और 25 फरवरी 2025 तक चलेगा। महाकुंभ मेला 45 दिनों तक चलता है। इसके लिए उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने बड़े पैमाने पर तैयारी शुरू कर दी है। वहीं, श्रद्धालु अपनी तीर्थ यात्रा की तैयारी में लगे हैं। प्रयागराज महाकुंभ 2025 की धूम धीरे धीरे तेज होने लगी है। कुंभ मेले में पंडों का अहम रोल होता है। यात्रियों की आवाभगत में पंडे लगे रहते हैं। यह परंपरा सैकड़ों साल से चली आ रही है।
बता दें कि सालों साल से तीर्थराज प्रयाग में आने वाले श्रद्धालुओं की आवभगत करने वाले पंडों को तीर्थराज और प्रयागवाल के नाम से भी जाना जाता है। आखिर उन्हें यह उपनाम क्यों दिया जाता है, आइये विस्तार से जानते हैं।
पंडों का कहा जाता है गंगा पुत्र
दरअसल, तीर्थराज प्रयाग के पंडों को प्रयागवाल कहा जाता है। इन पंडों को गंगापुत्र के नाम से भी जाना जाता है। पहले तो इन प्रयागवालों को तीर्थ गुरु के नाम से लोग जानते थे। यही लोग धार्मिक अनुष्ठान कराते थे। एक ग्रुप में होने की वजह से इनको प्रयागवाल कहा जाने लगा। बताया जाता है कि प्रयागवाल उच्चकोटि के ब्राह्मण होते हैं। जिनमें सरयूपारी और कान्यकुब्ज दोनों शामिल होते हैं। धार्मिक स्थलों के सभी तीर्थ पुरोहितों के पास लोगों की वंशावली 500 साल से सुरक्षित है। प्राचीन काल से जहां से भी जो लोग तीर्थ स्थानों पर दर्शन पूजन के लिए गए होंगे। उनके नाम पंडों के बही खाते में दर्ज हो गए। समय के साथ पंडों ने भी अपने इलाके बांट लिए। यह परंपरा आज भी कायम है।
जजमानों का डेटा हो रहा है हाईटेक
पंडे अब जजमानों का डेटा डिजिटल रूप में बना रहे हैं। हाथों से लिखे गए इन दस्तावेजों को स्कैन करके वंशावली को वे कंप्यूटराइज कर रहे हैं। इसके लिए हर पेज को स्कैन कर डेटा बैंक में रखा जा रहा है। अगर कोई जजमान अपने पुरोहित ने परिवार की वंशावली से संबंधित कोई जानकारी मांगेगा तो उसे नाम, स्थान, जिले और जाति के आधार पर पूरी डिटेल एक मिनट में दे दी जाती है। इतना ही नहीं जजमानों अब पूरी जानकारी व्हाट्सएप और ईमेल के जरिए भी भेजने की तैयारी की गई है।