हिमाचल का वो शापित गांव, जहां नहीं मनाई जाती दिवाली, सैकड़ों साल पुराना है श्राप

जब पूरा देश दिवाली के जश्न में डूबा हुआ है, हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले के सम्मू गांव में इस त्योहार की कोई रौनक नहीं है। देशभर में जहां दिवाली का उल्लास मनाया जा रहा है, वहीं इस गांव के लोग दिवाली के दिन अपने घरों में कैद हो जाते हैं। यहां सैकड़ों सालों से दिवाली नहीं मनाई जाती, और इसके पीछे एक प्राचीन श्राप की कहानी है

अपडेटेड Oct 31, 2024 पर 10:44 AM
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स्थानीय लोगों का कहना है कि दिवाली मनाने पर इस गांव में आपदा आ सकती है या अकाल मृत्यु हो सकती है

जब पूरा देश दिवाली के जश्न में डूबा हुआ है, हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले के सम्मू गांव में इस त्योहार की कोई रौनक नहीं है। देशभर में जहां दिवाली का उल्लास मनाया जा रहा है, वहीं इस गांव के लोग दिवाली के दिन अपने घरों में कैद हो जाते हैं। यहां सैकड़ों सालों से दिवाली नहीं मनाई जाती, और इसके पीछे एक प्राचीन श्राप की कहानी है जिसने गांववालों को इस पर्व से दूर रखा है।

दीपावली पर घरों में रहता सन्नाटा

हमीरपुर जिले से 25 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में दिवाली का जश्न तो दूर, लोग इस दिन पकवान तक नहीं बनाते। गांववालों का मानना है कि दिवाली मनाने पर यहां आपदा आ सकती है या अकाल मृत्यु हो सकती है। दीप जलाने के अलावा कोई उत्सव नहीं होता, और किसी परिवार ने गलती से पटाखे जलाने की कोशिश की तो गांव पर कोई न कोई संकट आ जाता है। यही वजह है कि इस दिन लोग घरों में ही रहते हैं और बाहर निकलने से भी परहेज करते हैं।

श्राप का खौफ और असफल प्रयास


गांव के बुजुर्गों का कहना है कि यह श्राप कई पीढ़ियों से चला आ रहा है। 70 वर्षीय एक बुजुर्ग ने बताया कि जो भी दिवाली मनाने का प्रयास करता है, उसके बाद गांव में किसी न किसी तरह की आपदा आ जाती है। इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए कई बार हवन और यज्ञ किए गए, लेकिन सभी प्रयास असफल रहे। गांव की ही एक महिला ने बताया कि दिवाली के दिन उनके दिल में एक खालीपन रहता है। जहां बाकी जगह लोग खुशी से त्योहार मनाते हैं, वहीं उनके गांव में इस दिन सन्नाटा पसरा रहता है।

क्या है इस श्राप की कहानी?

यह कहानी उस दिन से शुरू होती है जब गांव की एक गर्भवती महिला अपने पति के साथ सती हो गई थी। दीपावली के दिन वह अपने मायके जाने के लिए निकली थी, लेकिन रास्ते में उसे अपने पति की मृत्यु का समाचार मिला। इस गहरे आघात को सहन न कर पाने के कारण वह अपने पति के साथ सती हो गई और गांव को श्राप देकर चली गई कि यहां के लोग कभी दिवाली नहीं मना पाएंगे। तब से लेकर आज तक इस गांव में दीपावली का त्योहार नहीं मनाया गया है। गांववाले केवल उस सती की मूर्ति की पूजा करते हैं, लेकिन दिवाली का उत्सव नहीं मनाते।

श्राप के साए में जिंदगी

यह कहानी केवल सम्मू गांव की नहीं, बल्कि उन लोगों की भी है जो श्राप और परंपरा के चलते एक त्योहार से दूर हैं। आज के समय में भी, यह गांव उसी प्राचीन श्राप के साए में दिवाली जैसे पर्व से वंचित है। ग्रामीणों के दिलों में कहीं न कहीं यह उम्मीद जरूर है कि एक दिन यह श्राप समाप्त होगा और वे भी इस त्यौहार की खुशियां मना पाएंगे।

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