सरकारी कंपनी IIFCL को लिस्ट कराने की तैयारी, साल के आखिर तक आ सकता है IPO

IIFCL की शुरुआत साल 2006 में हुई थी। इसका उद्देश्य इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को दीर्घकालिक वित्तीय सहायता प्रदान करना है। कंपनी के सार्वजनिक होने के लिए सभी पहलुओं पर विचार किया जा रहा है। इंडिया इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनी लिमिटेड, सितंबर 2013 से भारतीय रिजर्व बैंक के साथ NBFC-ND-IFC के रूप में रजिस्टर है

अपडेटेड May 16, 2024 पर 11:49 AM
चल रहे प्रोजेक्ट्स के लिए लोन पर रिजर्व बैंक के नए ड्राफ्ट रूल्स का फिलहाल कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

सरकार के मालिकाना हक वाली इंडिया इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनी लिमिटेड (IIFCL) को शेयर बाजारों में लिस्ट कराने की तैयारी है। CNBC आवाज के साथ बातचीत में कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर पीआर जयशंकर ने कहा कि साल के अंत तक IPO लाने की तैयारी चल रही है। कंपनी के सार्वजनिक होने के लिए सभी पहलुओं पर विचार किया जा रहा है। एमडी ने यह भी कहा कि कंपनी की वित्तीय स्थिति पहले से मजबूत और बेहतर हो गई है और कंपनी का CAGR सालाना 20% की दर से बढ़ रहा है।

IIFCL की शुरुआत साल 2006 में हुई थी। इसका उद्देश्य इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को दीर्घकालिक वित्तीय सहायता प्रदान करना है। IIFCL, सितंबर 2013 से भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के साथ NBFC-ND-IFC के रूप में रजिस्टर है और RBI के मानदंडों का पालन करती है।

जयशंकर ने चल रहे प्रोजेक्ट्स के लिए लोन पर रिजर्व बैंक के नए ड्राफ्ट रूल्स को लेकर कहा कि इनका फिलहाल कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि, यह देखना बाकी है कि ड्राफ्ट का अंतिम स्वरूप क्या होगा। उन्होंने कहा कि ड्राफ्ट को लेकर स्टेकहोल्डर्स के साथ चर्चा चल रही है।


चालू प्रोजेक्ट्स के लिए कर्ज के नियम होने जा रहे हैं सख्त

रिजर्व बैंक ने हाल ही में चालू प्रोजेक्ट्स के लिए कर्ज देने से जुड़े नियमों को सख्त करने का प्रस्ताव पेश किया है। केंद्रीय बैंक के ड्राफ्ट नियमों में ऐसे प्रोजेक्ट्स को अलग-अलग कैटेगरी में रखने का भी प्रस्ताव है। ये क्लासिफिकेशंस, प्रोजेक्ट के विभिन्न चरणों पर बेस्ड हैं और इसमें निर्माण अवधि के दौरान प्रोविजन फॉर अरेंजमेंट भी है, जो 5% तक हो सकता है।

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यह प्रावधान उन प्रोजेक्ट्स पर भी लागू होगा, जहां ऋण संबंधी शर्तें समय पर पूरी की जा रही हों। हाल के दिनों में बैंक की लोन बुक पर प्रोजेक्ट लोन के बढ़ते दबाव को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। हालांकि, प्रोविजनिंग बढ़ने से भविष्य में कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है।

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